कहानी : अमीरी

“अरे अभी तक तैयार नहीं हुई क्या?…..कितनीं देर और लगाओगी ?” ड्राइंग हॉल में बैठे राघव ने जोर से आवाज लगाते हुए कहा ।
“बस थोड़ी देर और …” कविता ने अपने कमरे से जबाब दिया

कविता ने दीवार से लगी एक बड़ी सी अलमारी खोली और उसमे टंगी ढेरो साड़ियां पर नजर डाली , सभी साड़ियां एक से एक सुंदर और महंगी ।कविता कुछ देर तक उन्हें निहारती रही फिर कुछ सोच के अलमारी के सबसे नीचे वाली दराज खोल के एक साड़ी निकली , गुलाबी रंग की यह साड़ी ज्यादा ज्यादा महंगी नहीं लग रही थी पर देखने में सुंदर थी ।
कविता ने साड़ी हाथ में ली और प्यार से हाथ फेरा और मुस्कुरा दी । दरअसल यह साड़ी कविता को उसकी माँ ने दिया था शादी के समय , माँ ने कितने प्यार से यह साड़ी उसे दी थी ।

कविता कुछ याद करती हुई खो गई। कविता एक गरीब परिवार से थी ,पिता की प्राइवेट जॉब और माता ग्रहणी ।कविता एक इकलौती संतान थी अतः बड़े लाड़ प्यार से पली बड़ी थी ,माता पिता गरीब होने के बाद भी कविता का पूरा ध्यान रखते थे ।कविता पढ़ने में होशियार होने के साथ साथ बेहद खूबसूरत थी ।पिता ने गरीबी में रह के भी कविता को एक प्रतिष्टित कॉलेज से स्नातक की डिग्री दिला दी थी उसके बाद उसकी शादी के लिए लड़का खोजने लगे थे ।

परन्तु कविता एक महत्वकांक्षी लड़की थी , उसे गरीबी पसन्द नहीं थी ।वह हमेशा बड़े बड़े सपने देखती ,कार, बड़ा सा घर , नौकर , महंगे होटलो में खाना आदि उसके सपने थे ।वह कॉलेज के दिनों में जब अपनी अमीर सहेलियों को पैसे उड़ाती देखती तो उसे अपने ऊपर शर्म आती उनके महंगे कपडे और महंगी गाड़ियां देख कर वह रोमांचित हो जाती ।
माँ बाप द्वारा अपनी इन इच्छाओं को पूरी न होने से उसका स्वभाव चिढ़चिढ़ा और गुस्सैल सा हो गया था , माता पिता द्वारा उसकी यथासम्भव इच्छाओ को पूरा करने के बाद भी वह आये दिन उन्हें ताने मारती रहती थी ।

कविता को अपने कॉलेज के दिनों में एक लड़के केशव से प्यार भी हुआ था परन्तु जब उसे पता चला कि केशव साधारण परिवार से है तो उसने उसके साथ रिश्ता तोड़ लिया।अपनी इसी अमीरी की महत्वकांक्षा से चलते कविता ने अपने पिता द्वारा तय किये किसी युवक से शादी नहीं की बल्कि अपनी मर्जी से अपने से ज्यादा उम्र के राघव से शादी कर ली थी जो बहुत ही अमीर था परन्तु विधुर था, उसकी पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। राघव से कविता को उसकी एक सहेली ने मिलाया था जो रिश्ते में राघव की बहन लगती थी। जब राघव ने कविता को देखा तो उस पर मोहित हो गया, कविता तो पहले ही किसी अमीर से शादी करना चाहती थी अतः दोनों को ज्यादा समय नहीं लगा एक होने में। कविता के माँ बाप ने बहुत समझाया परन्तु कविता नहीं मानी और राघव से विवाह कर ही लिया।

पर मेल बड़ा बेमेल था, कंहा कविता के माँ बाप गरीब और कँहा राघव बेहद अमीर। कविता के पिता जितना कमाते थे उससे अधिक राघव अपने नौकर को सेलरी दे देता था । राघव का बड़े बड़े लोगो से मेल जोल और बिजनेस लिंक थे अतः उसने अपनी रेपुटेशन बचाने के लिए शादी का सारा खर्चा खुद ही उठाया था, महंगे फार्महाउस में शादी की और एक सेवन स्टार होटल में रिशेप्शन ।कविता बहुत खुश थी ,जैसा वह चाहती थी वैसी ही विलासिता भरा जीवन उसके आगे था ।

आज राघव के एक रिस्तेदार के घर पार्टी थी,उसी में जाने की तैयारी चल रही थी । राघव पहले तैयार होके बैठा था और कविता तैयार हो रही थी ।

कविता को न जाने क्या सूझा की उसने माँ की दी हुई साड़ी पहन ली और हल्का मेकअप किया और तैयार होके बहार आ गई । राघव ने जब कविता को उसकी माँ ही दी हुई सस्ती साड़ी पहने हुए देखा तो आग बबूला होते हुए बोला –
“ये क्या है ? ये घटिया साड़ी आज के ही दिन पहने को मिली है तुम्हे …. तुम्हें पता है कि बड़ी पार्टी है और कितने अमीर लोग आयेँगे वंहा ? और कोई जेवर भी नहीं पहना तुमने !”

