मेरी कहानी 161

सुबह चार बजे उठ गए, नहा धो कर कपड़े पहने, कुलवंत ने चाय बनाई और पी कर कमरे से बाहर आ गए। अभी अँधेरा ही था और कुछ कुछ ठंड थी लेकिन मौसम सुहावना था। सभी दुकाने अभी बन्द थी। यहां से कोच चलनी थी, हम ने पिछले दिन ही देख लिया था, इस लिए जगह ढूंढने में हमें कोई ख़ास तकलीफ नहीं हुई। जब हम पहुंचे तो वहां बहुत से लोग पहले ही आये हुए थे जिन में ज़्यादा लोग पेंशनर ही दिखाई देते थे और एक बुडीया तो वील चेअर में थी जिस के साथ एक आदमी था, शायद उस का पति होगा। गोरे लोगों में यह सिफत है कि वोह अपनी उम्र के आख़री दिन तक हॉलिडे का मज़ा लेते रहते हैं और उन के बच्चे यह सब समझते हैं और वोह अपनी ज़िन्दगी खुद बनाते हैं, इन का सिस्टम ही ऐसा है कि इन के घर जाएँ तो बहुत लोग तो चाय का कप्प भी नहीं पूछते, खाने की बात तो दूर की है और इस बात का कोई बुरा भी नहीं मानता । यह लोग तो बस हॉलिडे को बहुत महत्त्व देते हैं। हमारा समाज ऐसा है कि हमारा सारा पैसा शादी समारोहों या रिश्तेदारी के लेन देन में ही खर्च हो जाता है। रही सही कसर अखंडपाठ या पूजा पाठ के आडम्बरों से पूरी हो जाती है। हम तो मरने पर भी बहुत कुछ करते हैं। पंजाब में बूढ़े बज़ुर्गों के स्वर्गवास होने पर पाठ के बाद संबंधियों रिश्तेदारों को मिठाई खिलाते हैं, लोगों को सिर्फ यह दिखाने के लिए कि उन्होंने बज़ुर्ग को बहुत इज़त के साथ विदा किया और जीते जी शायद उन्होंने बज़ुर्ग को अछि रोटी भी दी ना हो। अगर बेटीआं हो जाएँ तो हम अपनी ज़िमेदारी से ज़िन्दगी के आख़री दम तक छूट नहीं सकते। अगर हम लोग भी गोरों जैसे हो जाएँ तो भारत में गरीबी का नामोनिशान नहीं रहेगा। बेटियों के बोझ तले दब कर हम जवानी में ही बूढ़े हो जाते हैं। मेरी बचनों भाबी की पांच बेटीआं थीं, उन की आमदनी भी काफी अछि थी लेकिन बेटियों की शादी और फिर ऊन के बच्चों का खर्च झेलते झेलते गरीबी में ही वोह इस दुनिआं से चले गए। अगर मैं यहां ना आता तो मुझे भी इन लोगों की समझ नहीं होती, लेकिन यहां रह कर मैंने बहुत कुछ जाना समझा है और अब हम लोग भी कुछ कुछ बदलने लगे हैं क्योंकि आगे की पीढ़ी ऐसी बातों में विशवास नहीं रखती। अब तक जो शादीआं धूम धाम से हो रही हैं, वोह माता पिता जो इंडिया से आये हैं ही, खर्च कर रहे हैं, वरना आज के बच्चे यह पैसा बर्बाद करने के हक़ में नहीं हैं। गोरे लोगों के बच्चे खुद अपने साथी ढूँढ़ते हैं और खुद ही अपना मकान लेने के लिए जदोजहद करते हैं। माता पिता कोई दखल अंदाज़ी नहीं करते। गोरे लोग अपनी जिंदगी की कमाई अपने ऊपर खर्च करते हैं और जो बाकी बचा पैसा या घर हो तो उस की विल पहले से ही बना लेते हैं लेकिन अपनी ज़िन्दगी मज़े से जीते हैं । लड़की लड़का चाहे इंडियन से शादी कराये या किसी हब्शी से, माता पिता कोई दखल नहीं देते और यह ही कहते हैं कि यह उन की ज़िन्दगी है और अगर शादी में इनवाइट किया जाए तो ख़ुशी से जाते