संस्मरण

मेरी कहानी 134

मैं हर सुबह जब बिस्तर से निकल कर नीचे आता हूँ तो सब से पहले बीबीसी ब्रेकफास्ट शो देखता हूँ ताकि आज की ताज़ा खबर देख लूँ। हर आधे घंटे बाद ख़बरें और आज का मौसम बताते ही रहते हैं लेकिन मैं जल्दी से टैलिटैक्स पर सभी ख़बरें, मौसम का हाल और करंसी रेट देख लेता हूँ। इस में दो तीन मिनट ही लगते हैं लेकिन आज जब सुबह नीचे आया तो एक ऐसी खबर चल रही थी जिस को देख कर मन में बहुत विचार आये।

खबर थी रीफिूजिओं के बारे में जो फ्रांस में चैनल टनल के नज़दीक कैले पर रह रहे हैं, जिन में बहुत बच्चे भी हैं जो अपने अपने परिवार से बिछुड़ गए हैं और बहुत बच्चों के माता पिता अफगानिस्तान और सीरिया में मारे गए हैं । हज़ारों की तादाद में इस जगह रिफ्यूजी रह रहे हैं। चैनल टनल समुन्दर के नीचे नीचे फ्रांस से इंगलैंड को आती है, जिस पर कारें भी जाती हैं और एक तरफ ट्रेन भी जाती है। यह रिफ्यूजी फ्रांस में बैठे इंगलैंड आने को उत्सक हैं। जिस एरिये में यह लोग रहते हैं, उन को जंगल कहा जाता है कियोंकि यह जंगल जैसा ही है और इन को देख कर इंडिया के झौंपड़ियों में रह रहे गरीबों की याद आ जाती है। इंडिया के गरीब लोग तो फिर भी अच्छे हैं लेकिन यह लोग सिर्फ चैरिटी पर ही निर्भर हैं जो उन के लिए कुछ खाने और पहनने को ले कर आती है। इतनी सर्दी में यह लोग रह रहे हैं कि रूह काँप उठती है क्योंकि हम सैंट्रल हीटिंग लगा कर भी इतने गर्म घर में भी ठंडी महसूस करते हैं।

आज सुबाह दो बज़ुर्ग जो 90 के होंगे, इंगलैंड के लोगों को कह रहे थे कि इन बच्चों को इंगलैंड आने की इजाजत देनी चाहिए। यह दोनों बज़ुर्ग जीऊज (यहूदी) हैं। वर्ल्ड वार सैकंड के बाद यह दोनों बज़ुर्ग, बच्चे ही थे और उस समय इंगलैंड ने दस हज़ार जिऊज बच्चे इंगलैंड में सैटल किये थे जिन में यह बज़ुर्ग भी थे, इंगलैंड ने उन बच्चों की रहाएश और पढ़ाई का प्रबंध किया था। अब यह दोनों बज़ुर्ग इंगलैंड के लोगों को कह रहे हैं कि उन को पता है कि रीफूजियों की क्या हालत होती है, इस लिए इंगलैंड को ये बच्चे ले लेने चाहिए। इंगलैंड के बहुत लोग भी उन के हक्क में हैं कि इन बच्चों की मदद करनी चाहिए।

इस में एक बात और भी है कि इंगलैंड में पिछले दस सालों में इतने लोग आये हैं कि यहां के पड़े लिखे बच्चों को काम नहीं मिल रहे, बेकारी दिनबदिन बढ़ रही है, जिस की वजह से हर तरफ निरास्ता का आलम है। एक दिन मेरी धर्म पत्नी बोलने लगी,” देखो जी बाहर से इतने लोग आ गए हैं कि उन को देख कर डर लगता है, इंगलैंड में गंद पड़ गया है “, बहुत देर पत्नी बोलती रही तो मुझ से रहा नहीं गया। मैंने पत्नी को कहा,” देश अंग्रेज़ों का है और वह लोग उन की मदद कर रहे हैं और तुम ऐसी बातें कर रही हो, ऐसा नहीं महसूस होता तुम्हें कि यह अँगरेज़ लोग कितने दयावान हैं ? “. पत्नी शर्मिंदा हो गई और उस ने मान लिया कि सही मानों में यह लोग दयालु हैं।

