कविता

धुंध और धूप का रिश्ता

धुंध और धूप का रिश्ता विचित्र है दोनों शब्द ‘ध’ वर्ण से सृजित हैं यद्यपि दोनों का कोई मेल नहीं है फिर भी वे मानो मित्र हैं.   धुंध को अपना जलवा बिखेरने देने के लिए धूप तनिक विनम्र हो जाती है धूप को अपने शबाब पर आने देने के लिए धुंध रास्ता देती जाती […]

कविता

पुत्र ! वादा करो

  माँ ! अब तो बेटे पर तरस खाओ उसे इतना मत डराओ । नादान पुत्र है कर दिया होगा नादानी तुम तो माँ हो क्यों कर रही हो अब मनमानी ।   रह-रह कर लेती हो अंगराई सपने हो जा रही धराशायी कितनों की जिंदगी पर आफत बन आयी ।   पुत्र ! मैं […]

गीत/नवगीत

कहानी जोश की

मन बुढा हो तो तन बुढा ‘ सीख़ हमें दे जाती है सौ साल की दादी जब ‘ स्वर्ण पदक ले जाती है । सौ मीटर हैं दौड़ी ‘मन जी’ सिर्फ इक्क्यासी पल में ही अपनी हिम्मत और लगन से कीर्तिमान रच जाती हैं ।। कौन हैं इनके गुरु सुन हक्के बक्के रह जाओगे देख […]

राजनीति

केजरीवाल के नगीने

महाभारत के अन्त में जब अर्जुन को यह ज्ञात हुआ कि कर्ण उनका सहोदर भ्राता था, तो उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रश्न पूछा कि यह जानते हुए भी कि पाण्डव उसके सगे भाई हैं, कर्ण ने द्रौपदी के चीरहरण के लिए दुःशासन को क्यों प्रेरित किया, दुर्योधन के सारे षडयंत्रों में क्यों मुख्य भूमिका निभाई? श्रीकृष्ण […]

राजनीति

चाय पर चर्चा -3

अजय भी पीछे हटने के मूड में बिलकुल नहीं था । वह इन देहातियों के मन से मोदी सरकार के प्रति पैदा हुई गलतफहमी को किसी भी तरह से दूर करना चाहता था । बोला ” आप लोगों ने देखा ? चीन और पाकिस्तान भी अब मोदीजी से खौफ खाते हैं । सीमा पर हमारे […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

ऋषि दयानन्द के साक्षात्दर्शनकर्ता का उनके कुछ प्रसंगों का वर्णन

ओ३म्   आज हम इस लेख में पं. नथमलजी तिवाड़ी, अजमेर का निजी अनुभवों पर आधारित ऋषि दयानन्द के जीवन की कुछ घटनाओं का वर्णन प्रस्तुत कर रहे हैं जो वर्तमान के अनेक आर्य विद्वानों एवं पाठकों की दृष्टि से ओझल है। इसका प्रकाशन परोपकारिणी सभा के वर्तमान प्रधान डा. धर्मवीर ने वेदवाणी के दयानन्द-विशेषांक, […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कितना दुखा है दिल वो नादान क्या जाने क्या छीन लिया मेरा वो बेईमान क्या जाने। हम टुकड़े दर्द ए दिल के चुनते ही रह गए क्या ले गया उड़ाकर वो तूफ़ान क्या जाने। सिमटी सी अनकही रह गईं हैं ख्वाहिशें दिल में मचल रहा है वो अरमान क्या जाने । सोचा न जरा समझा […]

संस्मरण

मेरी कहानी 161

सुबह चार बजे उठ गए, नहा धो कर कपड़े पहने, कुलवंत ने चाय बनाई और पी कर कमरे से बाहर आ गए। अभी अँधेरा ही था और कुछ कुछ ठंड थी लेकिन मौसम सुहावना था। सभी दुकाने अभी बन्द थी। यहां से कोच चलनी थी, हम ने पिछले दिन ही देख लिया था, इस लिए […]