हैं। ऐसी बात नहीं है कि इन के घरों में कोई प्राब्लम नहीं है,होती है लेकिन और किसम की। इन के भी लड़ाई झगडे मर्डर बगैरा होते हैं लेकिन इस का फैसला सिर्फ पुलिस या कोर्ट ही करती है। बहुत दफा मैंने यह भी देखा है कि लड़ते लड़ते अगर कोई सौरी कह दे, अपनी गलती मान ले तो यह लोग फिर बोलने लगते हैं लेकिन हम तो दुश्मनी की शिक्षा आने वाली पीढ़ी को भी दे जाते हैं। बुराइयां हर कौम और देश में होती हैं लेकिन हमारी आर्थिकता में बहुत गढ़ बढ़ है, हम अपने ऊपर पैसा नहीं खर्च पाते, बस बच्चों के लिए कुछ करते करते, जैसे रेशम का कीड़ा अपने इर्द गिर्द रेशम का ताना बुनते बुनते उस में ही मर जाता है, इसी तरह हमारे समाज की स्थिति है।
वील चेअर में इस बुढ़िया के इलावा और लोग भी देखे थे। एक जगह तो हम ने चार पांच बुड़ीआ को इकठे घुमते देखा था जो 70 साल की उम्र से कम नहीं होंगी। इंगलैंड में तो डिसेबल लोगों की लोग बहुत मदद करते हैं और मैं खुद जब बस ड्राइव किया करता था तो बस से उत्तर कर ऐसे लोगों की मदद करता था और यह कोई बड़ी बात नहीं होती थी क्योंकि सभी ऐसा करते थे हालांकि यह काम हमारी जॉब का हिस्सा नहीं होता था, यह एक डिसेबल के प्रति सहानभूति होती थी । उतरते समय कई डिसेबल लोग स्वीट्स दे जाते थे और हम ख़ुशी से ले लेते थे और थैंक्स कह देते थे । आज यह बुढ़ीया हमारे साथ लिस्बन जा रही थी और हंस हंस कर बातें कर रही थी। कुछ ही देर में कुछ और लोग भी आ गए थे। कोच ड्राइवर कोच ले कर पांच बजे आ गिया और उस के साथ जो हमारा गाइड था, उस के हाथ में यात्रियों की लिस्ट थी। एक एक करके उस ने यात्रियों की गिनती कर ली। सही होने पर उस ने ड्राइवर को हरी झंडी दे दी और वोह कोच का दरवाज़ा बन्द कर के चल पढ़ा। अब गाइड हमारी तरफ मुख़ातब हो कर बोला, “लेडीज़ ऐंड जेंटल मैंन, मेरा नाम क्रिस्टोफर है और मैं आप का गाइड हूँ, आप को मैं सब कुछ बताऊंगा, और आशा करता हूँ कि आप इस ट्रिप का आनंद उठाएंगे “, इस के बाद वोह ड्राइवर से पौर्च्गीज़ में बातें करने लगा। दोनों तरफ के सीन हम देखते जा रहे थे। सड़कें साफ़ सुथरी थीं और मैं तो ट्रैफिक की ओर ही धियान से देख रहा था क्योंकि सभी कारें और बसें सड़क के दाईं ओर चल रही थीं। जब आगे कोई गोल आइलैंड आ जाता तो मैं धियान से ट्रैफिक की ओर देखता कि कैसे ड्राइव करते थे। जल्दी ही मैं यह समझ गया कि प्रैक्टिस के लिए कुछ ड्राइविंग लैसन लेने जरूरी थे। इंगलैंड में ऐसे बहुत से एक्सीडेंट सुने थे, जो ट्रकक सामान ले कर यूरप से इंग्लैंड आते थे, उन में कभी कभी इंगलैंड के ड्राइविंग नियम इलग्ग होने की वजह से गलत फहमी के कारण सीरियस एक्सीडेंट हो जाते थे।