बात यहीं खत्म हो गई लेकिन मेरे खयालों की सूई कभी किधर चली जाती, कभी किधर। आज से तकरीबन दस साल पहले मैं अपने बड़े पोते को हर सुबह स्कूल छोड़ने जाता था, वापस घर आ कर मैं ब्रेकफास्ट करता और फिर लाएब्रेरी में चले जाता। लाएब्रेरी नज़दीक ही है और एक दो वजे घर आ कर कुछ खा पी कर फिर लाएब्रेरी में आ जाता और फिर जब स्कूल का वक्त होता तो पोते को ले कर घर आ जाता। पांच दिन का मेरा यह डेली रूटीन था। लाएबरेी में और भी पंजाबी गुजराती दोस्त होते थे और किसी ना किसी टॉपिक पर बातें भी करते रहते थे । एक दिन एक दोस्त ने सवाल किया, ” यार, इंगलैंड में पहला इंडियन कौन सी सदी में आया होगा ?”.

बातें शुरू हो गईं, कोई गांधी नेहरू की मिसाल देता, और कोई किसी और की। किसी भी नतीजे पर हम पहुँच नहीं सके और लाएब्रेरी से बाहर आ गए लेकिन मेरे दिमाग में यह बात खटकती रही कि कोई ऐसी किताब मिल जाए जिस में हमारे पहले इंडियन लोगों का इतहास हो। लायब्रेरियन से भी पुछा लेकिन कुछ हासल नहीं हुआ। फिर एक दिन मैं टाऊन की बड़ी लाएब्रेरी में गया जिस को सैंट्रल लाएब्रेरी बोलते हैं। हिस्टरी एंड ट्रैवल सेक्शन में मैं किताबें उठा उठा कर देखने लगा। एक किताब पर मेरी नज़र पढ़ी। इस किताब का नाम मुझे अभी तक याद नहीं आता लेकिन यह कुछ ऐसा था, 400 years of indians in britain,

यह किताब मैं घर ले आया और पहले चैप्टर को पढ़ कर ही हैरान हो गया कि हम तो समझते थे कि इंगलैंड में इंडियन ज़्यादा से ज़्यादा सौ साल पहले आये होंगे लेकिन मेरी हैरानी की कोई हद नहीं रही जब पढ़ कर गियात हुआ कि इंडियन तो ईस्ट इंडिया कम्पनी के भारत में आने से पहले भी इंगलैंड में रहते थे। यह किताब मैंने पडी और बाद में फिर इसे ढूंढने की कोशिश की लेकिन मुझे मिली नहीं। यह कांड लिखने के लिए मैंने इंटरनैट पर खोज की लेकिन उतना कुछ मिल नहीं पाया जितना उस किताब में था।

जितना कुछ उस किताब में लिखा था, उन की कुछ बातें जो याद है, लिखना चाहता हूँ। अक्सर हम बातें अंग्रेज़ों की ईस्ट इंडिया कम्पनी की करते रहते हैं, इस लिए हम को अंग्रेज़ों से ही नफरत करनी सिखाई जाती थी क्योंकि इन्होने भारत पर राज किया था और देश को लूटा था लेकिन यह हम भूल जाते हैं कि डच, डेनिश, फ्रैंच, स्वीडिश, और ख़ासकर पुर्तगाल के लोग भी इंडिया से ट्रेड करते थे और उन्होंने इंडिया के कई प्रदेशों पर राज भी किया था और उन की लोकल राजाओं से लड़ाइयां भी हुई थीं। गोआ तो उन के पास था ही मुंबई भी उन के पास ही था जो बाद में एक ट्रीटी के तहत उन्होंने अंग्रेज़ों को दे दिया था। फ्रैंच तो 1954 में गए थे।

