गीत/नवगीत

गद्दारों की टोली में

देखो हाहाकार मचा है गद्दारों की टोली में है प्रयास में फिर भी सत्ता आ न सकेगी झोली में कुर्सी की चाहत में इतने नीचे गिरे यकीन नहीं शायद इनका नाम लिखा है आतंकी की गोली में जो ना हुआ आपने भारत का किसी और का क्या होगा इनको जिसने जन्म दिया है खुद पर […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सफ़र घर वापसी का है, मजे का है खुशी का है संभल कर नाव से उतरें. किनारा ये नदी का है मुसाफिर हूं हमारा साथ, घड़ी बस दो घड़ी का है, हमारा दिल हमारा कब, हमारा दिल किसी का है, जहॉ है बस यहॉ कुछ का, ये कहने को सभी का है, तुम्हारे ऐश का […]

कविता गीतिका/ग़ज़ल पद्य साहित्य

दिल है पहलु में

दिल है पहलु में मगर इक कमी सी रहती है उसकी आवाज़ में बड़ी ख़ामोशी सी रहती है जिनकी पलकों पे कभी शाम नहीं होती थी हमारी शब अक्सर वहीँ तमाम होती थी जिनकी ज़ुल्फ़ों में बोहोत पेंच-ओ-ख़म समाये थे सावन की बारिशों के कई मौसम वहां बिताये थे उन यादों की हवा अब भी […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

जब की  खुद  हमने  बढाई है  मुसीबत अपनी, आओ खुद से ही  करी जाए  शिकायत अपनी। वक्त बदला भी  तो किस काम का  अपने यारों, बद से  बदतर  ही  हुई  जाए  है  हालत अपनी। लाख  फिर  मंज़रे – हाज़िर  की  गिरी सूरत हो, देखना  वो  ही  हमें  है   जो  है  चाहत  अपनी। बस कि […]

गीत/नवगीत

सरहद आल्हा /वीर छंद (गीत )

  भड़की ज्वाला खूँ की प्यासी, सरहद भरती है हुंकार| उबल पड़ा फिर लहू हिन्द का ,सुनकर  साँपों की फुफकार|| दुर्गा मात जहाँ की बेटी ,बब्बर शेर जहाँ के लाल| भारत माँ का एक इंच भी ,होने ना दें बाँका बाल||   सोच लिया कैसे तूने फिर ,अपना झंडा देगा गाड़| भारत की बलशाली सेना […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : इक घाट पे धुले वो सभी पैरहन तमाम

पर्दा जो उठ गया तो हुआ काला धन तमाम चोरों की ख्वाहिशों के जले तन बदन तमाम बरसों से जो महकते रहे भ्रष्ट इत्र से इक घाट पे धुले वो सभी पैरहन तमाम बावक्त असलियत का मुखौटा उतर गया किरदार का वजूद हुआ दफ़अतन तमाम ये बंद खिड़कियाँ जो खुली पस्त हो गई सब झूठ […]

लघुकथा

नया ज़माना

संदीप स्वयं को आधुनिक मानता था. उसका कहना था कि जैसा ज़माना हो उसके अनुसार ही चलना चाहिए. ज़माने के साथ रफ्तार मिलाने में वह अक्सर यह भी नही सोंचता था कि इसका परिणाम क्या होगा. उसके बड़े भाई अक्सर उसे समझाते थे कि जमाने के हिसाब से चलना तो ठीक है लेकिन बदलते समय […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

कोई भी राह जीवन की मेरे तुम तक नहीं जाती, ना जाने क्यों मगर दीदार की हसरत नहीं जाती, हैं मजबूर हम दोनों ही अपने दिल के हाथों से, मेरी उल्फत नहीं जाती तेरी नफरत नहीं जाती, बहुत से दोस्तों को हो गई है दुश्मनी मुझसे, सच बोलने की पर मेरी आदत नहीं जाती, महकना […]

कविता

कविता

धरती अपनी धूरी पर चक्कर लगाती है किसी को कोई एतराज नही होता धरती सूरज के इर्द गिर्द चक्कर लगाती है किसी को खबर तक नही होती परन्तु…. जब मेरे पेट की भूख नाभी की परिक्रमा पूरी करने के लिए करती है कोई न कोई हीला वसीला तो लोगों मे हाहाकार क्यो मच जाती है…!! […]