क्लर्कगाथा ( व्यंग्य )

उनके लिए बेटे का क्लर्क बनना एक दुर्घटना थी I उन्होंने अपने एकलौते नालायक पुत्र के बारे में अनेक रंगीन दिवास्वप्न देखे थे पर वह तो जिद्दी बैल की तरह अडा था कि दसवीं कक्षा से आगे न बढ़ने की मानों कसम खा ली हो I तीसरी बार में उसने तृतीय श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा पास की I हर बाप की भांति उसके पिताजी भी चाहते थे कि बेटा पढ़ – लिखकर बड़ा अफसर बन जाएगा, घर में कार होगी, नौकर – चाकर होंगे, बंगला होगा पर सभी आशाओं पर बर्फ़बारी करते हुए मनोज तो सचिवालय का क्लर्क बन गया I उसके क्लर्क बनने पर घर में मातम छा गया I पिताजी ने कई दिनों तक मनोज से बात नहीं की I घर का माहौल ऐसा लग रहा था मानो कोई अप्रिय घटना घटित हो गई हो I आखिर क्यों न हो I पिताजी उसे आगे पढ़ाकर बड़ा आदमी बनाना चाहते थे परन्तु उसने तो सारे मध्यवर्गीय स्वप्न को चकनाचूर कर दिया था I पिताजी के मन – मस्तिष्क में क्लर्क की वही पुरातन छवि थी – कलम घीसू, आँखों पर चश्मा चढ़ाए, मुख में सस्ता पान दबाए, फाइलों से चिपके फटीचर टाइप के किरानी नामधारी बेचारा प्राणी – टूटी चप्पलों और लंगड़ी साइकल का वारिस I
पदभार ग्रहण करने के दिन मनोज के बॉस ने जीवन रहस्य का बोध कराया और कहा कि कोई पद छोटा – बड़ा नहीं होता, महत्वपूर्ण – महत्वहीन नहीं होता, उस पर आसीन होनेवाला व्यक्ति ही उस पद को गौरवहीन अथवा गौरवशाली बनाता है I बॉस ने अलां – फलां का उदहारण देते हुए गीता के “निष्काम कर्मयोग” की कलयुगी व्याख्या प्रस्तुत की I बॉस ने समझाया कि कैसे उस व्यक्ति ने छोटे से पद को सत्ता का प्रमुख केंद्र बना दिया I बॉस के हितोपदेश को मनोज ने मन – मस्तिष्क में उतार लिया I उसने क्लर्क के पद को इतना गौरवमंडित कर दिया कि बड़े – बड़े अधिकारी तक उसके सामने पानी भरने लगे या वह बड़े – बड़े अधिकारियों से पानी भरवाने लगा I सचिवालय में उसकी तूती बोलने लगी I अब फाइल उसके लिए लहलहाती फसल थी, कामधेनु थी, कल्पवृक्ष थी, परम आराध्या थी I उसका जितना चाहे दोहन करो, मलाई खाओ या कच्चा दूध ही पी जाओ I फाइल उसके लिए मनोवांछित फल देनेवाली जादुई छड़ी थी – मुद्रादायिनी, दुःख विनाशिनी I वह जिस फाइल को छूता वह सोना उगलने लगती I वह जिस विभाग में स्थानांतरित होकर जाता उस विभाग को सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी बना देता I कुछ आउटडेटेड ईमानदारों को छोड़ सभी उससे खुश रहते – बॉस से लेकर चपरासी तक, मंत्री से लेकर संत्री तक I कुछ लोग तो उसके दौलतवादी दर्शन और व्यावहारिक पांडित्य से ईर्ष्या भी करने लगे I उसके पास पैसे कमाने का ऐसा वैज्ञानिक एवं साइड इफ़ेक्टरहित तरीका था जिसमें किसी को कोई शिकायत करने की गुंजाइश नहीं थी I सब कुछ बंधा – बंधाया था, दो प्रतिशत, चार प्रतिशत, छह प्रतिशत अर्थात जैसा पद, वैसा कमीशन I कमीशन के मनोहर डोर से सभी ऐसे बंधे थे जैसे माया – मोह के डोर में आत्मा बंधी रहती है I
