कहानी जोश की

मन बुढा हो तो तन बुढा ‘ सीख़ हमें दे जाती है
सौ साल की दादी जब ‘ स्वर्ण पदक ले जाती है ।
सौ मीटर हैं दौड़ी ‘मन जी’ सिर्फ इक्क्यासी पल में ही
अपनी हिम्मत और लगन से कीर्तिमान रच जाती हैं ।।

कौन हैं इनके गुरु सुन हक्के बक्के रह जाओगे
देख हौसला इन दोनों का नतमस्तक रह जाओगे
निज सपूत को गुरु मान यह माँ जलवे दिखलाती है
अपनी हिम्मत और लगन से कीर्तिमान रच जाती है ।।

नहीं दौड़ में सिर्फ वरन भाला भी बढ़िया फेंका है
और शोट्गन में भी इनको अचरज से सबने देखा है
इन खेलों में पदक जीत सबको हैरत दे जाती है
अपनी हिम्मत और लगन से किर्तिमान रच जाती है।।

जीतनी भी तारीफ़ करें वह लगती बहुत है थोड़ी
जा विदेश में झंडा गाड़े माँ बेटे की जोड़ी
सात साल के सद्प्रयास का मीठा फल वह पाती है
अपनी हिम्मत और लगन से कीर्तिमान रच जाती है ।।

उम्र नहीं आड़े आती गर लगन हौसला जिन्दा हो
देख के इनके करतब को कितने युवा शर्मिंदा हो
नतमस्तक हूँ मैं भी ये तो भारत माँ की थाती है
अपनी हिम्मत और लगन से कीर्तिमान रच जाती है ।।

( अमेरिका में 100 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जितनेवाली 100 वर्षीया आदरणीया मन कौर और उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित करनेवाले और उनके गुरु की भूमिका निभानेवालेे 78 वर्षीय सुपुत्र श्री गुरुदेव सिंह जी का कोटिशः अभिनन्दन और उन्हें समर्पित रचना )

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।