ग़ज़ल

 

आता जाता नहीं कोई कभी बीराने में
दिले बर्बाद छुपा रक्खा है तहखाने में ।

शौक से करता नहीं हूँ मयकशी मैं यारो
उसकी तस्वीर नजर आती है पैमाने में ।

बेअदब हो के यूँ इठला के न चलिये साहिब
बड़कपन आदमी का दिखता है झुक जाने में ।

क्यूँ भला दूर हुआ जिंदगी से मेरी वो
दिल दुखाया नहीं जिसका कभी अनजाने में ।

लोग पागल दिवाना कहते मुझे हैं अक्सर
आदमी ढूंढता फिरता हूँ मैं बुतखाने में ।

— धर्म पाण्डेय