ईश्वर-जीवात्मा-प्रकृति विषयक अविद्या विश्व में अशान्ति का कारण

ओ३म्

 

संसार में लोग उचित व अनुचित कार्य करते हैं। अनुचित काम करने वालों को सामाजिक नियमों के अनुसार दण्ड दिया जाता है। न केवल सामान्य मनुष्य अपितु शिक्षित व उच्च पदस्थ राजकीय व अन्य मनुष्य भी अनेक बुरे कामों को करते हैं जिनसे देश व समाज कमजोर होता है और इसके परिणाम से समाज में अशान्ति उत्पन्न होती है। मनुष्यों के गुण, कर्म व स्वभाव में काम, क्रोध, ईष्र्या, द्वेष, महत्वकांक्षायें व स्वार्थ आदि के कारण ही विश्व में अनेक विचारधाराये हैं व इसी से अनेक देश, मत व सम्प्रदाय आदि बने हैं। इन अवगुणों बुरे कामों का मूल कारण अविद्या वा मिथ्या ज्ञान है। यदि अविद्या मिथ्या ज्ञान है तो फिर विद्या क्या है? विद्या सद्ज्ञान, यथार्थ वा सच्चे ज्ञान को कहते हैं। जो पदार्थ जैसा हो उसे वैसा ही जानना, उससे भिन्न जानना मानना, ही विद्या है। इसके भी दो भाग है हैं एक परा विद्या और दूसरी अपरा विद्या। इनमें एक आध्यात्मिक ज्ञान है तो दूसरा भौतिक पदार्थों का ज्ञान। भौतिक पदार्थों के यथार्थ ज्ञान न होने से भी हानि होती है परन्तु सच्चा यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान न हो, कम व अधूरा हो, तो महत् वा बड़ी हानि होती है। प्रश्न है कि यह आध्यात्मिक ज्ञान क्या बहुत कठिन व जटिल है जिसे मनुष्य समझ नहीं सकता? इसका उत्तर है कि ऐसी बात नहीं है। आध्यात्मिक ज्ञान कठिन व जटिल नहीं है परन्तु इसके आसक्तियों से मुक्त होना पड़ता है और इसका लाभ कालान्तर में मिलता है। इस सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान में कोई जोखिम नहीं होता। आध्यात्मिक ज्ञान के विपरीत मिथ्या ज्ञान में हम काम, क्रोध, इच्छा व द्वेष आदि के वशीभूत होकर, तात्कालिक लाभों के लिए, हम गलत काम कर बैठते हैं जिससे कालान्तर मे भारी होनी होती है। क्योंकि जीव वा जीवात्मायें कर्म करने में स्वतन्त्र हैं अतः इसे अपने असत्य व बुरे कर्मों का दण्ड मिलता है जिससे इसकी उन्नति होने के स्थान पर अवनति होती है।

 

अध्यात्म के क्षेत्र में मिथ्या ज्ञान देखना हो तो हम उसे मूर्तिपूजा, कब्र-पूजा, स्थान विशेष को पवित्र मानना, ईश्वर का अवतार मानकर उनकी पूजा, व्यक्ति पूजा, कल्पित देवी-देवताओं आदि की पूजा, किसी मनुष्य को एकमात्र ईश्वर का पुत्र या ईश्वर का सन्देशवाहक मानना व वैदिक विधि के विपरीत विधि से अग्निहोत्र यज्ञ आदि करना, यह व ऐसे सभी कार्य व अनुष्ठान इसके अन्तर्गत आते हैं। स्थान विशेष को तीर्थ मानना व वहां जाकर पूजा-अर्चना व अन्य-अन्य धार्मिक कृत्य आदि से धर्म लाभ मानना भी अविद्या ही है जिससे मनुष्य को किसी प्रकार कोई लाभ न होकर उसकी सामयिक हानि सहित उनका अपना, देश का व समाज का अहित होता है। इसका कारण यह है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरुप, अजन्मा, अनादि, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वाधार, कर्मफल देने वाला है, ऐसे ईश्वर में अनेक गुण हैं। अजन्मा का जन्म व अवतार नहीं हो सकता और निराकार का आकार न होने से उसकी मूर्ति नहीं बन सकती। अब यदि यह बात है तो फिर निराकार ईश्वर की पूजा वा स्तुति-प्रार्थना-उपासना कैसे हो सकती है? इसका उत्तर यह है कि ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना ही वस्तुतः पूजा है। इसके लिए हमें ईश्वर के यथार्थ गुणों का पाठ कर, बोल कर मौन रहकर ध्यान की अवस्था में, करना होता है। बहुत से गुण ईश्वर में है और कुछ नहीं भी है। जैसे ईश्वर सच्चिदानन्द आदि गुणों से युक्त है तथा आकार, जड़ता, विकार, अविद्या आदि से रहित है।

