लघुकथा

ख़ाली कनस्तर

गंगा अपने घर के हालातों से परेशान थी । उसका पति मज़दूरी करता था। पहले कमाई अच्छी होती थी सो गंगा घर में ही रहती थी । पर अब हालात बदल गए थे । एक वक़्त की रोटी भी कई बार नसीब नहीं होती थी । गंगा ने अपने पति से कहा , ” सुनो […]

गीतिका/ग़ज़ल पद्य साहित्य

मिले

मेरी ख़ुशी का ग़म का जहाँ हिसाब मिले चले वहां जहाँ रिंदों को भी सवाब मिले मेरी नेकी ने बोहोत तोहमतें कमाईं है अब कुछ तो मेरी बदी को नया खिताब मिले क्यों आसमाँ को तकते रहे हमेशा हम जब ज़मी पे ही हमे कितने आफ़ताब मिले मुंतज़िर हूँ मैं कुशादा भी ज़र्फ़ है मेरा […]

अन्य लेख

श्री लंका के पत्रकारों का संघ और भारत की मित्रता

श्री लंका और भारत की प्रगाढ़ मित्रता अत्यंत पुरानी है, जिसका एक ताज़ा अनुभवपिछले अक्टूबर कोश्री लंका के पत्रकारों के द्वारा आयोजित एक समारोह ने हमेंमहसूज़ करने का मौका दे दिया।श्री लंका के पत्रकारों के संघ की 61वीं सालगिरह मुख्य अतिथि श्री लंका के राष्ट्रपति मइत्रीपाल सिरीसेन की प्रमुखता से पिछले 25 अक्टूबर को श्री […]

राजनीति

नोटबंदी पर सरकार और विपक्ष के बीच खिंच गयी तलवारें

नोटबंदी पर अब सरकार ओैर विपक्ष के बीच तलवारें खिच गयी हैं। नोटबंदी पर अब न तो सरकार अपने कदम वापस लेने वाली है और न ही विपक्ष सरकार का सहयोग करने को तैयार है। विपक्ष जिस प्रकार से पीएम मोदी की सरकार का तीखा विरोध कर रहा है उससे साफ पता चल गया है […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक : व्यर्थ

व्यर्थ में व्यर्थ का, राग आप अलापते, व्यर्थ ही आग में, आप आहूति डालते। यज्ञ या चिता नही, ये दावानल प्रचंड है, व्यर्थ आपके बोल, जो हिय को सालते। — अ कीर्तिवर्धन

कहानी

कहानी : कदली के फूल

वो खुद को बहुत संतुष्ट और एडवांस समझती ही नहीं,भाव-भंगिमा से व्यक्त भी करती रहती थीं ! अलका दी,सबसे बेबाक होकर मिलना,हर विषय पर एक्सपर्ट कमेन्ट देना और क्या मायका,क्या ससुराल यहाँ तक कि पडौसियों की भी कमियां निकलती रहती,लगता जैसे परनिंदा में उन्हें अपार सुख मिलता था ! अपने बचपन का बताने बैठतीं तो,” […]

कविता

लहर

तुम्हें लगा टूट कर बिखर जाँउगी जिसे थामने के लिए आगे बढ़ोगे तुम आत्मसंयमित स्वयं को सम्भाले हुए तुम्हारे ही सामने कितनी बार बिखरकर सम्भल गई लहर की तरह तुम जड़वंत खड़े रहे जानते थे मेरे अंदर उमड़ती समंदर की लहर के करीब भी आये तो निगल जाएगी ये तुम्हें बिनाशक — डॉ हेमलता यादव 

कविता

मुरझाया फूल

सूखा मुरझाया फूल पुरानी किताब में मिला खुशबू न थी फूल में रंग भी बदल चुका था मेरी तरह बदले हुए से तुम भी सामने थे टी-वी में मशगूल पर मुझे याद था अब भी वो माशुक सा इक लड़का भर के फूल में इश्क देता हुआ वो झेपंती सी इक लड़की थाम के फूल […]

कविता

खारे होने का सुख

मैं दुखता नासुर हूँ मित्र रिसती दरारों को न और चटका अब केवल दर्द सुंकु देता है मवादों के पोरो को दवा से न बहला विलाप में उफनता संगीत भी हूँ सिसकियों के उन्माद का भी आनंद उठा सर्द कुहासे की सघन यातना हुं जड़ होने़ से पहले का क्षण देख जा बांझ चट्टानों की […]

कहानी

कहानी : आगे एक जहां और भी होता है

बडे़ दिनो के बाद वो छत पर नजर आया था,  दिल जोर से धड़का पर मैने मुंह घुमा लिया । तभी मम्मी ने आवाज दी- अंजलि ! आई माँ..  ! चोरी चोरी एक बार और उधर देखा तो वो जा चुका था । मै भी नीचे उतर आयी । मन बार बार अतीत की तरफ […]