धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

वर्णाश्रम मर्यादा व मनु के अनुसार समाज में ब्राह्मणत्व का धारक कौन?

ओ३म्

 

पं. भगवद्दत्त जी महान् वैदिक धर्म व संस्कृति सहित ऋषि दयानन्द के महान् भक्त व अनुयायी थे। उन्होंने मनु व मनुस्मृति विषयक अपने अनुसंधान वा शोध विचारों को एक लघु पुस्तक ‘‘मनुष्यमात्र का परममित्र स्वायंभुव मनु” नाम से प्रकाशित कराया है। इसी पुस्तक से वर्णाश्रम मर्यादा व मनु के अनुसार ब्राह्मण कौन व कैसे होते हैं, इस विषय पर पं. भगवद्दत्त जी के विचार प्रस्तुत कर रहे हैं। वर्णाश्रम मर्यादा’ शीर्षक के अन्तर्गत आपने लिखा है कि मनु की दूसरी देन वर्णाश्रम मर्यादा की स्थापना है। इस मर्यादा से विरहित-संसार आज दुःख क्रन्दन कर रहा है। लोभ से अति-पीड़ित हो रहा है। इसके पश्चात पं. भगवद्दत्त जी ने मनु का ब्राह्मण श्रेष्ठ’ शीर्षक देकर लिखा है कि ब्राह्मण धन-बल से ऊंचा नहीं है, ब्राह्मण बाहुबल से भी ऊंचा नहीं है, यह ऊंचा है अपने अप्रतिम ज्ञान-बल से। उसका विशिष्ट-ज्ञान वेद पर आश्रित है। उसकी बड़ाई ज्ञान से ही है–विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठयम्।

 

पं. भगवद्दत्त जी ब्राह्मण को आविष्कारक मानते हुए लिखते हैं कि सृष्टि के सुख के लिए परमोच्च ब्राह्मण भगवान् ब्रह्मा ने सम्पूर्ण शास्त्रों का शासन किया। उशना=शुक्र और बृहस्पति ने अनेक विद्याएं रचीं। उशना ही मृतकों को जीवित करने में सशक्त हुआ। ब्राह्मण विश्वकर्मा ने अपूर्व शिल्प आविष्कृत किए। भरद्वाज ने आकाश-गंगा तक उड़ने वाले विमान बनाए। ब्राह्मण-प्रवर व्यास ही दिव्य चक्षु=विद्युत आंखें दे सका।

 

आर्य जाति में राजा, प्रधानमन्त्री, अथवा गण-नायक इतना पूज्य नहीं, जितना यथार्थ ब्राह्मण पूज्य है। ब्राह्मणों और ऋषियों से अपनी कन्याओं का विवाह करके आर्य राज-गण अपना गौरव मानते थे। वेदज्ञ ब्राह्ण ही यथार्थ नेता होता है। (जैसे की महर्षि दयानन्द सरस्वती थे।)

 

अपने गम्भीर वैदिक साहित्य के अध्ययन के आधार पर पं. भगवद्दत्त जी ब्राह्मण को सर्वतः श्रेष्ठ घोषित करते हुए कहते हैं कि भारतीय संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण वही है, जो केवल अगले दिन की भोजन-सामग्री एकत्र रखता है। उससे न्यून श्रेष्ठ एक से छः मास की सामग्री वाला है। श्रेष्ठता का यही माप उत्तरोत्तर होता है। मनु 4/2-7, ब्राह्मण लोलुप नहीं था। लोभ से धन स्वीकार करने वाला ब्राह्मण विनाश को प्राप्त होता है, 3/179, ब्राह्मण का कर्तव्य है कि वह स्वाध्याय में रत रहे। स्वाध्याय-विरोधी अर्थोपार्जन के सम्पूर्ण व्यवहार उसे त्यागने चाहिए–

 

सर्वान् परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः।

 

ब्राह्मण राष्ट्र का आधार’ शीर्षक देकर अपने लिखा है कि श्रेष्ठ राष्ट्र का आधार इन अतिमानुष (superman) पुरुषों (सच्चे ब्राह्मणों) पर होता है। जो पुरुष किसी के हाथ बिक नहीं सकता, जो खरीदा नहीं जा सकता, वह विद्वान् ही राष्ट्र का आधार होता है। आज इन पूज्य पुरुषों के अभाव में भारत दुःखी है।

 

विद्वान लेखक पं. भगवद्दत्त जी लिखते हैं कि भारत का गौरव ब्राह्मण से है। वह कहते हैं कि मनु-निर्दिष्ट मार्ग पर चलने वाले इन्हीं ब्राह्मणों के गीत ह्यनूसांग, अलमासूदी, अलबेरूनी, निकोला, मनूची और कर्नल विल्फर्ड ने गाये हैं। मार्श मैन ने भी लिखा है–

 

“The Directors of the East India Company opposed their (Christian missionaries) activities on the ground among others, that these woild interfere with the Hindu religion, which produced men of purest morality and stricted virtue.”

