गीतिका/ग़ज़ल

शमा

शमा

रात भर मैं
अकेले मुस्कराती रही

करने को रोशन तुम्हारा जहां
रात भर खुद से खुद को
जलाती रही
रात भर मैं
अकेले मुस्कराती रही

जल उठा वो जो मेरा
दीवाना बन गया
मुझ पे सामने ही मेरे
वो कुरबान हो गया
रात भर तिल तिल कर
वो मरता रहा
फिर भी बेबस सी मैं
मुस्कराती रही
रात भर मैं
अकेले मुस्कराती रही

*राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।