स्वामी श्रद्धानन्द बलिदान दिवस प्रो. डा. नवदीप कुमार के विद्वतापूर्ण व्याख्यान के साथ श्रद्धापूर्वक वातावरण में सम्पन्न

ओ३म्

आर्यसमाज धामावाला उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून की प्रमुख आर्यसमाज है जिसकी स्थापना महर्षि दयानन्द जी के करकमलों द्वारा हुई थी। स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती जी के नाना श्री कृपाराम जी इस समाज के प्रथम प्रधान रहे। अथर्ववेद, सामवेद भाष्यकार एवं अनेक प्रमुख वैदिक ग्रन्थों के रचयिता पं. विश्वनाथ विद्यालंकार जी इसी समाज से जीवन पर्यन्त जुड़े रहे। आचार्य बृहस्पति जी भी गुरुकुल वृन्दावन के आचार्य व कुलपति रहे और इसी आर्यसमाज से जुड़े रहे। उनके दर्शन करने, उपदेश सुनने व महाविद्यालय में धर्म व संस्कृति पर उनका लेक्चर सुनने का भी हमें अवसर व सौभाग्य प्राप्त हुआ है। पं. प्रकाशवीर शास्त्री, स्वामी सत्य प्रकाश सरस्वती, डा. भवानी लाल भारतीय, शास्त्रार्थ महारथी ओम्प्रकाश शास्त्री, खतौली, स्वामी रामेश्वरानन्द सरस्वती, डात्र रघुवीर वेदालंकार, आचार्य विद्याादेव, डा. महावीर जी, आचार्य सत्यव्रत राजेश, डा. दिनेश कुमार शास्त्री, प्रा. अनूप सिंह, श्री धर्मेन्द्र सिह आर्य आदि अनेक विद्वानों को इस समाज में समय समय पर सुनने का अवसर भी हमें प्राप्त हुआ है। सन् 1994-95 में लगभग 15 महीनों तक आर्यसमाज के सत्संगों का संचालन करने का अवसर भी हमें मिला। सन् 1970 में हम अपने एक आर्यसमाजी मित्र श्री धर्मपाल सिंह की प्रेरणा से इस समाज के सदस्य बने थे। आज इसी आर्यसमाज ने स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी का बलिदान दिवस समारोह ‘श्री स्वामी श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम’ में आयोजित किया। हमें भी निमंत्रण मिला तो हम भी इस आयोजन में पहुंच गये।

आज का आयोजन यज्ञ, भजन व गीतों से आरम्भ हुआ। आश्रम की कन्याओं व बालकों ने भजन गाये। इस अवसर पर आर्य भजनोपदेशक श्री धर्मसिंह जी भी पधारे हुए थे, उनके भी भजन हुए। मुख्य प्रवचन देहरादून के डी.ए.वी. महाविद्यालय के राजनीति विभाग के विभागाध्यक्ष व प्रोफेसर रहे डा. नवदीप कुमार जी का हुआ। अपने सम्बोधन में डा. नवदीप कुमार जी ने स्वामी श्रद्धानन्द जी द्वारा हरिद्वार में कांगड़ी ग्राम में गुरुकुल की स्थापना की पृष्ठभूमि व उसके स्वर्णिम इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वामी श्रद्धानन्द जी ने गुरुकुल खोलने के लिए आठ हजार रूपये का धनसंग्रह का लक्ष्य रखा था। इसके लिए उन्होंने भिक्षा व दान मांग कर धन संग्रह किया। स्वामी जी जहां भी जाते और लोगों को उपदेश कर अपनी गुरुकुल स्थापना की योजना बताते तो लोग उनका स्वागत करते और सहयोग करते थे। इस प्रकार 7 महीनों में लक्ष्य से कहीं अधिक तीस हजार रूपये की धनराशि आपके द्वारा एकत्रित कर ली गई। इसके बाद स्वामीजी बिजनौर के एक भूपति चौधरी अमन सिंह जी से मिले और उन्हें अपनी गुरुकुल की योजना से परिचित कराया। वह तत्काल अपने दो गांव स्वामी जी को देने के लिए तैयार हो गये। उनका एक गांव तो कांगड़ी था और दूसरा उसका निकटवर्ती था। स्वामी जी इन गांवों व इसकी समस्त भूमि आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब के नाम पर पंजीकृत करा दी। गुरुकुल में किन बच्चों को प्रविष्ट किया जाये तो इसके लिए आपने पहले अपने दो पुत्रों हरिश व इन्द्र को चुना और उन्हें प्रविष्ट किया। डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि स्वामी श्रद्धानन्द जी ने स्वामी दयानन्द जी के संकल्पों के अनुरुप गुरुकुल खोला। विद्वान वक्ता ने कहा कि वैदिक मान्यता के अनुसार बच्चे सभी शूद्र होते हैं। संस्कार से ही वह द्विज बनते हैं। उन्होंने कहा कि गुरुकुल का वातावरण ऐसा था कि किसी बच्चे को उसकी जन्मना जाति का पता नहीं होता था और न ही किसी को उसका प्रयोग करने की छूट थी। बच्चों का वर्ण शिक्षा की समाप्ती पर निर्धारित किये जाने की प्रथा हमारे देश में रही है। यह हमारे देश की प्रोचीन परम्परा थी।