 

अतः ईश्वर को सच्चिदानन्द मानकर उसकी स्तुति व ध्यान करना सगुण उपासना कही जाती है और ईश्वर में आकार, जड़ता, विकार व अविद्या न होने के कारण उन गुणों को जानकर ईश्वर के उनके पृथक होने से उसका जो गुणानुवाद किया जाता है वह निर्गुण उपासना कही जाती है। इस उपासना को बैठ कर, लेट कर व खड़े होकर, किसी भी आसन में, किया जा सकता है परन्तु इस कार्य के लिए सुखासन वा पद्मासन आदि में करना अधिक लाभदायक एवं उद्देश्य को पूरा करने वाला होता है। पूजा स्तुतिप्रार्थनाउपासना का अभिप्राय क्या है? इसका प्रथम अभिप्राय ईश्वर के उपकारों के लिए उसका धन्यवाद करना है। इसका दूसरा अभिप्राय ईश्वर से मित्रता, प्रेम मेल करना है जिससे उपास्य ईश्वर के गुण जीवात्मा में प्रविष्ट हो सके। इसे जल-स्नान के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। गर्मियों में गर्मी से संतप्त मनुष्य यदि किसी नदी, सरोवर, कुवें वा नल की शीतल जलधारा में स्नान कर ले तो यह एक प्रकार से शरीर की जल उपासना हो जाती है जिससे शरीर की गर्मी कम व समाप्त होकर, शरीर जल के गुण शीतलता को धारण कर लेता है। ईश्वर की ध्यान व स्तुति द्वारा प्रार्थना व उपासना करने से भी जीवात्मा के काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, मिथ्या ज्ञान व अविद्या आदि दुगुर्ण दूर होकर इनका स्थान निष्कामता, अक्रोध, लोभ- ईर्ष्या-स्वार्थ रहितता ले लेते हैं एवं मिथ्या ज्ञान धीरे-धीरे दूर होता रहता है जो ईश्वर के ध्यान-योगाभयास, स्वाध्याय व वेदाध्ययन से कालान्तर में समाप्त हो जाता है। यह परिणत-स्थिति सभी धर्मों व मतों के आचार्यों के साथ उनके अनुयायियायें की भी होनी चाहिये। परन्तु वर्तमान वातावरण में सभी मतों सम्प्रदायों के आचार्य अनुयायी इस मिथ्या ज्ञान अविद्या आदि से दूर होने के स्थान पर इससे ग्रस्त हैं। यही अविद्या आदि सभी सामाजिक एवं धार्मिक समस्याओं सहित राष्ट्रीय अन्तराष्ट्र्रीय समस्याओं का कारण है।

 

अविद्या व्यक्ति, समाज व देश आदि की सभी समस्याओं का कारण किस प्रकार से है, इसे समझना आवश्यक है। अविद्या मिथ्या ज्ञान होने के कारण हम यह निर्धारित नहीं कर पाते कि इस संसार को बनाने वाला ईश्वर है या नहीं? है तो कैसा है और नहीं है तो क्यों नहीं है? मनुष्य व अन्य प्राणियों के शरीरों को देखकर इनमें जड़ भौतिक शरीर सहित सभी शरीरों में एक चेतन तत्व जीवात्मा की विद्यमानता का ज्ञान भी होता है। यथार्थ ज्ञान व विज्ञान के नियमों से भी हम यह जानते हैं कि संसार का मूल पदार्थ अनुत्पन्न है और इसका नाश जिसे अभाव कहते हैं, वह कभी नहीं होता। इसका अर्थ यह है कि जो पदार्थ संसार में आंखों से प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं व जो दिखाई न देकर केवल अनुभव होते हैं व जो अदृश्य पदार्थ तर्क एवं युक्ति सहित प्रयोगों के आधार पर सिद्ध हैं, उनका अस्तित्व व सत्ता होने से उनका मूल कारण अनादि, अनुत्पन्न व नित्य सिद्ध होता है। कोई भी कार्य उसमें प्रयुक्त कारण पदार्थों से ही अस्तित्व में आता है। रोटी बनाने में मुख्य कारण आटा और सहायक कारणों में अग्नि, जल व चूल्हा आदि हुआ करते हैं। यह अन्न आदि भौतिक पदार्थ किसी सूक्ष्म पदार्थ, त्रिगुणात्मक प्रकृति, से बने हैं। इसे शास्त्राध्ययन व प्रवचन सुनकर जाना व समझा जा सकता है। यह प्रकृति जड़ पदार्थ है जिसमें ज्ञान की स्वतः क्रिया का अभाव होता है। दूसरे पदार्थ चेतन हैं जिनमें ज्ञान व क्रिया का गुण देखा जाता है। प्रत्येक शरीर में एक सूक्ष्म जीवात्मा के रुप में एक चेतन तत्व है जो एकदेशी, ससीम होने के साथ अनादि, अनुत्पन्न, शाश्वत, सनातन व नित्य तथा सत्-चित्त गुण युक्त है। दूसरा चेतन पदार्थ बृहद व व्यापक स्वरूप वाला है जो सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सत्-चित्त-आनन्द-स्वरुप, अविनाशी, अनादि, अनुत्पन्न, सनातन, शाश्वत्, नित्य, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान आदि गुणों वाला है।