पछमी देशों की यह सारी की सारी कम्पनीआं सन 1600 के करीब ही बनी थीं। उस समय यूरपीन देशों की आपस में लड़ाइयां बहुत होती थीं जो ज़्यादा तर ट्रेड वार और कलोनिओं के लिए ही होती थी। 1588 में स्पेन और इंगलैंड की एक एतहासिक लड़ाई हुई थी, जिस में स्पेन ने बहुत बड़ी फ़ौज और समुंद्री जहाज़ों के साथ इंगलैंड पर आकर्मण किया था जिस को सपेंनिश आर्माडा कहा जाता है। उस वक्त इंगलैंड पर कुईन एलिज़बेथ 1 का राज था। इस की डीटेल में ना जाते हुए इतना ही लिखूंगा कि अंग्रेज़ों ने यह लड़ाई जीत ली थी क्योंकि उन के पास सर फ्रांसिस ड्रेक जैसा जैनरल था और स्पेनिश का बोल बाला खत्म हो गया था। इस के बाद ही 1601 में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई थी।

लेकिन अंग्रेज़ों से बहुत पहले तो पुर्तगाल के वास्कोडिगामा इंडिया के साथ ट्रेड करते थे क्योंकि वास्कोडिगामा तो 1498 में ही इंडिया की तरफ रवाना हो गया था और मैंने वह चर्च भी देखा है जिस में उस ने यात्रा शुरू करने से पैह्ले प्रार्थना की थी जो लिस्बन में है। बातों में बात निकल आई, बहुत दफा मैं सोचता हूँ कि जब वास्कोडिगामा इंडिया पहुंचा हुआ था, उस वक्त सिखों के पहले गुरु नानक देव जी 29 साल के जवान होंगे और मोदीखाने में काम कर रहे होंगे। फ्रेंच डच डेनज स्वीडिश और अँगरेज़ तो इंडिया में वास्कोडिगामा से बहुत बाद में आये थे।

इस में एक बात और भी है कि हज़ारों सालों से इंडिया पर हमले दर्रा खैबर के रास्ते ही होते आये हैं लेकिन सब यूरपीन समुन्दर के रास्ते ही आये थे, ईस्टर्न कोस्ट में बंगाल और साऊथ वैस्टर्न कोस्ट गोआ और मुंबई इस में शामिल थे। अब मैं असली बात पर आऊंगा जिस की वजह से मुझे यह सब लिखना पड़ा। जब यह यूरपीन जहाज़ आते थे तो उन को इंडिया में अपनी फैक्ट्रियों और जहाज़ों पर काम करने वाले मज़दूरों की जरुरत होती थी। मज़दूरों की इंडिया में कोई कमी नहीं थी। जवान लड़के इन शिपों में करते थे और इन को पगार भी बहुत कम मिलती थी लेकिन फिर भी इंडिया के सटैंडर्ड से उन को ज़्यादा पैसे मिलते थे। यूरपीन लोग इतनी पगार पर काम नहीं करते थे और यह कम्पनियां मुनाफे को ही मदेनजर रखती थीं। इन के शेअर होलडरों को डिविडेंड बहुत मिलता था। इन शिपों में काम करते करते कुछ इंडियन लोग यूरपी देशों में आ गए थे।

ईस्ट इंडिया कंपनी को जब इंडिया के साथ ट्रेड करने के लिए इजाजत मिल गई थी, जिस की वजह थी 1608 में सर थामस रो का इंडिया में आ कर बादशाह जहांगीर के दरबार में पहुंचना और जहांगीर के साथ इंगलैंड और इंडिया के दरमयान तजारत करने के लिए एक संधी करना जिस का ड्राफ्ट मैंने इंटरनैट पर पड़ा है, तो ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए भारत के दरवाज़े खुल गए थे । इस संधी के बाद इंगलैंड को इंडिया से जहाज़ मसाले और दुसरी चीज़ों से भरे जाते और इंगलैंड से मशीनों का बना सामान भारत आता जिस से ईस्ट इंडिया कम्पनी के शेयरों की कीमत भी बढ़ती जाती और डिविडेंड भी बहुत मिलता । बहुत लोग अमीर हो गए।

इंगलैंड में नैविगेशन ऐक्ट की वजह से शिपों में काम करने वाले अँगरेज़ मज़दूरों से अन्य मज़दूरों की संख्य एक चौथाई हो सकती थी, इसी लिए कम्पनी इंडियन मज़दूर भर्ती कर लेती थी क्योंकि उन को मज़दूरी कम देनी पड़ती थी और वह कुछ कह भी नहीं सकते थे। इन जहाज़ों में काम करने वाले इंडियन लोगों को लस्कर बोलते थे। अब एक नया काम भी शुरू हो गया था जिस में कुछ अँगरेज़ अफसर रिटायर होते समय कुछ इंडियन अपने साथ इंगलैंड को ले आते थे और उन से घर के सारे काम करवाते थे। पहले जितने भी इंडियन इंगलैंड आये वह ज़्यादा मुसलमान ही थे क्योंकि हिन्दू धर्म में बाहर जाना अच्छा नहीं समझा जाता था।