डा. नवदीप कुमार ने अपने सम्बोधन में गांधी जी की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि जब गांधी जी अफ्रीका में आन्दोलन कर रहे थे तब स्वामी श्रद्धानन्द और उनके शिष्यों ने मजदूरी करके धन इकट्ठा किया और एकत्रित बड़ी धनराशि गांधी जी को अफ्रीका भेजी थी। विद्वान वक्ता ने कहा कि उन दिनों सप्त सरोवर’ के पास एक विद्युत उत्पादन परियोजना और सिंचाई के लिए एक डाम बन रहा था। गांधी जी के लिए धन संग्रह का कार्य महात्मा मुंशीराम और उनके सभी शिष्यों ने मजदूरी करके किया। उन दिनों उन्होंने मजदूरी करके 1500 रूपये एकत्र किये जो आज के हिसाब से बहुत बड़ी राशि थी। आजादी के बहुत बड़े नेता गोपाल कृष्ण गोखले ने जब स्वामी श्रद्धानन्द और उनके ब्रह्मचारी शिष्यों द्वारा मजदूरी करके धन संग्रह की बात सुनी तो उनकी आंखों से आंसू टपकने लगे थे। डा. नवदीप जी ने कहा कि गांधी जी को जब यह धनराशि मिली तो उन्होंने उसी दिन स्वामी श्रद्धानन्द जी को धन्यवाद का पत्र लिखा था। डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि गांधी जी ने अपने बड़े पुत्र देवदास को भी गुरुकुल में भर्ती किया था, ऐसा उन्होने पढ़ा है। गुरुकुल की शिक्षा अपने उद्देश्य में सफल रही। यहां वेदों के बड़े बड़े विद्वान व स्वतन्त्रता सेनानी उत्पन्न हुए। उन्होंने बताया कि रैम्जे मैकडानल गुरुकुल में आये थे और स्वामी जी के आचरण और विचारों से बहुत प्रभावित हुए थे। उनके साथ उत्तर प्रदेश के गवर्नर मेस्टन भी आये थे। इन अंग्रेजों ने सुना था कि गुरुकुल में अंग्रेजों के विरुद्ध बम बनाये जाते थे। इन अधिकारियों का गुरुकुल आना इन आरोपों की जांच करना था। उन्होंने कहा कि यहां पढ़ने वाले बच्चे उन दिनों बड़े बड़े विद्वान बने और उन्होने सच्चा ज्ञान प्राप्त किया। डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि जब स्वामी जी ने संन्यास लिया तो वह महात्मा मुंशीराम से स्वामी श्रद्धानन्द बन गये, उन्होंने गुरुकुल छोड़ दिया और अपने जीवन की भावी नई भूमिका आरम्भ करने दिल्ली आ गये।