कोच चली जा रही थी, और ड्राइवर और गाइड बातें किये जा रहे थे। ड्राइवर के पास डैश बोर्ड पर एक किसी बृक्ष के छिलके का एक टुकड़ा जो कोई एक फुट लंबा,पांच छै इंच चौड़ा और अढ़ाई तीन इंच मोटा पढ़ा था। कभी कभी मैं इसे देख कर सोच में पढ़ जाता कि यह क्यों रखा हुआ था, क्या इन लोगों में भी कोई वहम भरम या अछि किस्मत, बुरी किस्मत के बारे में सोच है ?, जब से कोच में बैठा था, तभी से इस उधेड़ बुन में पढ़ा हुआ था और मेरी यह उत्सुकता अब ख़तम हो गई जब गाइड ने वोह टुकड़ा उठाया और बोला,” लेडीज़ ऐंड जैंटलमेन ! यह टुकड़ा एक बृक्ष की छाल है और उस बृक्ष का नाम है कौरक ट्री (cork tree ) और इस छाल से हज़ारों चीज़ें बनती हैं। यह छाल हज़ारों सालों से बियर और वाइन के कॉर्क (ढकन ) बनाने के काम आती रही है। इस से कारक इस लिए बनाये जाते हैं, क्योंकि यह लकड़ी फ्लैक्सीबल होती है और साथ ही बियर या वाइन की कुआलिटी में भी फर्क आ जाता है । जब बोतल में ढकन डाला जाता है तो यह फ़ैल कर रबड़ की तरह बोतल को अछि तरह सील कर देता है और हवा भी बाहर नहीं जा सकती। इन बृक्षों के बड़े बड़े grove (छोटे जंगल ) हैं। इस बृक्ष को बोने के पचीस वर्ष बाद पहला छिलका उतारा जा सकता है और इस के बाद हर नौ वर्ष बाद छिलका उतारना शुरू हो जाता है। यह बृक्ष अढ़ाई सौ से तीन सौ वर्ष तक हर नौ साल बाद छिलका देता रहता है। इस छिलके को उतारने वाले लोग बहुत एक्सपर्ट होते हैं। पहले यह लोग कुल्हाड़ी से बृक्ष के इर्द गिर्द एक लाइन में छाल को कट्ट लगा देते हैं और फिर इसी तरह ऊपर सात आठ फ़ीट की दूरी पर इसी तरह का कट्ट लगा देते हैं और फिर धीरे धीरे छाल को एक कुल्हाड़ी से उधेड़ते चले जाते हैं और एक पीस पूरा काट लिया जाता है। इस के बाद ऊपर के हिस्से इसी तरह काटते चले जाते हैं। इस छिलके के बड़े बड़े ढेर लग जाते हैं और फिर इन को ट्रकको में लाद कर फैक्ट्री में ले जाया जाता है। यह फैक्ट्रियां बहुत बड़ी होती हैं जिन में सैंकड़ों लोग काम करते हैं। कुछ देर के लिए मैं आप को यह बृक्ष और एक फैक्ट्री दिखाने ले जाऊँगा”
अब यह गाइड फिर अपने दोस्त से बातें करने लगा और मैं सोच रहा था कि मेरी सारी ज़िन्दगी बीत गई लेकिन मेरे दिमाग में यह आया ही नहीं था कि यह बोतल के ढकन किस लकड़ी से बनते हैं। सभी यात्री एक दुसरे से बातें कर रहे थे और वोह डिसेबल बुड़ीआ हंस हंस सब से ज़्यादा बातें कर रही थी । हम भी हंस रहे कि कभी सोचा ही नहीं था और अब यह गियान बूड़े हो कर समझ आया। कुछ ही देर बाद हमारी कोच हाई वे छोड़ कर एक छोटी सड़क पर आ गई और कुछ ही देर में ब्रिक्ष ही ब्रिक्ष दिखाई देने लगे। देख कर हम समझ गए कि यही cork tree थे क्योंकि कुछ ब्रिक्षों से काटी हुई छाल साफ़ नज़र आ रही थी और यह काटी गई छाल वाले हिस्से का रंग चिट्टा था । आगे गए तो बहुत से लोग छाल उतार रहे थे। ड्राइवर ने कोच खड़ी कर ली और हम उस पुर्तगीज़ को छाल काटते हुए देखते रहे। आगे गए तो देख कर ही हैरान हो गए कि छाल के बड़े बड़े ढेर पड़े थे और उन को ट्रकों पर लाद रहे थे। गाइड सब कुछ बता रहा था कि यह ट्रक, फैक्ट्री को जा रहे थे। जल्दी ही हम एक फैक्ट्री में चले गए। छाल के ढेर