 

इसी को ईश्वर, परमात्मा, परमेश्वर, ब्रह्म, परमगुरू, सृष्टिकर्ता, घटघटवासी, जीवात्मा के जन्म मृत्यु का कारण और कर्मों के फलों सहित मोक्ष का प्रदाता है। ईश्वर में अनन्त गुण सिद्ध होते हैं और इसका ऐसा ही वर्णन व्याख्यान वेदों में है। यही विद्या है। इसे यदि संसार के सभी मत-मतान्तर, धर्म व सम्प्रदाय एवं पन्थों के आचार्य व अनुयायी जान लें व मान लें तो सभी मत-पन्थ मिलकर एक हो सकते हैं। ऐसा होने पर मत-पन्थों के सभी झगड़े व विवाद भी समाप्त हो सकते हैं। यदि सभी मत-पन्थों के अनुयायी न भी जान सकें तब भी सभी मतों के आचार्यों के अविद्या से मुक्त और विद्या से संयुक्त कराने का कार्य संवाद, परस्पर गोष्ठी, वार्ता, शास्त्रार्थ व वाद आदि के द्वारा किया जा सकता है। यह ऐसा ही कार्य है जैसे वर्तमान में अनेक विभागों व संस्थाओं आदि को मिलाकर वा उनका विलय merger कर एक किया जाता है। ऐसा करके परस्पर के अधिकांश विवाद, झगड़े व समस्यायें समाप्त हो जाते हैं। जब ऐसा करके सभी मत-पन्थ एक हो जायेंगे तो सभी मतों के अनुयायियों को भी अनिवार्यतः एक होना ही होगा जिससे परस्पर के झगड़े दूर होकर परस्पर प्रेम व सहयोग के नए युग का सूत्रपात हो सकता है। इसके लिए विलीन सत्य धर्म के सभी आचार्यों को मिलकर अविद्या को दूर करने के लिए सामूहिक प्रयास व पुरुषार्थ द्वारा प्रचार करना होगा जिसका परिणाम सकारात्मक ही होगा। मत-मतान्तरों की अविद्या दूर होने से भिन्न भिन्न देशों की परस्पर जो समस्यायें हैं वह भी एक दूसरे से विद्यायुक्त संवाद अथवा वेद व वेदानुकूल शास्त्रों एवं परस्पर विचारों के आदान-प्रदान से हल हो सकती हैं। महर्षि दयानन्द ने अपने समय में इसके लिए प्रयत्न किया था और दिल्ली दरबार के अवसर पर सभी मतों के आचार्यों को आमंत्रित कर एक्य सम्पादन कराने की दिशा में पहल की थी। मेला चान्दापुर का शास्त्रार्थ वा धर्म-चर्चा के केन्द्र में भी यही विचार था कि सत्य एक है और वह सभी मतों व उनके आचार्यों द्वारा स्वीकारणीय है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश भी इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए रचा है जो उसकी अन्तःसाक्षी से सिद्ध है।

हमने ऋषि दयानन्द के विचारों का अध्ययन किया है और यह पाया है कि संसार में सभी समस्याओं का हल वेदों के ज्ञान द्वारा अविद्या के नाश से ही सम्भव हो सकता है। हम पाठकों से निवेदन करते हैं कि वह इस पर विचार करें और अपने विचारों से हमें लाभान्वित करें। इति।

 

मनमोहन कुमार आर्य

 

परिचय - मनमोहन कुमार आर्य

नाम मन मोहन कुमार आर्य है. आयु ६३ वर्ष तथा देहरादून का निवासी हूँ। विगत ४५ वर्षों से वेद एवं वैदिक साहित्य सहित महर्षि दयानंद एवं आर्य समाज के साहित्य के स्वाध्याय में रूचि है। कुछ समय बाद लिखना आरम्भ किया था। यह क्रम चल रहा है। ईश्वर की मुझ पर अकथनीय कृपा है।