पप्पू और पांच सौ का नोट

पप्पू को कई महीनों बाद पांच सौ के नोट के दर्शन हुए. उसकी खुशी का ठिकाना न रहा. बड़े जतन से उसे अपने पर्स में रखकर वह बड़ा-सा झोला लेकर शॉपिंग के लिए निकला. वह पास की ही एक ऐसी मार्केट में गया जहां सब चीज़ें मिलती थीं. उसने सोचा दूध भी ले आएगा, मदर डेयरी से सब्ज़ियां भी खरीद लेगा, किराने की दुकान से सीधा-सामान भी ले लेगा, पैसों की तंगी के कारण बहुत दिनों से दवाई नहीं ला पाया वह भी ले आएगा, बाल बड़े हो गए हैं नाई से बाल भी कटवा आएगा. कुछ रुपए बचे तो बच्चों के लिए नूडल्स, समोसे वगैरह भी ले जाएगा.

 
सबसे पहले पहुंचा सब्ज़ियां खरीदने मदर डेयरी में. उसे देखकर सब्ज़ियों के राजा प्याज़ की हंसी निकल गई. वह बोला, “पप्पू भाई, आज इधर कैसे आना हुआ?” पप्पू को गुस्सा आ गया. गुस्से में लाल-पीला होते हुए बोला, “अबे सड़े प्याज़, मुझे पप्पू कहने की तेरी हिम्मत कैसे पड़ी! वैसे तो तू मुझे पप्पू राजा कहा करता था?” प्याज़ कहां चुप रहने वाला था, बोला, “अब मैं सब्ज़ियों का राजा जो हो गया हूं.” पप्पू और भड़क गया. बोला, “तू कब से सब्ज़ियों का राजा हो गया! ताज तो बैंगन के सिर पर है न!” प्याज़ ने ज़रा नखरे से कहा, “लद गए ताज और टोपियों के दिन. अब तो सब अखबारों में मेरी ही चर्चा है. जहां एक बार सरकार ने प्याज़ का निर्यात खोला, मेरे दाम आसमान को छूने लग गए. घबराकर सरकार ने प्याज़ के निर्यात पर बैन भी लगा दिया फिर भी, मेरा भाव वही बना रहा. अरे मैं ही तो वह हस्ती हूं जो, किसी सरकार को गिरवाता हूं तो, किसी सरकार की ताजपोशी करवाता हूं.” पप्पू तो तब तक आगे बढ़ गया था. भिंडी को हाथ लगाने वाला ही था कि भिंडी बोली, “ज़रा ध्यान से छूना. माना नाज़ुक हूं लेकिन धीरे का झटका बहुत ज़ोर से लगाती हूं. कल एक आदमी मेरा दाम सुनते ही बेहोश हो गया था. शुक्र है कि मुझे उसने छुआ नहीं था वरना, मुझ बेचारी कोमल-सी कली पर हत्या का आरोप लग जाता.” उधर से करेलाराम बोले, “भाई, मेरे पास भी ज़रा संभल के आना. एक तो करेला हूं, दूसरा नीम चढ़ा यानी कड़वा हूं लेकिन, भाव में मैं भी किसी से कम नहीं हूं.” बेचारा पप्पू किसी तरह थोड़े-से आलू और टमाटर लेकर सौ रुपये की बलि चढ़ाकर खाली-खाली-सा झोला लटकाकर चल दिया.

 
किराने की दुकान पर भी उसे झटके-पर-झटका लगता चला गया. उसने सोचा था कि पांच सौ का नोट लेकर जा रहा हूं, दो-तीन किलो दालें तो ले ही आऊंगा. दाल का दाम सौ रुपये किलो सुनकर उसके तो होश ही उड़ गए सबसे सस्ती दाल एक किलो ही ले पाया. उधर बिस्कुटों के दाम मुंहं बिचका रहे थे. वहां से भी खाली-खाली-सा झोला लटकाकर दवाई की दुकान पर चल दिया.

 
दवाई लेनी तो ज़रूरी थी लेकिन उसके बाद उसके पास या तो दूध के पैसे बचते थे या बाल कटवाने के. दूध लेना तो ज़रूरी था ही क्योंकि बच्चों को चाहे दूध पीने को न दे पाए पर, चाय पर तो उनका हक बनता ही था. बाल भी कटवाने बहुत ज़रूरी थे क्योंकि अब तो साथी उसके बढ़े बालों को देखकर टोका-टाकी करने के साथ चोरी-चोरी चुपके-चुपके हंसने भी लगे थे. सो उसने सोचा कि बिना दवाई के अब तक तो चल ही रहा था, अब भी चलता ही रहेगा सो, उसने दवाई लेने का आईडिया ही ड्रॉप कर दिया. नाई से बाल कटवाते-कटवाते हुए वह सोच रहा था कि, पांच सौ का नोट भी कुछ कर नहीं पा रहा तो, ज़िन्दगी कैसे चलेगी. मिरर में नाई उसकी सोचती हुई गंभीर मुद्रा को देखकर बोला, “बाबूजी, आप महंगाई के बारे में सोच रहे हो ना! सोचो-सोचो. सब सोच रहे हैं, आप भी सोचो. सोचने पर कोई पाबन्दी थोड़े ही ना है? रोज़ सरकार ही दूध के दाम, तेल के दाम, गैस के दाम, अनाज के दाम बढा रही है, ऊपर से भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का तड़का, इसीलिए तो अन्ना भड़का लेकिन, अन्ना के भड़कने से क्या होगा! कुछ प्रस्ताव पास हुए कुछ वादे किए गए केवल मामले को ठंडा करने के इरादे से. इसलिए आम आदमी सोचने के सिवाय और कर भी क्या सकता है? आपका बड़ा-सा खाली-खाली-सा झोला भी खामोशी से यही दास्तां कह रहा है. वे दिन फ़ाख़्ता हो गए जब मुट्ठी भ्रर पैसों से बहुत कुछ आ जाता था अब तो थैला भर पैसों से कुछ-कुछ ही आ पाता है.

 
पप्पू वहां से निकला तो उसे एक किस्सा याद आ गया. कुछ दिनों पहले जब पप्पू बेरोज़गार होने के कारण इधर-उधर भटकते हुए एक कुंएं के पास पहुंचा तो, कुंएं के पास एक डड्डू अठखेलियां कर रहा था. पप्पू ने मज़ाक में उससे उसका नाम पूछा तो डड्डू ने कुंएं में छलांग लगा दी. पप्पू को उसका नाम पूछने पर बड़ा अफसोस हुआ और बोला, “भाई, मैंने तो केवल तेरा नाम ही पूछा था, तुझे आत्महत्या करने की क्या ज़रूरत थी!”

 
आज पप्पू का भी मन कर रहा था कि खाली-खाली-सा झोला लेकर घर जाने के बजाए आत्महत्या करने का मन कर रहा था पर, फिर अपनी बेचारी-सी पत्नि और मासूम-से बच्चों का ध्यान आते ही मायूसी से घर की ओर चल पड़ा. बेचारा बच्चों के लिए नूडल्स, समोसे वगैरह भी नहीं ले पाया. उसका पांच सौ का नोट भी कोई करिश्मा नहीं दिखा पाया.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।