धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

मनुष्य किसकी उपासना और ध्यान करे?

ओ३म्

 

हम मनुष्य है जिन्हें ईश्वर से बुद्धि प्राप्त हुई है। बुद्धि ज्ञान को धारण करती है। यदि बुद्धि में ज्ञान नहीं है तो वह अशुद्ध बुद्धि है और यदि उसमें सत्य ज्ञान है तो वह शुद्ध बुद्धि होती है। ज्ञान की प्राप्ति कर बुद्धि से ही सत्य व असत्य का निश्चय किया करते हैं। यह संसार किसने बनाया का यथार्थ ज्ञान हमें वेदेां के अध्ययन से प्राप्त होता है। यदि हम वेदों से इतर संसार के ग्रन्थों को पढ़ेगे तो हम असत्य में झुक कर भटक सकते हैं व भटकते ही हैं ऐसा हम सर्वत्र देख रहे हैं। अतः किसी आर्य परिवार में जन्म लेकर वेदों का अध्ययन कर संसार का कोई भी मनुष्य ईश्वर के सत्य वा यथार्थ स्वरुप का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। ईश्वर का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर मनुष्य को निश्चय होता है कि ईश्वर सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी होने से हर क्षण और हर पल मेरे साथ रहता है। मनुष्य को यह शरीर व इसकी समस्त इन्द्रियां उसी एक सृष्टिकर्ता परमेश्वर से ही मिली हुई हैं। अतः सभी मनुष्यों का प्रथम उपासनीय ईश्वर ही सिद्ध होता है। जन्म से पूर्व जब वह माता-पिता के पास नहीं आया था तो वह आकाश में था। उस समय न तो पूर्व जन्म के परिवार के लोग और न इस जन्म के उसके भावी माता-पिता आदि उसके साथ होते हैं। उस समय केवल एक सत्ता ही उसके साथ होती है जिसका नाम ईश्वर व परमात्मा है। वही जीवात्मा के पूर्वजन्म के शरीर से जो तब किन्हीं कारणों से उसके रहने योग्य नहीं था, बाहर निकालता है और उसे उसके कर्मानुसार इस जन्म के माता-पिता का निर्धारण कर उनसे जन्म दिलाता है। अतः माता-पिता व समाज के अन्य सदस्य, संबंधी, मित्र व समाज के लोग उसके उपासनीय व साथी बन जाते हैं। यह सभी संबंधी उसके होकर भी इस जन्म में हर समय उसके साथ रहने वाले नहीं होते। जब मनुष्य बालक होता है तो माता-पिता व परिवार के लोगों के साथ घर पर होता है। बड़ा होने पर उसे अनेक परिस्थितियों में अपने पारिवारिक व मित्र जनों से भी दूर जाना पड़ता है जहां उसके नये मित्र, साथी व उपासनीयजन होते हैं। पुराने उपासनीय जन दूर होकर अब उपासनीय नहीं होते और नये लोग उपासनीय वा समीप आते हैं। अतः यह ज्ञान होता है कि ईश्वर के अतिरिक्त मनुष्य जीवात्मा के सभी साथी अस्थाई साथी होते हैं। मृत्यु के बाद सभी एक दूसरे से बिछुड़ जाते हैं और मृतक को कुछ ही दिनों में भुला भी देते हैं। अतः पारिवारिक मित्रों की उपासना संगति दीर्घकालिक सुख प्रदान नहीं करती। परिवार का कोई सदस्य कुछ ही समय बाद मृतक के लिए दुःख नहीं करता क्योंकि हमारा परस्पर सम्बन्ध शरीर का होता है, आत्मा का नहीं। आत्मा का स्थाई संबंध तो केवल परमात्मा से ही है व अन्य सभी सम्बन्ध अस्थाई व अल्पकालिक हैं। शरीर छूटने के बाद आपसी सभी सम्बन्ध भी छूट जाते हैं।

 

