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काला धन् + धा

भला हो हमारी मौजूदा सरकार का की वो हमें आये दिन ऐसे मुद्दे देती रहती है जिस पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस आवश्यक है, जैसे असहिष्णुता, राष्ट्रीयता, देशद्रोह बनाम देशभक्ति, सर्जिकल स्ट्राइक, विदेशी संबंध, राजनैतिक चरित्र, सब्सिडी का हक, शिक्षण संस्थान, कला से जुड़े लोगों की सुचिता, शहादत, मान-अपमान आदि आदि। इस बार काला धन का मुद्’आ प्रस्तुत है जो विमुद्रीकरण की कोख से जन्मा है।

काले धन पर चर्चा-परिचर्चा का दौर चल रहा है। स्थिति इतनी विकट है कि रिश्तों के पार्टीशन दरकने लग गये हैं। कई बार यह भी देखने में आया है कि काले का ‘क्या और क्यों’ समझे बग़ैर लोग तोपें तान लेते हैं। यह सब देखते हुए मैंने सोचा कि बहस में कूदने से पहले इस काले की करतूत ठीक से समझ ली जाय तो अच्छा है। काला धन क्या है? संयुक्त राष्ट्र संघ की एक व्याख्या के अनुसार वह धन जो कानूनी या ग़ैर कानूनी तरीके से कमाया गया है लेकिन उस पर कर अदा नहीं किया गया है, काला धन कहलाता है। इस व्याख्या से यह तो जाहिर ही है कि इसे भी कमाने में आपकी मेहनत लगती है और इसीलिये आप इसको सीने से लगा कर रखते हैं। कर क्या है? यह आपकी गाढ़ी कमायी का वो हिस्सा है जो आप अपने सामाजिक दायित्व के लिये और अपनी मूलभूत सुविधाओं की रचना, उनके रखरखाव और कई प्रकार की सेवाओं के लिये सरकार को अदा करते हैं। यह उचित भी है पर सब लोग उदार चरित्र नहीं होते। बहुत से लोग सिर्फ़ अपने लिये ही जीते हैं और कर देना उन्हे गुंडे के हफ्ता जैसा लगता है। ऐसे लोग तरह तरह के आय छिपाने के तरीके अपना कर करमुक्त रहने का प्रयास करते हैं। ऐसे बचाये गये धन को काला धन कहते हैं।

इस पूँजी का रंग रूप तो सामान्य ही होता है, बस इस पर करचोरी की काली छाया होती है। समझदार ऐसे धन को छद्म पूँजी में निवेश करके रखते हैं और कम अक्ल रुपये के रूप में अपनी तिजोरी में या सोफे, दीवार आदि में छुपा लेते हैं। ऐसा नहीं है कि यह पैसा चलन से बाहर रहता हो। दो नंबर की सारी लेन-देन में, क्रय-विक्रय में इसी का भुगतान होता है और एक चूहे की तरह यह इस बिल से उस बिल में टहलता रहता है। हमारे देश में इस नंबर दो के अर्थ तंत्र का आकार लगभग असली अर्थ तंत्र के बराबर माना जा रहा है। अनुमानतः यह हमारे सकल घरेलू उत्पाद का लगभग २६% है। हालाँकि, यह कई एशियाई, अफ्रीकी और दक्षिण अमरीकी देशों के मुकाबले काफी कम है पर हमारे विकासशील अर्थ व्यवस्था के लिये चिंता का विषय अवश्य है। यूँ तो कुछ एक अर्थ शास्त्रियों का मानना है की गाहे बगाहे आने वाली आर्थिक मंदी के दौर से जहाँ दूसरे देश पस्त हो जाते हैं भारतीय अर्थ तंत्र इस काले धन की वजह से बच जाता है। मगर जब बात सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय की गणना करने की आती है तो यह काला धन सारी गणित बिगाड़ देता है। सकल घरेलू उत्पाद कुल सेवा और उत्पादन का योग होता है पर जिस उत्पादन या दी गयी सेवा को छुपा लिया गया हो वह होते हुए भी गणना में नहीं आ पाता।

इसका सीधा सा उदाहरण है अपनी खरीद या ली गयी सेवा का पक्का बिल न लेना, और ऐसा, कर की राशि से बचने के लिये, लोग जाने अनजाने करते रहते हैं। इसी प्रकार अपनी कमाई पर कर न दे कर उस आय को आप छुपा लेना प्रति व्यक्ति आय के औसत को कम कर देता है। इतना समझने के बाद इस तथ्य को समझना आसान हो जाता है कि सरकारें जब तब इसको उजागर करने का प्रयास क्यों करती रहती हैं। एक तरफ तो सरकार की आय कम होती है तो दूसरी तरफ तमाम योजनाओं की गणना गलत हो जाती है। न चाहते हुए भी योजनाओं की आपूर्ति के लिये नया पैसा छापना पड़ता है या मँहगा ऋण उठाना पड़ता है। आम तौर से जो उपाय सरकारें अपनाती हैं उनमें कर की छूट या अन्य प्रलोभन या दंड आदि का प्रयोग किया जाता है।