“पर ये मेरी माँ की दी हुए साड़ी है … घटिया क्यों कह रहे हो?” कविता को भी गुस्सा आ गया था ।

“घटिया है घटिया ही कहूँगा …. ऐसी सस्ती साड़ी तो हमारे घर की नौकरानियां भी नहीं पहनेगी … चलो अभी उतारो इनको “राघव ने तेज गुस्से और चीखते हुए कहा ।

पर कविता अपनी माँ की दी हुई साड़ी उतारना नहीं चाहती थी, इसलिए बात बढ़ गई । राघव ने गुस्से में आके कविता को दो तीन थप्पड़ मार दिए और गन्दी गन्दी गालियां बकने लगा। उसका एक थप्पड़ कविता के आँख के पास लगा जिससे आँख के पास काला निशान बन गया था और सूजन आ गई थी । कविता रोती हुई फिर दुबारा अपने कमरे में भागी, उसका खिला हुआ चेहरा मुरझा गया था ।

ऐसा पहली बार नहीं था जब राघव ने कविता की पिटाई की थी , कई बार वह देर रात नशे में धुत्त होके आता तो टोकने पर कविता की पिटाई करता, अब तो कविता ने यह भी सुना था की उसकी पहली पत्नी की भी मौत का कारण राघव ही था ।पर कविता कर क्या सकती थी आखिर राघव से शादी उसने अपनी मर्जी से की थी ।

कविता ने दूसरी महंगी साड़ी पहनी और राघव के विदेश से लाये कीमती गहने शरीर पर लादे और राघव के सामने आ खड़ी हुई । राघव ने उसका हाथ पकड़ा और लगभग खिचता हुआ बाहर पार्किंग में खड़ी कार की तरफ ले गया। बीच में वह बड़बड़ाया – “हरामज़ादी हमेशा देर करती है ”

कार में बैठने के बाद राघव ने कार स्टार्ट कर दी और जल्दी ही सड़क पर कार दौड़ने लगी । कविता कार की खिड़की से
बाहर देख रही थी, रात का समय होने के कारण सड़क के किनारे लगे कतारबद्ध लाईट्स पीछे भागती हुई लग रही थीं ।सड़क के किनारे दुकाने सजी थी लोग आ जा रहे थे, कविता को अपने पुराने दिन याद आ रहे थे जब वह अपने माता।पिता के घर थी ।कितने सुखी और अल्लहड़ दिन थे , पापा के साथ वह सड़क के किनारे लगी गोलगप्पो ठेली से गोलगप्पे खाती , उछल कूद करती ,पापा मम्मी कितना प्यार करते थे उसको …उसके इतने जिद्दी होने के बाद भी पापा ने कभी एक थप्पड़ तक नहीं मारा था …और आज … राघव के घर में कैद होके रह गई है …राघव की रोज पिटाई खाने की आदत बन गई है उसकी … कविता की आँखों से दो आंसू निकले और गालो तक लुढ़क गए ।

और हाँ वह लड़का केशव भी तो याद है, कितना प्यार करता था .. पागल था वह उसके पीछे। कविता पुराने ख्यालो में खो गई , उसका मन कर रहा था की कार का दरवाजा खोल के कूद जाए और लौट जाए अपनी पुरानी दुनिया में ।

तभी अचानक कार के ब्रेक लगने से उसकी ध्यान भंग हुआ ,वे गंतव्य पर पहुँच चुके थे । कविता ने देखा तो यह एक आलीशान होटल था, होटल के बड़े से लॉन में पार्टी का इंतजाम किया हुआ था ।सैकड़ो तरह के व्यंजनों की कतारे लगी हुई थीं , एक तरफ एक स्टेज लगा हुआ था जिसपर कोई मॉडल गायिका कम कपडे पहने गाना गा रही थी ।सफ़ेद ड्रेस पहने वेटर इधर उधर बैठे मेहमानो की फरमाइशें पूरी कर रहे थे । शहर की लगभग हर नामचीन हस्ती वंहा थी, ग्रेंड पार्टी।

राघव और कविता एक सोफे पर बैठ गए, वेटर ने कोलड्रिंक सर्व की दोनों को । थोड़ी देर में राघव के बहुत से रिस्तेदार और जानकार भी वंहा आ गए , सबसे मिलने की औपचारिकता पूरी करी। रिस्तेदार महिलाओं ने जब कविता को देखा तो उनकी नजरे कविता के जेवरों पर गई। एक ने कहा ” ओह!ब्यूटीफुल … कितना अच्छा नेकलेस है … ”
” मौसी जी ये अफ़्रीकी डायमंड हैं … न्यू यॉर्क से लाया हूँ ” राघव ने बीच में बोलते हुए कहा और गर्व से मुस्कुरा दिया ।

अधिकतर वहाँ उपस्थित महिलाओं ने कविता के नेकलेस को छू के देखा और तारीफ की , कोई उसकी कीमती साडी की तारिफ़ कर रहा था तो कोई उसे पहने जेवरों की …. पर आस्चर्य की किसी ने भी कविता की आँख के नीचे बने थप्पड़ के काले निशान और सूजी हुई आँख की तरफ एक बार भी नहीं देखा और न ही इसका कारण पूछा ।

कविता को लग रहा था की वह एक मूर्ति है और उसपर जेवर और कपडे इसलिए पहना दिए गए हैं ताकि राघव उनकी नुमाइश कर तारीफ बटोर सके ।

आह!!उसका मन सब छोड़ के भाग जाने का कर रहा था ….वह उन साड़ी -जेवरों को नोच के फेंक देना चाहती थी पर …पर यही सब तो वह चाहती थी शुरू से … महंगी गाडी, महंगे कपडे , जेवर , होटल … पर आज वह चीख चीख के कहना चाहती थी की उसे नहीं चाहिए यह सब…!

—  केशव ( संजय )

परिचय - संजय कुमार (केशव)

नास्तिक .... क्या यह परिचय काफी नहीं है?