चलो कहीं सैर हो जाये -7

पुर्वकथा सार : हम कुछ मित्र मुंबई से माता वैष्णोदेवी के दर्शन कर भैरव घाटी की ओर बढे । अब आगे ……………….

दुसरे दिन तय कार्यक्रम के मुताबिक पंडित श्रीधर के घर लोग जमा होने लगे । लेकिन जैसे जैसे लोगों की भीड़ बढ़ रही थी पंडितजी की बेचैनी भी बढ़ रही थी । लोग भी हैरानी से इधर उधर देख रहे थे । ऐसा लग रहा था जैसे कुछ ढूंढ रहे हों ।

वह छोटीसी कन्या सभी को इशारों में बैठे रहने को कह रही थी । सभी ग्रामवासी उस छोटी सी कन्या के तेज से प्रभावित ख़ामोशी से बैठे रहे । जब गाँव के अधिकांश लोग आ चुके तब कन्या ने पंडित श्रीधर को इशारे से अपने पास बुलाया और उनसे माताजी की पूजा अर्चना करने के लिए कहा । पंडितजी ने भक्तिभाव से माता वैष्णोदेवी की पूजा की । इस दौरान वह कन्या वहीँ समीप ही बैठी पंडितजी के सभी क्रियाकलाप को ध्यान से देख रही थी । विधिवत पूजन की पूरी प्रक्रिया के दौरान वह काफी प्रसन्न दिखाई पड़ रही थी ।

पंडितजी के वेदी पर से उठने से पूर्व ही कन्या के हाथों में एक पात्र दिखाई दिया । पूजन पूर्ण कर पंडितजी ने कन्या की तरफ देखा । उसके हाथों में सुसज्जित पात्र देखकर पंडितजी आश्चर्यचकित हुए । पंडितजी पर ध्यान दिए बिना ही कन्या ने पात्र में हाथ डाला और सुस्वादु भोजन पंडितजी को देते हुए उससे माताजी को भोग लगाने को कहा । पंडित श्रीधर तो कुछ बोलने की स्थिति में ही नहीं थे । श्रद्धाभाव से माताजी को भोग लगाने के उपरांत कन्या की तरफ देखा ।

उसने पंडितजी से सभी लोगों को भोजन के लिए बैठने का आग्रह करने के लिए कहा । पंडितजी तो किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में आ गए थे। सभी के बैठने के बाद कन्या ने उसी पात्र से सबको भोजन परोसना शुरू किया । क्या आश्चर्य ! उस छोटे से पात्र से ही उस कन्या ने सभी के सामने भरपूर भोजन परोस दिया था ।

अब भंडारा शुरू हो चूका था । एक पांत फिर दूसरी और फिर तीसरी पांत बैठती गयी और लोग भोजन करके पंडित श्रीधर को आशीष देते अपने अपने घरों को लौट चले । अंतिम पांत बैठी भोजन ग्रहण कर ही रही थी कि बाबा भैरवनाथ और उनके साथ कुछ साधू वहाँ आ धमके ।

बाबा भैरवनाथ को सम्मुख पाकर पंडित श्रीधरजी अति प्रसन्न हुए और उनका भलीभांति स्वागत कर उन्हें बैठने का आसन प्रदान किया ।

बाबा भैरवनाथ और उनके साथी साधू भोजन ग्रहण करने के लिए बैठे । सबकी तरह से ही उन्हें भी उसी पात्र से भोजन परोसा गया था । तभी उनकी नजर पात्र से भोजन निकालकर परोसती उस छोटी सी कन्या पर पड़ी और उनके चहरे पर मुस्कराहट तैर गयी ।

भोजन परोसे जाने के बाद पंडित श्रीधर ने बाबा भैरवनाथ से भोजन करने का आग्रह किया । पंडित की तरफ कुपित नज़रों से देखते हुए बाबा भैरव नाथ बोले ” बेटा ! यह तुमने हमें भोजन में क्या परोसा है ? क्या तुम नहीं जानते की हम कौन हैं ? हमें भोजन में माँस और मदिरा चाहिए। बिना मदिरा का भोग लगाये हम भोजन ग्रहण नहीं करते । ”

बाबा भैरवनाथ की बात सुन पंडित श्रीधर तो सकपका गए लेकिन उस छोटी सी कन्या ने आगे बढ़कर बाबा भैरवनाथ को समझाना चाहा “बाबा ! यह माता वैष्णोदेवी का भंडारा है और इसमें वैष्णव भोजन ही ग्रहण करना होता है । मांस मदिरा प्याज लहसून वगैरह इसमें पूर्णतया वर्जित होता है । ”