विमुद्रीकरण भी एक तरीका है, पर कई अर्थ शास्त्री इसे बहुत कारगर तरीका नहीं मानते। उनके हिसाब से इस प्रक्रिया में एक तरफ तो जन मानस को परेशानियाँ होती हैं और लागत भी बहुत आती है, जैसा की हम देख ही रहे हैं, तो दूसरी तरफ बहुत काला धन बाहर नहीं आ पाता है। बड़े चोर नकदी से दूर रहते हैं और विदेशी मुद्रा, विदेशी या छद्म कंपनियों में निवेश या विदेशी खातों में धन को रखते हैं इसीलिये उन पर विमुद्रीकरण का कोई असर नहीं पड़ता। छोटे चोर पहले तो नकदी को सोने आदि में बदलने की कोशिश करते हैं और अगर न कर पाये तो दंड और बदनामी से बचने के लिये उसे नष्ट कर देते हैं। मुश्किल से १ या २% लोग ही टैक्स दे कर कुछ न कुछ बचा लेने की सोचते हैं।

काला धन किस किस के पास होता है? वह व्यापारी जो अपने उत्पादन या बिक्री का एक हिस्सा छुपा लेता है, वह विक्रेता जो बिक्री का सही मूल्य नहीं बताता जैसे ज़मीन या मकान आदि की बिक्री, वह सरकारी अधिकारी या सेवा दार जो अपनी सेवा के बदले ग़ैर कानूनी कमीशन या घूस लेता है जिसे वो उजागर नहीं कर सकता, वह राजनीतिक व्यक्ति या दल जो अपने कोष में छद्म अनुदान की स्वीकृत देता है और वह पूँजीपति जो अपनी वास्तविक आय के बड़े हिस्से को अवास्तविक खर्च दिखा कर छुपा लेता है। इसको रोकने के बहुत प्रयास किये जाते रहे हैं पर, क्योंकि इंसान मूलतः लालची होता है तथा और-और की उसकी भूख नहीं मरती, वह धन कमाने के नित्य नये सही या ग़लत आयाम रचा करता है। स्वभावतः उसे बाँट कर खाने की भी आदत नहीं है इसीलिये कर की चोरी करता है।

इसका एक तरीका यह है कि कराधान को हटा लिया जाय तो काले धन की समस्या भी समाप्त हो जाएगी। फिर प्रश्न यह उठता है कि तमाम सामाजिक सुविधाओं को कैसे पोषित किया जाय क्योंकि इसके बग़ैर तो सारा अर्थ तंत्र ही समाप्त हो जाएगा जो समाज के काम काज पर ही टिका हुआ है। दूसरा यह की मनुष्य को कर चोरी करने का मौका ही न दिया जाय। मनुष्य अपने आप तो सरकार को अनुदान देगा नहीं इसलिये उसे किसी न किसी प्रकार साझाकोष के लिये बाध्य करना ही पड़ेगा। यहाँ हम कुछ ऐसे तरीकों पर चर्चा करते हैं जो कई अर्थ- शास्त्रियों के हिसाब से कारगर होते हुए भी राजनैतिक कारणों से सरकारें अपनाने से हिचकती रही हैं। एक तरीका है आयकर को पूरी तरह से हटा कर। इसके स्थान पर खर्च को निशाना बनाया जाय। लोगों को कमाने की पूरी छूट होने से आर्थिक कारोबार का भी खूब विकास होगा पर, क्योंकि अब लोग कम कर देने के चक्कर में खर्च को कम करने की कोशिश करेंगे तो ज़रूरत से ज़्यादा उत्पादन होना स्वतः ही मर्यादित हो जाएगा। व्यापारियों के टर्नओवर पर कराधान करने से वे अपनी आय नहीं छुपा पाएँगे। राजनीतिक दलों और एनजीओ के नकद अनुदान को समाप्त कर देने से वे छद्म अनुदान नहीं जुटा पाएँगे। योजनाओं के ठेके आनलाइन करने से पारदर्शिता बढ़ेगी और कमीशनखोरी स्वत: समाप्त हो जाएगी। ज़मीन व मकान की नकद रजिस्ट्री समाप्त करने से काले धन पर नकेल लग जाएगी। खर्च पर कराधान से घूस द्वारा एकत्रित राशि को खर्च करना मुश्किल हो जाएगा। बचत को बढ़ावा देने से लोग दबा कर पैसा रखने की कोशिश नहीं करेंगे। कम से कम नकद लेन देन नकली नोट की समस्या का समाधान होगा। पैसा चलन में रहता है तो बार बार बैंकों से हो कर गुज़रता है और नकली नोट पकड़े जाने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं।

हम यह नहीं कहते कि इन उपायों से काला धन पूर्णतयः समाप्त हो जाएगा या नकली मुद्रा विलुप्त हो जाएगी पर इतना निश्चित है कि इसका प्रसार नगण्य रह जाएगा। चाणक्य ने भी कहा है कि भ्रष्टाचार एक छाया की तरह होता है। इसे कम तो किया जा सकता है पर मिटाया नहीं जा सकता, अतः राजा को इसे कम करने का प्रयास करना चाहिये, मिटाने की निरर्थक कोशिश नहीं।

मनोज पाण्डेय 'होश'

फैजाबाद में जन्मे । पढ़ाई आदि के लिये कानपुर तक दौड़ लगायी। एक 'ऐं वैं' की डिग्री अर्थ शास्त्र में और एक बचकानी डिग्री विधि में बमुश्किल हासिल की। पहले रक्षा मंत्रालय और फिर पंजाब नैशनल बैंक में अपने उच्चाधिकारियों को दुःखी करने के बाद 'साठा तो पाठा' की कहावत चरितार्थ करते हुए जब जरा चाकरी का सलीका आया तो निकाल बाहर कर दिये गये, अर्थात सेवा से बइज़्ज़त बरी कर दिये गये। अभिव्यक्ति के नित नये प्रयोग करना अपना शौक है जिसके चलते 'अंट-शंट' लेखन में महारत प्राप्त कर सका हूँ।