कविता

ये भी दीपावली

जब भी मैंने प्रकाश को देखा
तो वो सूरज का हिस्सा लगा।
जब मैंने अंधकार को देखा,
वह भ्रष्टाचार के साथ देनेवाला लगा।
हर दिन व रात मैंने उस बंगले से आती रोशनी को देखा।

पहली बार मुझे दिखा,
इस अमावस्या की काली रोशनी को चीरती
दूर झोपड़ी में टिमटिमाती टूटती बिखरती रोशनी दिखाई दी।
हर फुलझड़ी की हल्की सी रोशनी के साथ खिलखिलाती आवाजें
बच्चे की खुशी में लिपटी ये रोशनी।

वहीं बंगले में एक अजीब सा सन्नाटा
बीच बीच में नोटों की गरमी व सिक्कों की खनकती आवाजें,
बस तय था कि उस झोपड़ी जित्ती खुशी रत्ती भर यहां (बंगले में) नहीं थी।
बंगले में सेलिब्रेट हो रही थी दीवाली।
पर दीपावली की एक छोटी रोशनी
झोपड़ी के उस जल्द बुझ जाने वाले दीपक में दिख रही थी।

अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी

अभिषेक कांत पाण्डेय

हिंदी भाषा में परास्नातक, पत्रकारिता में परास्नातक, शिक्षा में स्नातक, डबल बीए (हिंदी संस्कृत राजनीति विज्ञान दर्शनशास्त्र प्राचीन इतिहास एवं अर्थशास्त्र में) । सम्मानित पत्र—पत्रिकाओं में पत्रकारिता का अनुभव एवं राजनैतिक, आर्थिक, शैक्षिक व सामाजिक विषयों पर लेखन कार्य। कविता, कहानी व समीक्षा लेखन। वर्तमान में न्यू इंडिया प्रहर मैग्जीन में समाचार संपादक।