दिल्ली में स्वामी जी सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान बनाये गये। स्वामी श्रद्धानन्द जी का प्रयास था देश के सभी लोग गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार आर्य हो जायें, कोई अनार्य न रहे। स्वामी जी ने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आर्य समाज के संगठन को मजबूत बनाने का कार्य किया और इसके लिए घोर पुरुषार्थ किया। डा. नवदीप कुमार जी ने बताया कि उनके समय में आर्यसमाज को अंग्रेजों द्वारा एक क्रान्तिकारी वा आतंकवादी संस्था माना जाता था। उन्होंने कहा कि स्वामी श्रद्धानन्द जी को गांधी जी का सत्य व अंहिसा का मार्ग पसन्द आया। विद्वान वक्ता ने सन् 1918 में आये अकाल व अन्न संकट की भी चर्चा की। ऐसी विकट अवस्था आने पर स्वामी जी व उनके सहयोगियों ने अपने जीवन को तपा कर अकाल पीड़ितों की रक्षा, सेवा व सहायता की। उन्होंने ऐसा इस लिये किया कि वह सच्चे मानव थे और सबको मानव मानते थे। उन्होंने यह श्रेष्ठ कार्य आजकल की तरह किसी प्रकार के वोट बैंक व अन्य किसी प्रलोभन के लिए नहीं किया था। डा. नवदीप जी ने सन् 1919 में रालेट एक्ट बनाये जाने की चर्चा की जिसका अर्थ था कि बिना आरोप, बिना वकील व दलील सुने लम्बे समय के लिए किसी भी देश भक्त को जेल की यातना देना। इस रालेट एक्ट के विरोध में देश भर में सत्याग्रह करने का निर्णय लिया गया। 30 मार्च सन् 1919 को देश भर में हड़ताल की गई। दिल्ली में आन्दोलन को सफल बनाने का दायित्व स्वामी श्रद्धानन्द जी को दिया गया। 20 मार्च सन् 1919 को दिल्ली में रालेट एक्ट के विरोध में जो हड़ताल हुई वह अभूतपूर्व अर्थात् भूतो भविष्यति’ की उक्ति को चरितार्थ करने वाली थी। इस दिन दिल्ली में सड़को पर सारा यातायात रुक गया था। केवल सत्याग्रही वा आन्दोलनकारी जनता ही सड़को पर दिखाई दे रही थी। एक रेल कान्टीन खुली थी जहां आन्दोलनकारी पहुंचे और उसे बन्द कराने का प्रयास किया। इस विवाद में पुलिस ने गोलियां चला दीं जिसके परिणामस्वरूप कई हिन्दू व मुसलमान मारे गये। स्वामी जी ने वहां पहुंच कर हिंसक घटनाओं पर नियन्त्रण किया। वहां से वह चालीस हजार सत्याग्रहियों का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़ते हैं। चांदनी चैक के  पास गोरों की पुलिस ने उन्हें रोका। सैनिकों की बन्दुकें स्वामी जी पर तन गई। अंग्रेजों का वफादार एक गोरखा सैनिक चिल्लाया कि यदि एक कदम भी आगे बढ़ाया तो वह बन्दूक की संगीन स्वामी जी के सीने में घोंप देगा और उन्हें गोली मार देगा। डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि उस दिन स्वामी श्रद्धानन्द जी का बलिदान हो जाता। उनके बचने की कोई सम्भावना नहीं थी। दैवयोग व संयोग ही स्वामी जी उस दिन बचे। नवदीप जी ने कहा कि स्वामी जी और आगे बढ़े। स्वामी जी में ब्रह्मचर्य और योग का तेज और बल था। आगे बढ़कर अपनी छाती खोलकर वह सैनिको को ललकारते हुए बोले मारो गोली’। एक अंग्रेज अधिकारी अचानक वहां आ गया और उसने सैनिकों को पीछे हटने को कहा। इस प्रकार स्वामी जी का जीवन बच सका।