इस तरह इंगलैंड आये इंडियन लोगों के जब उन के अँगरेज़ मालक मर जाते तो उन के पास कोई काम नहीं होता था, इस लिए वह गलिओं में भीख मांगते थे। इन की हालत बहुत बुरी थी और कई अँगरेज़ तो इन लोगों पर बहुत ज़ुल्म करते थे। बंगाली लस्कर जब ऐसी स्थिति में होते थे तो उन के पास वापस इंडिया जाने के लिए कोई किराया भी नहीं होता था और न ही कोई काम। 1785 में एक अखबार ने इन लोगों की हालत बयान की कि बहुत से इंडियन भूख और ठंड से मर गए थे। कुछ अच्छे लोगों ने इन लोगों के लिए चैरिटी होम्ज स्थापित किये लेकिन यह इंडियन लोग इतने थे कि इन घरों में भेड़ बकरियों की तरह रहते थे क्योंकि जगह बहुत कम होती थी।

हैरानी की बात यह भी है कि एक ऐसा इंडियन भी था जो एक ईस्ट इंडिया कम्पनी के एक शिप का कैप्टन भी बन गया था और उस ने 1810 में लंदन का पहला इंडियन रैस्टोरैंट खोला था । इस शख्स का नाम था डीन मुहमेट ( शायेद दीन मुहमद हो ), बाद में उस ने एक काफी हाऊस भी खोला और कुछ देर बाद शैम्पू और मसाज़ पार्लर भी। इस के बाद वह आयरलैंड चले गया और एक गोरी से शादी करा ली। आयरलैंड में उस का मन नहीं लगा और वापस इंगलैंड के ब्राइटन शहर में रहने लगा।

अखबारों में इंडियन लोगों की ख़बरें बहुत आती रहती थीं कि बहुत इंडियन भूख और ठंड से मर रहे थे और इस के नतीजे से इन लोगों के लिए बोर्डिंग हाऊस बनाए गए लेकिन इन बोर्डिंग हाऊसों में इतने लोग होते थे की इन में भी बहुत मौतें होती थीं। 1842 में चर्च मिशनरी सोसायटी ने एक रिपोर्ट छाया की कि बाहर सड़कों पर चालीस इंडियन भूख और ठंड से मारे गए थे। इस के बाद कुछ क्रिश्चियन लोगों ने एक चैरिटी स्थापित की और 15000 हज़ार पाउंड इकठे किये और 1856 में स्ट्रेंजरज होम फौर दी एषीऐटिक खोला गया ताकि इन लोगों को बचाया जा सके।

इस के बाद बहुत इंडियन पुर्तगाली शिपों से काम छोड़ कर ईस्ट इंडिया कम्पनी के जहाज़ों में काम करने लगे क्योंकि अंग्रेज़ों के जहाज़ों में पुर्तगाली जहाज़ों से अच्छी सहूलतें होने लगी थीं और पगार भी ज़्यादा मिलती थी। 1857 की आज़ादी की लड़ाई के बाद 1858 में इंगलैंड की पार्लीमैंट ने ईस्ट इंडिया कम्पनी का रूल डीसौलव करके सीधा कराऊंन के अधीन कर लिया था जिस के नतीजे के तौर पर इंडिया में ईस्ट इंडिया कम्पनी की मनमानी खत्म हो गई थी। सारे इंडिया में स्कूल और कालज बनने लगे थे और इंडिया के लोग पड़ने लगे थे।

