भाषा-साहित्य

हिन्दी पत्रकारिता एवं भाषा

भाषा और साहित्य की समृद्धि तथा भाषा भाषियों की संख्या की दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दी महत्वपूर्ण भाषाओं में से एक है।हिन्दी राष्ट्रभाषा और सम्पर्क भाषा दोनों रूपों में भारत के साथ-साथ विदेशों में भी व्यवहृत हुई है और इसका सबसे बड़ा श्रेय जाता है हिन्दी पत्रकारिता को ।
आज उत्तरोत्तर हिन्दी समाचार पत्रों की पाठक संख्या बढ़रही है,जिसे देखकर कहा जा सकता है कि हिन्दी पाठकों कीसंख्या में भी बढ़ोतरी हो रही है। यह बहुत अच्छा संकेत है,लेकिन साथ ही साथ हम इस बात को भी नकार नहीं सकते कि कुछ अच्छी पत्र- पत्रिकाएं, साप्ताहिक, मासिक- त्रैमासिक बंद भी हो रहे हैं ।दोनों कारणों पर यदि गहराई से विचार किया जाए तो एक कारण तो यह देखने में आ रहा है नव साक्षरों में, नये पत्रकारों में समाचारों को बटोरने की भूख तो लगी हुई है,पर गम्भीर साहित्य पढ़ने का, उस पर मनन करने का समय किसी के पास नहीं ।
यदि समय होता तो न जाने कितनी साप्ताहिक, मासिक पत्र -पत्रिकाएं बन्द ना होती।
नि:सन्देह हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या भी बढ़ रही है ,लेकिन अहिन्दी क्षेत्रों के हिन्दी पाठक भी साहित्य और संस्कृति को अपनी ही भाषा के माध्यम से समझना चाहता है,इसीलिए अब हिन्दी पत्र पत्रिकाओं के सम्पादकों को हिन्दी की क्षेत्रीय प्रादेशिकता से स्वयं को ऊपर उठाना होगा।
पत्रकारिता की भाषा पर चर्चा करते हुए यह कहा गया है कि आम आदमी की भाषा ही पत्रकार की भाषा होनी चाहिए, पर इसका यह अर्थ भी नहीं कि अशुद्ध भाषा का ही प्रयोग होने लगे। कई बार देखा गया है कि सुनी -सुनाई बातों पर जो समाचार बनाए जाते हैं या मेज़ पर बैठे -बैठे एकत्रित समाचारों व टिप्पणियों के आधार पर जो लेख,,समाचार तैयार किए जाते हैं उससे पत्रकारिता अवश्य दूषित होगी।
प्राय:अपनी योग्यता सिद्ध करने हेतु कठिन शब्दों व अप्रचलित शब्दों को लेकर समाचार बनाए जाते हैं ।जिससे भाषा अपना महत्व एवं रूप ही खो देती है अर्थात् अर्थहीन हो जाती है।पत्रकारिता के सन्दर्भ में सबसे अहम एवं मुख्य तत्व है भाषा का सरलता,सहजता व माधुर्यपन से भरपूर होना।पत्रकारिता को मात्र व्यवसायिक नहीं बनाना चाहिए बल्कि उसमें सत्य को ढूंढ़ने की सहज प्रवृत्ति का होना भी अत्यावश्यक है।
आज हम जिस पत्रकारिता की हम बात कर रहे हैं उसका शुभारम्भ १८२६ में श्री जुगल किशोर शुक्ल ने “उदंत मार्तंड ” पत्र निकाल कर किया था।इसके बाद हिन्दी पत्रकारिता को कई कठिनाइयों व चुनौतियों का सामना करना पड़ा।उसके बाद प्रतापनारायण मिश्र जी ने ” ब्राह्मणपत्र” कलकत्ता से भारत मित्र,बंगवासी आदि पत्र निकले।इन पत्रों ने हिन्दी पत्रकारिता ,हिन्दी लेखन में और तत्कालीन समाज के प्रति अपना सहयोग दिया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात तो पत्र पत्रकाओं की बाड़ -सी आ गयी।एक सर्वेक्षण के आधार पर आज ९०० से अधिक पत्र पत्रिकाएं निकल रही हैं।
महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन में हिन्दी पत्रकारिता के योग दान पर चर्चा करते हुए कहा भी गया है कि स्वतन्त्रता से पूर्व हिन्दी पत्रकारिता ने जो सराहनीय कार्य किया ,स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद अपनी भूमिका नहीं निभाई।हमें अपने अतीत से भी कुछ सीखना होगा।वास्तव में देखा जाए तो देश के सांस्कृतिक, साहित्यिक और राजनीतिक जागरण में हिन्दी पत्रकारिता ने अपना भरपूर सहयोग दिया है,इसलिए समाचार पत्रों को जनता के हृदय की आवाज होना चाहिए ।
आज पत्रकारिता अपनी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभा पा रही।सबसे बड़ी बात पत्रकारिता भाषा शद्धिकरण को भूलती जा रही है।भाषा की शद्धता की ओर तो किसी की दॄष्टि जा ही नही रही।जिसका कारण है पत्र व पत्रकारिता को उपहास का पात्र बनना पड़ता है।एक छोटा -सा उदाहरण देना गलत नहीं होगा।हिन्दी समाचार पत्र में लिखा-“मन्त्री का वेलकम फलावर देकर किया”।दूसरी जगह देखिए “पुलिस ने चार लोगों को अरेस्ट किया।”
हम मानते हैं कि हिन्दी भाषा में विदेशी शब्दों को स्थान मिला है,,पर इसका यह अर्थ नहीं की अपनी मातृभाषा का रूप ही बिगाड़ दें।हिन्दी पत्रकारिता को खिचड़ी भाषा में ना परिवर्तित करें ।सरकारी पत्रकारिता पर विचार करते हुए कहा गया है कि सरकारी तन्त्र के पत्रकारों और निजी पत्रकारों की अपनी-अपनी सीमाएँ हैं ।दोनों अपनी नीति का पालन करते हैं । कई बार देखने में भी आता है कि सरकारी पत्र पत्रिकाएं जितना निष्पक्ष और दायित्व पूर्ण कार्य करती हैं उतना गैर सरकारी पत्र -पत्रिकाएं भीनहीं करती।पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य सामान्य पाठक को ध्यान में रखकर लिखा जाए।इसमे भी कोई दो राय नहीं कि इसे व्यवसाय के रूप में लिया जाए लेकिन अपनी आत्मा को स्वतन्त्र रखकर।तभी पत्रकारिता अपना उद्देश्य पूरा कर पाएगी।इतना धयान रखना होगा-” हिन्दी है अपनी बोली,
इसका सब सम्मान करो।
स्वतन्त्र देश में हिन्दी का,
अपमान ना हो यह ध्यान करो।

— डा. सुरेखा शर्मा

परिचय - सुरेखा शर्मा

सुरेखा शर्मा(पूर्व हिन्दी/संस्कृत विभाग) एम.ए.बी.एड.(हिन्दी साहित्य) ६३९/१०-ए सेक्टर गुडगाँव-१२२००१. email. surekhasharma56@gmail.com

Leave a Reply