 

निस्सन्देह आर्य धर्म ने पवित्रतम आचार और शुभ्र गुणयुक्त नर उत्पन्न किए थे।

 

इसका सारा श्रेय मनु और तदनुकूल आर्य राज्य को है। मनु का सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण वही है, जिसको सांसारिक वासनाएं लघुतम हों। मनु की संस्ेकृति के प्रसाद की छत के स्तम्भ राजगण नहीं, ऋषि और श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं।

 

दोषी ब्राह्मणों को चतुर्गुण दण्ड का उल्लेभ भी पं. भगवद्दत्त जी ने किया है। वह लिखते हैं कि ज्ञानवान् ब्राह्मण पूज्य हैं। वह श्रद्धा का स्थान है पर दोषी होने पर मनु ने उनको छोड़ा नहीं। वह वाक्-पारुष्य आदि अधर्म करे, तो शूद्र की अपेक्षा उस पर दण्ड चतुर्गुण होता है। इसका स्पष्ट उल्लेख मनुस्मृति 8/268 में है। मनु ने ब्राह्मण को रियायत नहीं की। हां, ब्राह्मण के ज्ञान की रक्षा के लिए उसे अवध्य अवश्य कहा है। अन्यत्र स्तेय आदि में ब्राह्मण को शूद्र की अपेक्षा आठ गुणा वा सोलह गुणा दण्ड कहा है। मनुस्मृति के श्लोक संख्या 8/337, 338, 373 भी द्रष्टव्य हैं। धर्मध्वजी, दुष्ट, वैडालव्रतिक, कठोर और छली ब्राह्मण की मनु ने श्लोक संख्या 4/195-197 में घोर निन्दा की है।

 

ब्राह्मण का मुख्य कार्य बिना सरकार से वेतन लिए व शिष्यों से शुल्क लिए उन्हें निःशुल्क शिक्षा देना होता था। इस विषय का उल्लेख करते हुए पं. भगवद्दत्त जी ने लिखा है कि ब्राह्मण संचय (hoard) नहीं करता था। उसका निर्वाह दक्षिणा पर था, अथवा उस भूमि पर था, जो राज्य की ओर से उसे मिलती थी। शतशः प्राचीन ताम्र शासन्, जो आज भी मिलते हैं, इस बात का प्रमाण हैं। ये ब्राह्मण जाति को शिक्षा देने के काम में लगे रहते थे। अतः मनु ने शिक्षा का निःशुल्क प्रसार बताया है। राज्य की ओर से शिक्षा पर कोई धन विशेष व्यय नहीं किया जाता था। भृतकाध्यापक अर्थात् वेतन लेकर पढ़ाने वाले ब्राह्मण की निन्दा है–मनुस्मृति 3/156।। छात्र ऐसे ब्राह्मणों के पास रहकर अनुशासन और विनय सीखते थे। ब्राह्मण भूमि कर्षण स्वयं नहीं करते थे। अतः जो शूद्र (अशिक्षित श्रमिक कृषक) उनके निमित्त भूमि-कर्षण करते थे, वे उनके सत्संग से श्रेष्ठ गुण सीखते थे। वे पतित होने की ओर नहीं झुकते थे। राष्ट्र में सदाचार का स्तर पर्याप्त ऊंचा रहता था।

 

मनु की व्यवस्था सर्वतोमुख सुख का प्रसार करती है।

 

वर्णाश्रम धर्म के अन्तर्गत मनु की ब्राह्मणों के कर्तव्यों व योग्यताओं की वैदिक कालीन मान्यताओं का पं. भगवद्दत्त जी ने यथार्थ चित्रण किया है। इन विचारों व मान्यताओं का देश के जन-जन में प्रचार किया जाना चाहिये। जन्मना ब्राह्मण कुलोत्पन्न बन्धुओं को भी इन विचारों के परिप्रेक्ष्य में आत्मालोचन करना चाहिये और मनु के विचारों के अनुसार स्वयं को बनाना चाहिये जिससे मनु पर लगने वावले मिथ्या आरोपों से उन्हें बचाया जा सके। इन विचारों के अनुसार वैदिक वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित नहीं अपितु गुण, कर्म व स्वभाव पर आघारित सिद्ध होती है। हम आशा करते हैं कि इस लेख अनेक पाठकों की कई भा्रन्तियो दूर व निर्मूल होंगी। इति।

 

मनमोहन कुमार आर्य