हर जगह पड़े थे। कोच से उत्तर कर गाइड हमें फैक्ट्री के भीतर ले गया। फैक्ट्री का एक शख्स हम को सारा काम दिखाने लगा। फैक्ट्री में औरतें और मर्द काम कर रहे थे। बड़ी बड़ी मशीनों से छाल से कारक बन बन कर निकल रहे थे औरतें उन में से खराब कारक निकाल कर बक्से भर रही थीं। फिर उस शख्स ने बताया कि कुछ भी वेस्ट नहीं होने दिया जाता। जो फालतू कटा हुआ कारक होता है उस को मशीनों में डाल कर क्रश किया जाता है और उस में बहुत कुछ मिला कर उस से बड़े बड़े ब्लॉक बनाये जाते हैं। फिर उन को सा मिल में लकड़ी की तरह काट कर बहुत किसम की छीटें बनती हैं। यह सब उस ने दिखाया। आगे गए तो जैसा उस ने कहा था बड़े बड़े ब्लॉक बन रहे थे और उन ब्लॉकों से पतली लकड़ी की तरह छीटें काटी जा रही थीं। उन्हीं छीटों से आगे पतले पतले गोल गोल वाशर जैसे कुछ बन रहे थे। उस शख्स ने बताया यह वाशर जैसी चीज़ उन बोतलों के ढकन के बीच में रखी जाती हैं जिन में गैस का प्रेशर होता है ताकि प्रेशर लीक न हो सके। छैमपेन की बोतल में तो ख़ास कर यही कारक डाला जाता है। उस ने यह भी बताया कि इस कारक से फ्लोर टाइल, टेबलों पर रखने वाले मैट, कार के इंजिनों में पड़ने वाले गैसकिट और स्पोर्ट्स की बहुत चीज़ें बनती हैं। बहुत बातें मुझे याद नहीं लेकिन हम जल्दी ही फैक्ट्री से बाहर आ कर कोच में बैठ गए और कोच लिस्बन की तरफ जाने लगी। जब कोच में बैठे थे मुझे हंसी आ गई। ” मामा ! हंसी किस बात पर आई ?”जसवंत ने पूछा। मैंने कहा यह जो वाशरें बन रही रही थी, इन को याद कर के मुझे हंसी आई। मेरी बात किसी को समझ नहीं आई। मैंने कहा जब हम छोटे होते थे तो सोडा वाटर वाली दूकान में जब दुकानदार सोडे या विमटो की बोतल खोलता था तो बोतल का ढकन दूर जा गिरता था और हम दौड़ कर उस को उठा लेते थे। इस ढकन के बीच यही कारक की वाशर होती थी। हम इस वाशर को किसी चीज़ से निकाल कर ढकन को कमीज के ऊपर लगा कर कमीज के भीतर से इस वाशर को ढकन में धकेल देते थे और यह ढकन एक बैज जैसा दिखाई देता था और इस वाशर के कारण यह ढकन गिरते नहीं थे। इस बात को सुन कर सभी हंसने लगे। कुलवंत कहने लगी,” किथे गल मारी आ “,फिर कहने लगी कि उसे भी यह याद था।
अब हमारा धियान हाई वे पर ही हो गया और सब शांत हो कर बैठ गए। लगता था, यह हाई वे नया नया ही बना होगा क्योंकि सारी सड़क और रोड साइन नए ही लग रहे थे। आगे टोल देना था और सबी कारें खड़ी हो गईं। कोच और बस बगैरा एक तरफ जाती थीं। कोच ड्राइवर ने पैसे दिए और आगे चल पड़े। अब कुछ कुछ ट्रैफिक बढ़ती जा रही थी लेकिन स्लो नहीं थी। याद नहीं कितने बजे लिस्बन पहुंचे लेकिन कोच ड्राइवर सब से पहले एक जगह ले गया जिस की इतिहासिक महत्ता का मुझे याद नहीं लेकिन यहां से लिज़बन सुकेयर दिखाई दे रहा था, यहां हम ने अब जाना था क्योंकि यह जगह काफी ऊंचाई पर थी। कुछ मिंट बाद हम फिर कोच में बैठ गए और कोच लिज़बन सुकेअर की तरफ जाने लगी। इस सुकेयर