वह सचिवालय का कलर्क था I उसके सम्मुख आईएएस और आईपीएस अधिकारी ऐसे दीन – हीन करबद्ध भाव से खड़े रहते जैसे वे जनता हों I वे बड़े – बड़े अधिकारी बेचारगी मिश्रित विनम्र मुद्रा में मनोज बाबू के सम्मुख ऐसे नतमस्तक होते मानों अपने दुर्भाग्य पर पछता रहे हों कि काश ! हम भी सचिवालय के क्लर्क होते I जो अधिकारी अपने जिले या खंड के मालिक थे, वे भी उस टके सेर क्लर्क के सामने जाकर भींगी बिल्ली बन जाते I पद पर रहनेवाले अफसरों के सम्मुख मनोज बाबू कभी – कभी अपनी विनम्रता की बतीसी दिखा दिया करते थे परन्तु रिटायर्ड अधिकारियों के प्रति उनका व्यावहार ऐसा होता मानों वे दीन- हीन जनता हों I कहते कि आपलोगों ने अपने सेवा काल में बहुत माल कमाया होगा, कुछ चढ़ावा चढ़ाइए, फूल – पत्ती का प्रबंध कीजिए तब पेंशन फिक्स होगी, जीपीएफ मिलेगा I मनोज बाबू का अपना दर्शनशास्त्र था I उनका कहना था कि किरानी ही व्यवस्था का कर्णधार होता है I उस पर जब अंगूर की बेटी हावी होती तो वह “ किरानी “ की व्याख्या करता – ‘कि’ से किफायती, ‘रा’ से राजा और ‘नी’ से नींव अर्थात सरकारी दफ्तर का ऐसा किफायती राजा जो व्यवस्था की नींव होता है I सिस्टम उसी से या उसी के लिए चलती है I यदि बुनियाद हिल जाए तो शासन – प्रशासन में हडकंप मच जाए I अब इस देश में आलोचकों की कमी तो है नहीं I आलोचकगण तो किरानी की व्याख्या ऐसे भी करते हैं – ‘कि’ से किलेदार, ‘रा’ से राजा और ‘नी’ से नीवि अर्थात दफ्तर का ऐसा किलेदार या दुर्गरक्षक जो राजा की नीवि भी ढीली कर दे I ऐसे निन्दरासिकों की बातों पर ध्यान देना न नेताओं को शोभा देता है, न सभ्य नागरिकों को I
मनोज बाबू एक कर्मनिष्ठ कर्मचारी थे I वे दूसरों की शिकायतों को वैसे ही अनसुना कर देते थे जैसे कुत्तों के भैरव राग पर हाथी कोई ध्यान नहीं देता I समय पर कार्यालय आना और समय पर कार्यालय से जाना उनकी कर्मनिष्ठा का सूचक था I वे दूसरे क्लर्कों की तरह सचिवालय कैंटीन में मुफ्त की मिठाइयों पर हस्त – आक्षेप करते हुए देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार और बिगड़ती कानून व्यवस्था पर चलनेवाली अंतहीन बहस में शामिल होनेवाले बहसबाज नहीं थे, न ही विश्व राजनीति पर अपनी विशेषज्ञ टिप्पणी करनेवाले विरोधी दल के प्रवक्ता I अब कश्मीर के बारे में पाकिस्तानी नेताओं के नामर्द तर्कों से मनोज बाबू को क्या मतलब ! उनके लिए तो उनका छोटा सा दफ्तर ही जन्नत था – हर तकलीफ का निवारण करनेवाला I वे चढावा नहीं चढ़ानेवाले व्यक्तियों का भी देर – सबेर काम कर ही देते थे I यदि किसी को जल्दी है तो वह मुद्रा दान करे I कलियुग में तो यही एक दान है जो जल्दी फलीभूत होता है- कलयुग केवल दाम अधारा I मुद्रा दान करने के बाद फल प्राप्ति के लिए स्वर्ग में जाने तक का इंतजार नहीं करना पड़ता I रक्तदान, अस्थिदान, दृष्टिदान से भी बढ़कर है मुद्रा दान I मुद्रा दान के आध्यात्मिक अनुष्ठान में आस्था नहीं रखनेवाले नास्तिकों को भी मनोज बाबू उदारतापूर्वक क्षमा कर देते क्योकि क्षमा तो धीरपुरुषों का अलंकार है I
मनोज ने अकूत पैसे कमाए हैं, ऐसा कहनेवाले भी बहुत से कलियुगी साधु मिल जाएँगे I क्या पैसे कमाना अपराध है ? कोई कागजस्वरूपा लक्ष्मी का दान करना चाहे तो उसे स्वीकार न करना भी तो लक्ष्मी का अपमान है ! लोग भी जल्दी में होते हैं I राजधानी एक्सप्रेस पर सवार ऐसी जनता से मनोज बाबू कुछ पुष्प – नैवेद्य ग्रहण कर लेते हैं तो इसमें मार्क्सवादी आलोचक बनने की क्या आवश्यकता है ? हो सकता है कि कुछ ईमानदार समाजसुधारक ( यह शोध का विषय है कि अभी तक उसने ईमानदारी जैसे वाहियात पदार्थ को कैसे और क्यों बचाकर रखा है ) सवाल उठाएं कि मनोज की समरस चक्की में ईमानदार – बेईमान सभी अधिकारी पिस जाते