दिल्ली की इस घटना ने स्वामी जी को वहां का बेताज बादशाह बना दिया। दिल्ली के डा. अंसारी और हकीम अजमल खां स्वामी जी के मित्र थे। उन्होंने स्वामी जी को जामा मस्जिद में आकर लोगों को सम्बोधित करने का अनुरोध किया। स्वामी जी को सम्मान के साथ मस्जिद के मिम्बर जहां से मौलवी द्वारा नमाज पढ़ाई जाती है, ले जाया गया। स्वामी जी ने मिम्बर पर बैठकर मुस्लिम धर्म के बन्धुओं को सम्बोधित करते हुए पहले वेद मन्त्र ओ३म् त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता क्रतो बभूविथः। अघा ते सुम्नीमहे।।’ का उच्चारण किया। उन्होंने वहां एक घंटे तक अपना व्याख्यान दिया। जनता दत्त चित्त होकर उनका व्याख्यान वा उपदेश सुनती रही। विद्वान वक्ता ने कहा कि संसार के इतिहास की यह पहली घटना है जब कि जब किसी गैर मुसलमान ने जामा मस्जिद के मिम्बर पर से नमाजी मुस्लिम भाईयों को सम्बोधित किया था और वहां उपस्थित सभी मुस्लिम बन्धुओं ने स्वामी जी के एक एक शब्द को पूर्ण सम्मान के साथ सुना था। शान्ति पाठ के मन्त्र से स्वामी श्रद्धानन्द जी ने अपने वक्तव्य को विराम दिया। डा. नवदीप कुमार जी ने इस घटना को इतिहास की एक आश्चर्यजनक घटना बताया।

डा. नवदीप कुमार जी ने आगे कहा कि 13 अप्रैल, 1919 को अंग्रेजों ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों का नरसंहार किया जिसमें 1500 से अधिक लोग मारे गये और 1200 से अधिक लोग घायल हुए थे। अंग्रेजों ने वहां मार्शल ला लागू कर दिया था जो कि आतंक की स्थिति थी। लोग 100 मीटर दूरी तक अपने घरों में सड़कों पर रेंग कर जा सकते थे। इस नरसंहार के विरोध में कांगे्रस ने अमृतसर में अपना आगामी अधिवेशन करने का निर्णय किया। कांगेस के सामने समस्या थी कि अधिवेशन का कार्यभार किसको दिया जाये। स्वामी श्रद्धानन्द जी के नाम का प्रस्ताव हुआ। गांधी जी के मनाने पर स्वामी श्रद्धानन्द जी अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष का भार वहन करने के लिए तैयार हुए। स्वामी जी ने अपना स्वागत भाषण प्रथम वार हिन्दी में पढ़कर एक इतिहास की रचना की। अधिवेशन से चार-पांच दिन पहले अमृतसर में भारी वर्षा से सारा नगर पानी पानी अर्थात् जलमग्न हो रहा था। कांग्रेस के बड़े नेताओं ने अधिवेशन को स्थगित करने की बातें की परन्तु स्वामी श्रद्धानन्द ने कहा कि अधिवेशन निर्धारित तिथियों में ही होगा। स्वामी जी ने अमृतसर की जनता से अपील की कि वह अधिवेशन के प्रतिनिधियों को अपने घरों पर भारतीय अतिथि परम्परा के अनुसार ठहराये वा उनका आतिथ्य करे। एक परिवार से कम से कम एक प्रतिनिधि को ठहराने की अपील की गई। इस प्रयास ने सभी प्रतिनिधियों के भोजन व निवास की व्यवस्था की समस्या का उत्तम हल निकाला। विद्वान वक्ता डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि स्वामी श्रद्धानन्द जी प्रेम व श्रद्धा के भण्डार थे। प्रत्येक व्यक्ति उनके आह्वान पर उनके आदेशों का पालन करने के लिए सहर्ष तैयार हो जाता था।

