गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सजते हैं सारे सपने सजाकर तो देखोFB_IMG_14630745866065994
नफरतों में यूँ प्यार मिलाकर तो देखो

नजरें मिलाने से यूँ प्यार होता नहीं है
कभी रुह से रुह को मिलाकर तो देखो

आपको देखते बुत सा बन जाता हूँ मैं
कभी रूह से मुझको हिलाकर तो देखो

प्यासा तो था पर अभी प्यासा ही हूँ मैं
कभी जुल्फों से मुझे पिलाकर तो देखो

क्या जानो आप इन बेदर्द रातों का दर्द
कभी ये रात तन्हा बिताकर तो देखो

जिन्दगानी की दौड़ में हारा सा पड़ा हूँ
कभी साथ मुझको जिताकर तो देखो

 बेख़बर देहलवी

 

बेख़बर देहलवी

नाम-विनोद कुमार गुप्ता साहित्यिक नाम- बेख़बर देहलवी लेखन-गीत,गजल,कविता और सामाजिक लेख विधा-श्रंगार, वियोग, ओज उपलब्धि-गगन स्वर हिन्दी सम्मान 2014 हीयूमिनिटी अचीवर्स अवार्ड 2016 पूरे भारत मे लगभग 500 कविताओं और लेख का प्रकाशन

2 thoughts on “ग़ज़ल

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    जिन्दगानी के दौड़ में हारा सा पड़ा हूँ

    कभी साथ मुझको जीताकर तो देखो !! वाह वाह , बहुत खूब .

    • बेख़बर देहलवी

      bahut bahut aabhar aapka aadarniya

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