धीरे धीरे कुछ बच्चे इंगलैंड की यूनिवर्स्टीओं में भी पड़ने आने लगे थे जो बाद में इंडिया आ कर अच्छी अच्छी पोस्टों पर लग गए थे, जज वकील भी बनने लग पड़े थे। इस में ही गांधी नेहरू जैसे अनेक लोग थे जिन्होंने इंगलैंड में रह कर जान लिया था कि अँगरेज़ उन को लूट रहे थे और इन्होने ही आज़ादी के लिए संघर्ष किया और 1947 में भारत आज़ाद हो गया था। शायद यह इन लोगों के आंदोलनों का ही नतीजा था कि वर्ल्ड वार सैकंड के बाद जल्दी ही देश आज़ाद हो गया और साथ ही अन्य देश भी अंग्रेज़ों को छोड़ने पड़े।

वर्ल्ड वार सैकंड में इंगलैंड बैंक्रप्ट हो चुक्का था और इंगलैंड में अब देश की रीबिल्डिंग का काम शुरू हो गया था जिन के लिए इंगलैंड को लेबर फ़ोर्स की जरुरत थी, इस लिए इंडिया पाकिस्तान और वेस्ट इंडीज़ से बहुत लोग इंगलैंड आ कर फैक्ट्रिओं में काम करने लगे थे। इसी दौरान इंगलैंड में नैशनल हैल्थ सर्विस शुरू हो गई थी जिस में डाकटरों की बहुत जरूरत थी और यह डाक्टर इंडिया पाकिस्तान से आने शुरू हो गए। यही समय था जब हम भी 1962 में इंगलैंड पधारे थे। बस यही है इंगलैंड में इंडियन लोगों का चार सौ साल का छोटा सा इतहास।

चलता. . . . . . . . . .

 

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.

8 thoughts on “मेरी कहानी 134

  1. बहुत अच्छा लगता है आपका लेखन पढ़ना ….. बहुत सी नई बात जान रही हूँ
    सादर

    1. बहन जी , आप का बहुत बहुत धन्यवाद इस हौसला अफजाई के लिए .

  2. नमस्ते एवं हार्दिक धन्यवाद आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी। आपने इतिहास विषयक अच्छी जानकारी दी है। प्रोफेसर मैक्समूलर ने स्वीकार किया है उनके पूर्वज भारत से ही वहां गए थे। यह बात उन्होंने सायद पुस्तक “इंडिया व्हाट कैन इट टीच अस” में लिखी है। ऐसा सृष्टि की उत्पत्ति के कुछ हजार साल बाद होना संभव लगता है। इसके भी प्रमाण हैं कि आदि मानव सृष्टि त्रिविष्टिप अर्थात तिब्बत में हुई थी। यही से यह लोग सारी दुनिया में फैले थे. इनसे पूर्व संसार के किसी भूभाग पर कहीं कोई मनुष्य रहता नहीं था। यदि इस वैदिक प्रमाण पर विश्वास न किया जाय तो फिर यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर ने मानव सृष्टि संसार में कई स्थानों पर की थी। यह बात अनेक प्रमाणों, तर्क़ व युक्तियों से खंडित हो जाती है। सादर।

  3. नमस्ते एवं हार्दिक धन्यवाद आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी। आपने इतिहास विषयक अच्छी जानकारी दी है। प्रोफेसर मैक्समूलर ने स्वीकार किया है उनके पूर्वज भारत से ही वहां गए थे। यह बात उन्होंने सायद पुस्तक “इंडिया व्हाट कैन इट टीच अस” में लिखी है। ऐसा सृष्टि की उत्पत्ति के कुछ हजार साल बाद होना संभव लगता है। इसके भी प्रमाण हैं कि आदि मानव सृष्टि त्रिविष्टिप अर्थात तिब्बत में हुई थी। यही से यह लोग सारी दुनिया में फैले थे. इनसे पूर्व संसार के किसी भूभाग पर कहीं कोई मनुष्य रहता नहीं था। यदि इस वैदिक प्रमाण पर विश्वास न किया जाय तो फिर यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर ने मानव सृष्टि संसार में कई स्थानों पर की थी। यह बात अनेक प्रमाणों, तर्क़ व युक्तियों से खंडित हो जाती है। सादर।

      1. सादर नमस्ते एवं धन्यवाद आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी।

  4. प्रिय गुरमैल भाई जी, इंग्लैंड में इंडियन लोगों का चार सौ साल का इतिहास भले ही छोटा सा हो, लेकिन बहुत महत्त्वपूर्ण है. अति सुंदर व रोचक एपीसोड के लिए आभार.

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