दीपावली

“अप्प दीपो भवः” तथागत का ये संदेश सदियों बाद भी उतना ही सामायिक है जितना उनके समय में था। प्रत्येक वर्ष प्रकाशोत्सव दीपावली के आते ही ये संदेश स्वयमेव ही स्मरण हो उठता है। दीपावली जैसा कि हम सबको ज्ञात है दीपों का पर्व है। नाम ही है दीप + अवलि अर्थात दीपकों की पंक्ति। दीपावली का जितना भौतिक महत्व है उतना ही आध्यात्मिक महत्व भी है। ये तो हम सब जानते हैं कि जब भगवान् श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास समाप्त करके रावण वध के उपरांत अयोध्या लौटे थे तो समस्त अयोध्या वासियों ने दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था और पूरी अयोध्या को प्रकाश से भर दिया था। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि हमारे सारे पौराणिक पात्र वास्तविक तो हैं ही साथ ही साथ बहु आयामी भी हैं। उनकी जीवन गाथा से हमें दो प्रकार के संदेश मिलते हैं स्थूल एवं सूक्ष्म। स्थूल संदेश हम पकड़ लेते हैं एवं युग-युगांतर तक उसका अँधानुकरण करते रहते हैं परंतु सुक्ष्म संदेश हम नहीं पकड़ पाते। इसीलिए हमारे जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आ पाता। नहीं तो ये असंभव है कि प्रत्येक वर्ष दीपावली मनाने के पश्चात भी हमारे जीवन में अँधेरे का साम्राज्य हो। अयोध्या वास्तव में हमारा चित्त है जो इस शरीर रूपी राज्य की राजधानी है। राम हमारी आत्मा है जोकि स्वाभाविक रूप से इस राज्य का सम्राट होने के योग्य है। परंतु युगों तक विषयों में भटकने के कारण इसे अपने वास्तविक स्वरूप का विस्मरण हो गया है, समय की धूल इस दर्पण पर इस प्रकार जम गई है कि हम कौन हैं ये हमें दिखाई ही नहीं पड़ रहा। चौदह वर्षों का वनवास ज्ञानार्जन एवं ध्यान की वो लंबी प्रक्रिया है जिससे ये आत्मा रूपी राम अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करता है। हनुमानजी का पात्र हमें बताता है कि हमारी क्षमता अपार है। हम एक ही छलांग में सौ योजन के समुद्र को लांघ सकते हैं। इस संसार रूपी सुरसा के मुख में जाकर भी लौटना संभव है। कठिनाई केवल यही है कि हमें अपनी क्षमता का बोध नहीं है। ये बोध दिलाने के लिए हमें एक गुरू की आवश्यकता है।गुरू हमें अपनी क्षमता पर भरोसा करना सिखाता है। लक्ष्मण एवं मेघनाद का संघर्ष हमें एक महत्वपूर्ण शिक्षा देता है। मेघनाद इंद्रजीत था अर्थात् उसने इंद्र पर विजय प्राप्त की थी वहीं लक्ष्मण इंद्रियजीत थे अर्थात् उन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त की हुई है। कथा है कि लक्ष्मण ने चौदह वर्षों के वनवास में न कुछ खाया एवं न ही वो सोए। ये वही कर सकता है जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया हो। यदि आप पूरे संसार पर विजय प्राप्त कर लें लेकिन अपनी इंद्रियों को न जीत पाएँ तो आपकी पराजय निश्चित है। रावण-वध वनवास के अंत में ही क्यों हुआ इसका भी एक प्रतीकात्मक अर्थ है। रावण कोई और नहीं हमारा अहंकार ही है एवं रावण के दस शीश काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि दस दुर्गुणों के प्रतीक है। रावण की नाभि में अमृत कलश इस बात का सूचक है इस अहंकार का जितनी बार भी वध करो ये प्रत्येक बार नए अवतार में लौट आता है। जब तक तपश्चर्या के अमोघ अस्त्र से इसकी नाभि को बेध न दिया जाए तब तक इसकी मृत्यु संभव नहीं एवं ये दुष्कर कार्य उसी लंबी व कठिन प्रक्रिया से पसार होने के बाद ही हो सकता है। तो जब आत्मा रूपी राम अपना ज्ञान एवं ध्यान का वनवास पूरा कर अहंकार रूपी रावण का वध कर पुनः अपनी राजधानी में प्रतिष्ठित होता है तो एक दिव्य प्रकाश, दिव्य आलोक होना स्वाभाविक है। कुछ लोग कहते हैं कि दीपावली या अन्य ऐसे त्योहार मनाना संसाधनों का नाश करने के समान है परंतु ये बिल्कुल गलत बात है। यही सब त्योहार तो हमें जीवन जीने का मार्ग दिखाते हैं, हमारे मन में एक नई आशा का संचार करते हैं, हमारे गौरवशाली अतीत से हमें परिचित कराते हैं, हममें ये विश्वास जगाते हैं कि हम भी यदि प्रयास करें तो आदर्शों के उस उत्तुंग शिखर को छू सकते हैं जिसकी स्वाभाविक क्षमता वास्तव में हम सबके पास जन्म से ही है, बस आवश्यकता है दृढ़ संकल्प की। तो इस दीपावली पर खूब दीप जलाइए, खूब आनंद मनाइए, खूब पटाखे जलाइए पर एक संकल्प कीजिए अपने अंतर के दीप को प्रकाशित करने का। ये मिट्टी के दीपक तो थोड़ी सी जगह को प्रकाशित करेंगे एवं थोड़े समय में बुझ जाएँगे परंतु एक बार अंतर का दीप आलोकित हो गया तो वो युग-युगांतर तक जलता रहेगा और समग्र संसार में प्रकाश फैलाएगा।

मंगलमय दिवस की शुभकामनाओं सहित आपका मित्र :- भरत मल्होत्रा।