Monthly Archives: November 2016

  • ख़ाली कनस्तर

    ख़ाली कनस्तर

    गंगा अपने घर के हालातों से परेशान थी । उसका पति मज़दूरी करता था। पहले कमाई अच्छी होती थी सो गंगा घर में ही रहती थी । पर अब हालात बदल गए थे । एक वक़्त...

  • मिले

    मिले

    मेरी ख़ुशी का ग़म का जहाँ हिसाब मिले चले वहां जहाँ रिंदों को भी सवाब मिले मेरी नेकी ने बोहोत तोहमतें कमाईं है अब कुछ तो मेरी बदी को नया खिताब मिले क्यों आसमाँ को तकते...



  • मुक्तक : व्यर्थ

    मुक्तक : व्यर्थ

    व्यर्थ में व्यर्थ का, राग आप अलापते, व्यर्थ ही आग में, आप आहूति डालते। यज्ञ या चिता नही, ये दावानल प्रचंड है, व्यर्थ आपके बोल, जो हिय को सालते। — अ कीर्तिवर्धन

  • कहानी : कदली  के फूल

    कहानी : कदली के फूल

    वो खुद को बहुत संतुष्ट और एडवांस समझती ही नहीं,भाव-भंगिमा से व्यक्त भी करती रहती थीं ! अलका दी,सबसे बेबाक होकर मिलना,हर विषय पर एक्सपर्ट कमेन्ट देना और क्या मायका,क्या ससुराल यहाँ तक कि पडौसियों की...

  • लहर

    लहर

    तुम्हें लगा टूट कर बिखर जाँउगी जिसे थामने के लिए आगे बढ़ोगे तुम आत्मसंयमित स्वयं को सम्भाले हुए तुम्हारे ही सामने कितनी बार बिखरकर सम्भल गई लहर की तरह तुम जड़वंत खड़े रहे जानते थे मेरे...

  • मुरझाया फूल

    मुरझाया फूल

    सूखा मुरझाया फूल पुरानी किताब में मिला खुशबू न थी फूल में रंग भी बदल चुका था मेरी तरह बदले हुए से तुम भी सामने थे टी-वी में मशगूल पर मुझे याद था अब भी वो...

  • खारे होने का सुख

    खारे होने का सुख

    मैं दुखता नासुर हूँ मित्र रिसती दरारों को न और चटका अब केवल दर्द सुंकु देता है मवादों के पोरो को दवा से न बहला विलाप में उफनता संगीत भी हूँ सिसकियों के उन्माद का भी...