हैं I सवाल उठाना जायज है क्योकि सवाल करना तो मौलिक अधिकार है I जब अधिकार की ही बात उठी है तो लगे हाथ अपने मोहल्ले के वर्मा जी की भी बात कर ली जाए I वर्माजी अभिव्यक्ति के अधिकार का उपयोग करते हुए हर किसी के बेडरूम में झांककर उसका झूठा – सच्चा आँखों देखा हाल बयान करते हैं I ऐसा कर उन्हें ब्रह्मानंद सहोदर की अनुभूति होती है I अभिव्यक्ति के इसी अधिकार का उपयोग करते हुए कुछ लोग मनोज बाबू को रिश्वतानंदी, भ्रष्ट शिरोमणि, कदाचार बाबू आदि मानद उपाधियों से अलंकृत करते हैं I कहनेवाले के मुख पर गोदरेज का ताला कौन लगाए ! उसने चाहे जिस रीति से धनार्जन किया हो लेकिन वह धार्मिक – सामाजिक कार्यों में सबसे अधिक चंदे भी तो देता है I मंदिर का निर्माण हो, दुर्गापूजा का आयोजन हो अथवा आरक्षण के नाम पर आत्मदाह जैसे परम पावन सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करना हो, मनोज सबसे आगे रहते हैं I गत दिनों उन्होंने कुछ नवयुवकों को आत्मदाह के लिए प्रेरित कर अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह किया था I हमारा समाज भी कोई कम क्रांतिकारी नहीं I दहेज़ के नाम पर वधुओं का होलिका दहन, रिश्वतखोरी का नंगा नाच, नेताओं द्वारा खुलेआम जातिवाद और भ्रष्टाचार – इन छोटी – मोटी बातों को लेकर कहीं कोई हलचल नहीं I हमारे नवयुवक महान कार्यों के लिए आन्दोलन, घेराव, आत्मदाह करते हैं, जैसे आरक्षण, मंडल आयोग, जातीय स्वाभिमान I दहेज़, पिछड़ेपन, जातिवाद, भ्रष्टाचार के लिए आन्दोलन ! ना बाबा ना, हम तो बड़े उद्देश्यों के लिए आत्म उत्सर्ग कर इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर उज्ज्वल अक्षरों में अपना नाम अंकित करने के अभिलाषी हैं I
मनोज बाबू अठारहों पुराण और व्यास के वचनों की ऐसी – तैसी करते हुए संस्कृत श्लोक में कलियुगी छौंक लगाते हुए कहते हैं –
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनम् द्वयम I
कलियुगे कलिप्रथम चरणे, सब मिथ्या मुद्रा सत्यम II
बीस वर्षों के सेवाकाल में मनोज बाबू भौतिक उपलब्धियों के ऐसे उच्चासन पर आसीन हैं कि बड़े – बड़े अधिकारी भी उनके सामने बौने लगने लगे हैं I उनके पिताजी जीवित हैं और सगर्व कहते हैं कि उन्होंने मनोज के बारे में जो स्वप्न देखे थे, उससे वह बढ़कर निकला I अब हर पिता अपने पुत्रों के संबंध में सपना संजोता है कि उनका बेटा भी सचिवालय का क्लर्क बने I

परिचय - वीरेन्द्र परमार

जन्म स्थान:- ग्राम + पोस्ट- जयमल डुमरी, जिला:- मुजफ्फरपुर(बिहार) -843107, जन्मतिथि:-10 मार्च 1962, शिक्षा:- एम.ए. (हिंदी),बी.एड.,नेट(यूजीसी),पीएच.डी., पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषिक,साहित्यिक पक्षों,राजभाषा,राष्ट्रभाषा,लोकसाहित्य आदि विषयों पर गंभीर लेखन, प्रकाशित पुस्तकें :-1.अरुणाचल का लोकजीवन(2003) 2. अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य(2009) 3.हिंदी सेवी संस्था कोश(2009) 4.राजभाषा विमर्श(2009) 5. कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय (2010) 7. हिंदी:राजभाषा,जनभाषा,विश्वभाषा (संपादन- 2013) सम्प्रति:- उपनिदेशक(राजभाषा),केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड(भारत सरकार) , भूजल भवन, एन एच- 4,फरीदाबाद- 121001, मोबाइल- 9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com