धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

दक्षिण भारत में आर्यसमाज का प्रचार और उसका संक्षिप्त परिचय

ओ३म्   महर्षि दयानन्द (1825-1883) गुजरात में जन्में, मथुरा में पंजाब में जन्में गुरु विरजानन्द सरस्वती से संस्कृत व्याकरण व आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन कर उनकी महत्ता को उन्होंने समझा और इसके बाद वर्तमान के उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र, बंगाल, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली आदि अनेक प्रदेशों व स्थानों में प्रचार किया। दक्षिण भारत में उन्हें […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कितना चलूँ सम्हलकर किस्मत ये फिसल जाती है देखा कि देखते देखते तक़दीर बदल जाती है। जाने कैसी मजबूरी है अपने पर अपना ज़ोर नहीँ साँसों की लड़ी रफ्ता रफ्ता सीने से निकल जाती है। कितना दर्द सहा हमने उनको इस बात की खबर नहीँ वो क्या जाने मिलकर उनसे तबियत ये सम्हल जाती है […]

मुक्तक/दोहा

दोहा मुक्तक

प्रदत शीर्षक- अलंकार, आभूषण, भूषण, विभूषण, गहना, जेवर गहना भूषण विभूषण, रस रूप अलंकार बोली भाषा हो मृदुल, गहना हो व्यवहार जेवर बाहर झाँकता, चतुर चाहना भेष आभूषण अंदर धरे, घूर रहा आकार॥ — महातम मिश्रा, गौतम गोरखपुरी  

लघुकथा

घिनौनी सोच -लघुकथा

सत्यभामा `महिला क्लब’ चलाती थी और समाज की कमजोर स्त्रियों को आगे बढ़ाने का ढोंग करती थी । भ्रूण हत्या और घरेलू हिंसा पर बड़े -बड़े भाषण देती थी । अमीर लेकिन बुद्धिहीन स्त्रियों में उसकी अच्छी खासी पकड़ थी । हर स्त्री उनके चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेती थीं और जब – जब […]

यात्रा वृत्तान्त

चलो कहीं सैर हो जाये -7

पुर्वकथा सार : हम कुछ मित्र मुंबई से माता वैष्णोदेवी के दर्शन कर भैरव घाटी की ओर बढे । अब आगे ………………. दुसरे दिन तय कार्यक्रम के मुताबिक पंडित श्रीधर के घर लोग जमा होने लगे । लेकिन जैसे जैसे लोगों की भीड़ बढ़ रही थी पंडितजी की बेचैनी भी बढ़ रही थी । लोग भी […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

यहीं कहीं आसपास खड़ी है जिधर देखिये प्यास खड़ी है खोकर कुछ एहसास खड़ी है कितनी गमगीन प्यास खड़ी है अपनों का तोड विश्वास खड़ी है कुछ गैरों संग प्यास खड़ी है दुखी है बहुत उदास खड़ी है दूर खुशी से प्यास खड़ी है वो जिंदा है, या लाश खड़ी है बुझी-बुझी अब प्यास खड़ी […]

भजन/भावगीत

मैय्या तेरे भवन निराले

मैय्या तेरे भवन निराले जयकारे-ही-जयकारे यहां आते हैं दिलवाले जयकारे-ही-जयकारे 1.कौल कंदौली जय-जयकारे माई देवा जय-जयकारे बाणगंगा के धारे जयकारे-ही-जयकारे 2.चरणपादुका जय-जयकारे आदिकुंवारी जय-जयकारे मिल जाएंगे किनारे जयकारे-ही-जयकारे 3.हाथी मत्था जय-जयकारे सांझी छत पर जय-जयकारे चम-चम चमकें तारे जय-जयकारे जयकारे-ही-जयकारे 4.मां का भवन है जय-जयकारे पिंडी-दर्शन जय-जयकारे दर्शन प्यारे-प्यारे जयकारे-ही-जयकारे 5.शेरांवाली जय-जयकारे मेहरांवाली जय-जयकारे काम […]

कविता

“कुंडलिया”

( ढेल- मोरनी, टहूंको- मोर की बोली) नाचत घोर मयूर वन, चाह नचाए ढेल चाहक चातक है विवश, चंचल चित मन गेल चंचल चित मन गेल, पराई पीर न माने अंसुवन झरत स्नेह, ढेल रस पीना जाने कह गौतम चितलाय, दरश आनंद जगावत मोर पंख लहराय, टहूंको मय लय गावत॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

कविता

हाइकू”

शिक्षा शिक्षा बेहतर है शिक्षा ले लो शिक्षा॥-1 शिक्षित घर खुशियों का आँगन हरें हैं बाग॥-2 नौ मन भार पढ़ाये बचपन झूकी कमर॥-3 खेलेने तो दो अपनी गलियों में नौनिहाल हैं॥-4 ये भविष्य हैं उछलता कूदता हर्षित देश॥-5 बेटी हमारी खुशिहाली घर की झूले पालना॥-6 हरियाली है प्रकृति है प्यारी गोंदी लालना॥-7 प्यार करो जीवन […]

कविता

“मनहर घनाक्षरी”

यह चार पदों(पंक्तियों मे) लिखा जाने वाला वार्णिक छंद है। 8/8/8/7 पर यति अर्थात प्रति पंक्ति 31 वर्ण, भाव प्रभाव रचना मे तुकांत लघु गुरु पर अनिवार्य। दाना मांझी को बताई, प्रशासन ने अधिक, लाचारी जो लिए चली, चलन बीमार है कितने आए हैं यहाँ, तेरे जैसे बीमार ले, रोते गिड़गिड़ाते ही, जो दर किनार […]