डा. नवदीप कुमार ने 5 फरवरी, 1922 को चौराचौरी काण्ड की भी विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि पुलिस ने वहां निहत्थे व शान्तिपूर्ण सत्याग्रहियों पर गोलियां बरसाईं। सत्याग्रही अपनी मशालें लेकर अंग्रेजों की पुलिस पर दौड़े। पुलिस के लोग थाने में घुस गये। सत्याग्रहियों ने पुलिस थाने में आग लगा दी जिससे 26 पुलिस वाले मर गये। गांधी जी ने बिना किसी से सलाह किए आन्दोलन बन्द करने की घोषणा कर दी। विद्वान वक्ता ने कहा कि 6 फरवरी 1922 से नो टैक्स आन्दोलन होना था। उन्होंने कहा कि देश सन् 1922 में ही आजाद हो जाता यदि गांधी जी आन्दोलन बन्द न करते। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने गांधी को कहा कि आप गलत कर रहे हो। गांधी जी जिद्दी स्वभाव के मनुष्य थे। लाला लाजपतराय, मोतीलाल नेहरू और सी. आर. दास आदि अनेक नेताओं की अपीलें भी गांधी ने ठुकरा दी। डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि गांधी जी ने कुछ समय बाद कांग्रेस के मंच से अछूतोद्धार की चर्चा की। इस कारण स्वामी श्रद्धानन्द जी उनके निकट आये। विद्वान वक्ता ने कहा कि गुरुकुल में अछूत शब्द का कहीं प्रयोग व प्रचलन नहीं था। वहां कोई अछूत व दलित नहीं था अपितु सब समान थे। गुरुकुल में कोई अपनी व दूसरे की जाति नहीं जानता था। आर्यसमाज ने अछूत शब्द को बदलकर दलित शब्द का प्रयोग किया और उनके उत्थान के कार्य को दलितोद्धार की संज्ञा दी। गांधी जी ने दलितोद्धार काम के लिए कांग्रेस द्वारा पैसे की व्यवस्था करने की मांग पर पीछे हट गये। इस कारण स्वामी श्रद्धानन्द जी के गांधी जी से मतभेद हो गये। उन्होंने बताया कि कालीकट में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। गांधी जी के अति निकट, विश्वसनीय व प्रिय व्यक्तियों सौकत अली और मुहम्मद अली की विद्वान वक्ता ने चर्चा की और कहा कि कांग्रेस के अध्यक्ष मुहम्मद अली ने अधिवेशन में प्रस्ताव किया था कि 7 लाख भारतीय दलितों को मुसलमानों और हिन्दुओं में आधा आधा बांट दिया जाये। कांगेस में इसका विरोध करने वाला कोई नहीं था, शायद गांधी जी भी नहीं। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि दलित कोई गाजर व मूली नहीं अपितु हमारे भाई हैं। कोई ताकत दलितों को हमसे अलग नहीं कर सकती।

आर्य विद्वान एवं नेता डा. नवदीप कुमार जी ने बताया कि सन् 1924-25 में स्वामी जी ने दािलतोद्धार और शुद्धि के कामों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। स्वामी जी इस कार्य के कारण देश के सर्वमान्य नेता बन गये। आपके प्रयासों से आगरा के निकट के मलकान राजपूत जो कलमा पढ़ाकर मुसलमान बनाये गये थे परन्तु रीति रिवाजों और आचरण से हिन्दू थे, उनकी शुद्धि कर हजारों व लाखों को पुनः आर्यधर्म में दीक्षित किया। अपने वक्तव्य को आगे बढ़ाते हुए विद्वान वक्ता ने कहा कि 25 मार्च सन् 1926 को दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर एक मुस्लिम महिला असगरी बेगम तीन बच्चों के साथ उतरी। वह लोगों से पूछते हुए स्वामी श्रद्धानन्द जी के पास आयी और अपने दुःख बताकर उसने स्वेच्छा से हिन्दू वा आर्यधर्म स्वीकार करने की प्रार्थना की। उसने स्वामी जी से उसका शुद्धि संस्कार कराने की प्रार्थना की। स्वामी जी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर उसे व उसके बच्चों को आर्यसमाज दीवान हाल में शुद्ध किया। असगरी बेगम का नाम शान्ति देवी और बच्चों के नाम धर्मपाल और अर्जुन आदि रखे गये। उसे दिल्ली के वनिता आश्रम में रखा गया। उसने स्वामी जी बताया कि उसके दुश्मन बहुत हैं। उसने स्वामी जी को उसका पिता बनने की प्रार्थना की जिसे स्वीकार कर स्वामी जी उसके पिता बन गये। कुछ ही समय बाद वहां शान्तिदेवी के पिता और पति आ गये। शान्तिदेवी ने अपने पिता व पति का मुस्लिम धर्म में वापिस जाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया। समाचार पत्रों ने इस घटना को राजनैतिक व साम्प्रदायिक स्वरूप देकर मुसलमानों को खूब भड़काया। पत्रों में स्वामी जी और आर्यसमाज पर मुकदमा चलाने की बातें होने लगी। अखबारों के दुष्प्रचार व ऐसे अन्य कारणों से स्वामी जी और आर्यसमाज के विरुद्ध ईष्र्या की अग्नि फैलाई गई जिससे कुछ लोग भड़क गये जिनमें से एक युवक अब्दुल रसीद भी था। विद्वान वक्ता ने कहा कि आज भी कुछ लोगों द्वारा भड़काने व जन्नत का सब्जबाग दिखा कर ही आतंकवादी बनाये जाते हैं। उन्होंने कहा कि अब्दुल रशीद भी भड़काने व जन्नत का लालच देने से स्वामी जी की हत्या करने के लिए तैयार हुआ था।