ईश्वर और जीवात्मा अनादि, नित्य, अनुत्पन्न, अविनाशी, अमर, अजर, परस्पर शाश्वत, सनातन मित्र व सखा हैं। ईश्वर सर्वव्यापक है तो जीवात्मा व्याप्य है। इसी कारण जीवात्मा और ईश्वर का परस्पर व्याप्य-व्यापक नित्य व स्थाई सम्बन्ध है। ईश्वर मनुष्य को उसके कर्मानुसार उसे सुख प्रदान करने के लिए अनेक प्रकार के शरीरों में से एक शरीर देता है जिससे वह सुख प्राप्त करता है। इस कारण मनुष्य वा उसका जीवात्मा ईश्वर का ऋणी व कृतज्ञ भी होता है। अज्ञानता के साथ दोनों की परस्पर उपासना तो हर क्षण विद्यमान रहती है परन्तु जीवात्मा जब एकान्त स्थान में मन को सांसारिक विषयों से हटाकर ईश्वर के गुणों स्वरूप को जानकर उसका गुणकीर्तन अर्थात् स्तुतिप्रार्थनाउपासना सहित ध्यान करता है उसी को उपासना कहा जाता है। यह उपासना अन्य सांसारिक संबधियों व पदार्थों से भिन्न व सर्वाधिक लाभकारी होती है। इस उपासना से मनुष्य के सम्पूर्ण दुर्गुण, दुव्र्यस्न और दुःख दूर होकर जीवात्मा को कल्याणकारण गुण, कर्म, स्वभाव व पदार्थों की प्राप्ति होती है। यह बात काल्पनिक नहीं अपितु वेदादि शास्त्रों में वर्णित एवं तर्क व युक्तियों से सिद्ध तथ्य है। यह जो लाभ होता है वह ईश्वर से अन्य किसी मनुष्य व भौतिक पदार्थ की उपासना व संगति से प्राप्त नहीं होता। अन्य लोगों व पदार्थों की उपासना से मनुष्यों को क्षणिक व तात्कालिक लाभ के साथ दूरगामी दृष्टि से हानि भी होती है। मनुष्य माता-पिता व परिवार जनों की निकटता प्राप्त करता है तो एक दिन उनमें से किसी की मृत्यु होने पर वह उससे वंचित हो जाता है। अब उसे सुख के स्थान पर वियोग की असहनीय पीड़ा व दुःख से गुजरना होता है। भौतिक पदार्थों की उपासना अर्थात् भोग से शरीर निर्बल व रोगी होता है जिससे उसे दुःख होता है और कुछ समय बाद मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। मृत्यु का दुःख अभिनिवेश क्लेष कहलाता है जो कि संसार का सबसे भयंकर दुःख है। यह सांसारिक पदार्थों की उपासना संगति का ही परिणाम होता है। अतः यह सिद्ध होता है कि हमें अपने परिवारजनों व मित्रों की उपासना व संगति तो करनी है परन्तु ईश्वर को स्मरण रखते हुए प्रातः व सायं उसका गुणगान व स्तुति-प्रार्थना आदि भी करनी है जिससे हमारा वर्तमान व भविष्य सुधर सके। ईश्वर की उपासना अर्थात् उसके निकट आसन जमाना या बैठना ही ईश्वर की उपासना होती है। इससे लाभ ही लाभ है और हानि कुछ नहीं है। अतः हमें ईश्वर की नियमित उपासना अवश्य करनी चाहिये। यही कारण है कि हमारे महान बुद्धिमान व मेधा के धनी श्री राम, श्री कृष्ण, महर्षि दयानन्द और अन्य सभी ऋषि-मुनि, विद्वान व योगी सादा व सरल जीवन व्यतीत करते थे और अपना अधिक से अधिक समय ईश्वर की उपासना  अर्थात् उसकी स्तुति प्रार्थना व उपासना एवं ध्यान आदि में लगा कर ईश्वर का साक्षात्कार करने का प्रयत्न करते थे।

 

ईश्वर के निकट बैठने को उपासना कहते हैं। ईश्वर के निकट क्यों बैठें और उसका गुणगान क्यों करें? इसका उत्तर है कि हम जब भी किसी से लाभान्वित होते हैं तो उसे धन्यवाद कहते हैं। ईश्वर से हमें यह सृष्टि, इसके समस्त पदार्थ, हमारा शरीर, शरीर में बहुमूल्य आंखे, नाक, कान, मुंह, हृदय, फेफड़े, यकृत, सिर, हाथ, पैर और शरीर के अन्दर अनेकानेक बहुमूल्य उपकरण आदि मिले हैं। यदि एक ही उपकरण खराब हो जाये तो कई बार अपना समस्त धन व्यय करने पर भी हम उसे डाक्टरों से ठीक नहीं करा पाते और मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं। ईश्वर ने हमें यह हमारा शरीर व इसका प्रत्येक अवयव स्वस्थ अवस्था में बिना किसी शुल्क के दिया है। क्या हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि ईश्वर के इस महादान के लिए हम उसका प्रातः व सायं विधिपूर्वक सन्ध्या वा ध्यान के द्वारा धन्यवाद करें? इस प्रकार की ईश्वर की उपासना सबको अवश्य ही करनी चाहिये परन्तु हम सब ऐसा करते नहीं हैं। यही कारण है कि हम जीवन में समस्याओं से ग्रस्त व तनाव ग्रस्त भी रहते हैं। यदि हमें अपने कर्तव्यों का बोध हो और आलस्य व प्रमाद वश हम कर्तव्य का पालन नहीं करते तो हमें दुःख व क्लेश होता है। ऐसा ही क्लेश ईश्वर का भलीप्रकार से ध्यान व गुण-कीर्तन न करने से भी होता है। अतः कृतज्ञता के कारण ईश्वर के प्रति धन्यवाद करना ही उसकी उपासना व भक्ति है जो सबको वेदानुसार यथाविधि प्रतिदिन दोनों समय करनी चाहिये।

 

महर्षि दयानन्द उन्नीसवीं शताब्दी के सबसे बड़े वेद और धर्म के ज्ञानी महापुरुष थे। उन्होंने जीवन की हर बात को सत्य की कसौटी पर कस कर ही स्वीकार किया। उनके बाद आज तक कोई उनके समान व अधिक ज्ञानी उत्पन्न नहीं हुआ। महाभारत काल के बाद भी उन जैसा ज्ञानी, ध्यानी, ईश्वरोपासक, समाज सुधारक, वेद भक्त, देशभक्त, गोभक्त, मानव सहित प्राणीमात्र का हितैषी अन्य मनुष्य ससार में नहीं जन्मा। उन्होंने देश व विश्व के कल्याण के लिए सत्य मान्यताओं का ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश हमें दिया है। सभी मनुष्यों को उसका अध्ययन करना चाहिये और उनके बतायें हुए मार्ग पर चलना चाहिये जो मनुष्य को उन्नति के शिखर अभ्युदय व निःश्रेयस पर ले जाता है। वेदाचरण की ईश्वर उपासना में अहम् भूमिका है। अतः संसार में एक सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सच्चिदानन्दस्वरुप, सर्वशक्तिमान, जीवात्मा का उसके हर जन्म का साथी ईश्वर ही उपासनीय व ध्याय करने योग्य सिद्ध होता है। आईये, ईश्वर प्रदत्त वेद विधि से उसकी उपासना का व्रत लें और जीवन को सफल बनायें। इति।

 

मनमोहन कुमार आर्य