कन्या की बातें सुनते ही बाबा भैरवनाथ क्रोधित हो गए और बोले ” कौन है ये कन्या ? और कौन है ये वैष्णोदेवी जो अपनेआपको माता कहलवाते घूम रही है ? अगर मुझे भोजन कराके संतुष्ट करना चाहते हो तो मांस और मदिरा का इंतजाम यथाशीघ्र करो अन्यथा मेरे क्रोध का सामना करने के लिए तैयार रहो ।”

पंडित श्रीधर ने असहाय होकर उस कन्या की तरफ देखा। कन्या के मुख पर सौम्य मुस्कराहट नजर आ रही थी । मधुर स्वर लहरी गूंज उठी ” बाबा ! यह वैष्णो देवी का भंडारा है । इसमें किसी भी कीमत पर आपकी इच्छा पूर्ति नहीं हो सकती और न ही इसे भ्रष्ट करने का आपका प्रयास सफल हो सकता है ।”

बाबा भैरवनाथ क्रोधित हो चुके थे “कौन है यह देवी ? उससे कहो मेरा सामना करे। कहाँ रहती है ?” अब उस कन्या के मुख की मुस्कराहट गहरी हो गयी थी । बोलीं ” वो सामने त्रिकुटा पर्वत की चोटी पर एक गुफा ही माता वैष्णो देवी का निवास है जिसे भवन भी कहते हैं । जाओ पकड़ लो उसे ।”

भैरव बाबा तो उस कन्या रूपी वैष्णो माता को बखूबी पहचान चुके थे सो तुरंत ही उठकर उस कन्या की तरफ लपके । बाबा भैरवनाथ को अपनी तरफ बढ़ता देख कन्या रूपी माता वैष्णोदेवी भवन की तरफ आकाश मार्ग से उड़ कर जाने लगीं। बाबा भैरवनाथ कहाँ माननेवाले थे । वह भी आकाशमार्ग से माता वैष्णोदेवी के पीछे पीछे उड़ चले ।

कहा जाता है की भवन की ओर उड़ते हुए माताजी ने एक क्षण के लिए निचे उतर कर भैरवनाथ की तरफ देखा और उसे अपनी ओर बढ़ते देख पुनः उड़ चली । इस क्रम में माताजी के चरण जहां पड़े वहीँ माताजी के चरण पादुका मन्दिर का निर्माण हुआ है । ऐसी मान्यता है की माताजी के चरणों के निशान उसी समय से यहाँ अंकित है और यात्री भक्तिभाव से माताजी के चरण चिन्हों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं ।

वहां से उड़कर माताजी ने अर्धक्वारी मंदिर में स्थित गुफा के समीप पहुंचकर हनुमानजी का आवाहन किया । हनुमानजी के प्रकट होने पर उन्हें गुफा की रखवाली का कार्य सौंपकर माताजी स्वयं गुफा में समाधिस्थ हो गयीं । उसी गुफा को आज गर्भजुन कहा जाता है ।

कुछ ही समय में भैरव बाबा गुफा के समीप पहुंचकर गुफा में प्रवेश करने को उद्यत हुए की वहीँ समीप ही बैठे हनुमानजी ने बाबा भैरवनाथ को गुफा में प्रवेश करने से मना किया । बाबा कहाँ माननेवाले थे । बाबा को रोकने के लिए हनुमानजी गुफा के प्रवेशद्वार पर खड़े हो गए । उन्हें हटाने की कोशिश में हनुमानजी और बाबा भैरवनाथ के बीच भीषण मल्लयुद्ध शुरू हो चूका था ।

कहते हैं बाबा भैरवनाथ अपनी असीमित मायावी शक्तियों के बल पर नौ महीने तक महा बलशाली श्री हनुमानजी से मल्लयुद्ध करता रहा किन्तु गुफा में प्रवेश नहीं कर सका ।

मायावी भैरवनाथ से युद्ध करते करते अब महा बलशाली हनुमानजी की शक्ति भी क्षीण होने लगी थी की अचानक माताजी अपने दिव्य स्वरुप में गुफा से बाहर निकलीं । हनुमानजी ने उनके दर्शन कर उन्हें सादर प्रणाम किया ।

क्रमशः

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।