कविता

कविता : दर्पण

देखा करो अपने आप को कभी दर्पण में
शायद तुम्हें नज़र आएगा तुम्हारा मचलना,
देखा करो अपनी आँखों की पुतली को कभी दर्पण में
शायद तुम्हें महसूस होगा तुम्हारा अफ़साना,
देखा करो अपने गुलाबी होंटों को कभी दर्पण में
शायद तुम्हें अहसास होगा अपनी मुस्कराहट का,
देखा करो अपनी बिखरी ज़ुल्फ़ों को कभी दर्पण में
शायद तुम्हें महसूस होगा हर घडी अपने साये का,
देखा करो मुट्ठी बंद कर के कभी दर्पण में
शायद तुम्हें हैरत होगी ये ज़माना तुम्हारा है,
अब देखो खुली आँखों से वो दर्पण
जो तुम्हारे दिल का है
जिसमें एक ख़ूबसूरत एहसास जगा है
देखो उस विशाल सिंघासन को
जहां बैठी एक ख़ूबसूरत अफ़सरा
कहीं वो तुम्हीं तो नहीं
जिसका इन्तेज़ार मुद्दतों से है ?

सीमा राठी

सीमा राठी

सीमा राठी द्वारा श्री रामचंद्र राठी श्री डूंगरगढ़ (राज.) दिल्ली (निवासी)