का कोई नाम है, जो मुझे याद नहीं लेकिन यह सुकेयर परसिद्ध है । जब हम वहां पहुंचे तो ड्राइवर ने हमें उतार दिया और खुद कोच किसी कोच पार्क में इसे पार्क करने के लिए ले गया। अब हम इस सुकेयर में घूमने लगे। यहां ज़्यादा टूरिस्ट ही थे। एक बहुत बड़ा फाउंटेन था जिस के इर्द गिर्द बैठने के लिए जगह बनी हुई थी और कुछ बज़ुर्ग लोग इन पर बैठे थे। इस सुकेयर में एक बहुत बड़ा पिलर था जिस पर किसी प्रसिद्ध बादशाह का बुत्त था जो अब याद नहीं किस का था लेकिन यह बहुत ऊंचा था, जैसे लंडन में नैल्सन का स्टैचू हैं। इस की ऊंचाई कुतब मीनार से भी ज़्यादा थी। इस सुकेयर में रैस्टोरैंट और टी स्टाल ज़्यादा थे। एक तरफ मैकडोनल्ड भी था जो भरा हुआ था। हम ने सोच लिया था कि घूम घाम कर यहां ही खाएंगे।
अब हमारा गाइड भी आ पहुंचा था और वोह इतिहासिक बातें बताने लगा। सुकेयर से निकल कर हम शॉपिंग एरिए में आ गए। यहां बहुत बड़ी बड़ी दुकानें थीं, ख़ास कर जीऊलरी और कपडे की। गाइड हमें कुछ दूर ले आया। सामने पानी में बड़ी बड़ी कश्तियाँ और कुछ समुंद्री जहाज़ खड़े थे। अब हमारा गाइड बताने लगा, “जब हमारे हैनरी दी नैविगेटर और वास्कोडिगामा की कोशिशों से नई दुनिआं का पता चलने लगा था और बहुत से ट्रेड रुट खोज निकाले गए थे तो हमारे नैवीगेटरों ने वेस्ट अफ्रीका के बहुत से देश अपने कब्ज़े में कर लिए थे। उस समय स्लेव ट्रेड से बहुत पैसा बनाया जाता था। इस जगह अफ्रीकन स्लेव लोगों को लाया जाता था जिन के हाथ बांधे हुए होते थे ताकि वोह दौड़ ना जाएँ, फिर उन को स्लेव मार्किट में ले जाय जाता था यहां उन की बोली होती थी और पशुओं की भाँती बेचे जाते थे । बड़े बड़े बिज़नैस मैंन इन स्लेव लोगों को खरीद कर आगे दूसरे देशों को बेच देते थे। इस धंदे में पैसा बहुत होता था। यहाँ ही सोने चांदी के जहाज़ आते थे और यहां दो बाजार होते थे जिन को इंग्लिश में गोल्ड स्ट्रीट और सिल्वर स्ट्रीट बोलते थे। उस समय पुर्तगाल बहुत अमीर देश होता था। एक कारण यह भी था कि जब वास्कोडिगामा ने इंडिया का पता लगा लिया तो इस का भेद सौ साल तक अन्य किसी यूर्पीन देश को नहीं हुआ था। इंडिया से जितने मसाले आते थे,उस पर 60% प्रॉफिट हो जाता था क्योंकि इस में पुर्तगाल की मनॉपली होती थी, जो कीमत मांगो वोह मिल जाती थी । इस से भी बड़ी बात यह थी कि जितने भी शिप ट्रेड के लिए दूर दूर जाते थे, उस का पहले तो हकूमत की ओर से लाइसैंस लेना पड़ता था, दूसरे उस कंपनी के प्रॉफिट का हिस्सा भी देना होता था जो कि एक प्रकार का टैक्स ही होता था और कई दफा तो यह 20% होता था। इस की वजह से पुर्तगाल की अर्थवयवस्था यूरप में सब से आगे थी”। अब हमारा गाइड क्रिस्टोफर बोला,” अब आप लोग कुछ खा पी लो और फिर हम आप को सैगरस (sagres)ले जाएंगे”, बातें करते करते हम वापस सुकेयर की ओर चलने लगे। चलता. . . . . . . . . . .

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.