डा. नवदीप कुमार ने बताया कि स्वामी जी को उन्हीं दिनों वाराणसी प्रचार के लिए जाना पड़ा। वह एक दिन में चार चार जगहों पर लैक्चर देते थे। दिसम्बर, 1926 के महीने में बहुत ठण्ड पड़ रही थी। वृद्ध शरीर था जिस कारण स्वामी जी को ठण्ड लग गई और उन्हें निमोनिया हो गया। स्वामी जी रूग्णावस्था में ही दिल्ली आये, इलाज कराया और ठीक होने लगे। इन्हीं दिनों स्वामी जी को गुवाहटी जाना था। इसी बीच इन्द्रप्रस्थ गुरुकुल के लोग आये और आग्रह कर उन्हें तीव्र बुखार की स्थिति में ही 8 दिसम्बर 1926 को अपने साथ इन्द्रप्रस्थ ले गये। स्वामी जी को दवा व आराम की जरूरत थी परन्तु वह ठण्ड के मौसम में बुखार होते हुए भी काम कर रहे थे। उनका रोग बिगड़ गया और उसने विकराल रूप ले लिया। स्वामी जी को इन्द्रप्रस्थ से दिल्ली 12 किमी. आने में 12 घंटे लगे। कमरतोड़ बुखार ने उन्हें अपने शिकंजे में कस लिया था। डा. अंसारी उनका इलाज करने लगे और उन्हें ठीक हो जाने का आश्वासन देते थे। उनके इलाज से धीरे धीरे वह ठीक होने लगे। उनके एक अन्य चिकित्सक डा. सुखदेव जी ने कहा कि वह उन्हें दो दिनों में ठीक कर देंगे और स्वामी जी रोटी खाने लगेंगे। स्वामी जी से मिलने उनकी हत्या के दिन शुद्धि सभा के सचिव स्वामी चिदानन्द भी आये थे। स्वामी जी ने उन्हें कहा था कि मेरा स्वास्थ्य मेरा साथ छोड़ चुका है। स्वामी जी ने उन्हें कहा कि शुद्धि का कामरूकना रूकना चाहिये। हत्या वाले दिन स्वामी जी ने अपने पुत्र इन्द्र को बुलाकर कहा कि वह आर्यसमाज का इतिहास लिखना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने सामग्री का संचय व संग्रह भी किया था। उसका उपयोग कर आर्यसमाज का इतिहास अवश्य लिख देना। यह काम छूटना नहीं चाहिये। डा. नवदीप जी ने कहा कि अब्दुल रशीद द्वारा उन्हें धोखे से गोली मारने से एक घटां पहले उन्होंने उस दिन आये सभी मेहमानों को विदा कर दिया था। केवल धर्मपाल जी ही उनके पास थे। स्वामी जी ऊपर कक्ष में थे। नीचे कोई उनसे मिलने आया। बताया कि वह मुसलमान है और स्वामी जी से मिलना चाहता है। स्वामी जी ने उनकी बातें सुन ली और बोले कि उस व्यक्ति को आने दो। वह व्यक्ति अब्दुल रशीद था जो हत्या करने के उद्देश्य से आया था। वह स्वामी जी के पास आया और बोला कि उसे उनसे कुछ पूछना है? स्वामी जी ने बताया कि वह रूग्ण हैं, अभी बात नहीं कर सकेंगे। ठीक हो जाने पर आना, तब आपसे बातें करूंगा। इसके बाद हत्यारे ने पानी मांगा। स्वामी जी ने उसे पानी देने को कहा। पानी पीकर उसने अवसर देख कर अपनी पिस्तौल निकाल कर स्वामीजी पर पांच गोलियां दागी। तीन गोलियां स्वामी जी के सीने के पार हो गयीं। धर्मपाल ने उस हत्यारे अब्दुल रशीद को कस कर पकड़ लिया। वह हत्यारा तड़फता रहा परन्तु स्वयं को धर्मपाल से छुड़ा नहीं सका। बाद में पुलिस आने पर उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया। इस प्रकार देश, धर्म, धर्म रक्षा व वैदिक संस्कृति के लिए स्वामी श्रद्धानन्द जी ने अपने प्राण देकर हुतात्माओं में सम्मिलित होकर अमर पद को प्राप्त किया।

आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के ऋषि भक्त प्रधान श्री महेश कुमार शर्मा जी ने स्वामी श्रद्धानन्द जी की आत्मकथा कल्याण मार्ग के पथिक का उल्लेख कर उसके शेष भाग की भी जानकारी दी और कहा कि उन्होंने आगे के 8 वर्षों के जीवन की आत्मकथा आर्यसमाज बच्छोवाली में बैठकर लिखी थी। इसके बाद का भाग भी आपने लिखा था जो ‘‘सद्धर्म प्रचारक” पत्र में प्रकाशित किया जाता रहा। सम्भवतः इसका शीर्षक आप बीती जग बीती’ था। इसके प्रकाशन के लिए स्वामीजी ने अपने सहयोगी बाबू शिव प्रसाद जी को प्रकाशित करने का अनुरोध किया था। प्रधान श्री महेश कुमार शर्मा जी ने बताया कि उनके जीवन की सभी प्रमुख घटनायें उनके यशस्वी सुपुत्र इन्द्र जी ने मेरे पिता’ नाम से पुस्तक लिख कर प्रकाशित कीं जो सम्प्रति उपलब्ध है। श्री शर्मा जी ने विद्वान वक्ता डा. नवदीप कुमार जी की प्रशंसा की और उनका धन्यवाद किया। आर्यसमाज के पुरोहित जी द्वारा शान्तिपाठ कराया गया। कार्यक्रम के समापन पर जलपान हुआ। आयोजन में बड़ी संख्या में स्त्री, पुरुष एवं श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बच्चे सम्मिलित थे। कार्यक्रम सफल रहा जिसके लिए आर्यसमाज के प्रधान व मंत्री जी बधाई के पात्र हैं। कार्यक्रम समाप्ती पर हमारी डा. नवदीप जी से बातचीत हुई। आपने बताया कि समयाभाव के कारण बहुत सी बातें अपने वक्तव्य में प्रस्तुत नहीं कर पाये जिसमें पटियाला केस का उल्लेख भी था। डा. नवदीप जी हमारे विगत 25 से अधिक वर्षों से परिचित एवं मित्र हैं। आपने ऋषि जीवन पर एक शोधपूर्ण पुस्तक ऋषि दयानन्द और उनके पांच क्रान्तिधर्मी शिष्य’ लिखी है जिसे हमने पढ़ा है। इसे प्रकाशन हेतु डा. ज्वलन्त कुमार शास्त्री जी को दिया गया है। यदि इसका प्रकाशन हो जाये तो यह ऋषि भक्तों के लिए ऋषि जीवन पर उत्तम सामग्री होगी।

मनमोहन कुमार आर्य

परिचय - मनमोहन कुमार आर्य

नाम मन मोहन कुमार आर्य है. आयु ६३ वर्ष तथा देहरादून का निवासी हूँ। विगत ४५ वर्षों से वेद एवं वैदिक साहित्य सहित महर्षि दयानंद एवं आर्य समाज के साहित्य के स्वाध्याय में रूचि है। कुछ समय बाद लिखना आरम्भ किया था। यह क्रम चल रहा है। ईश्वर की मुझ पर अकथनीय कृपा है।