गीत/नवगीत

साक्षरता बारहमासा जनवरी (नव वर्ष दिवस)

नए साल में भगवन हमको, नया-नया गुण देना                                                        745/9.7.95 और तू जो कुछ देना चाहे, साक्षरता भी देना-   1.सबसे पहले सुमति देना दोष-बुराई सब हर लेना लिखने […]

गीत/नवगीत

अगस्त क्रांति के बलिदानी

अगस्त क्रांति के बलिदानी को, शत-शत कोटि प्रणाम स्वतंत्रता के अभिमानी को, शत-शत कोटि प्रणाम हमारा शत-शत कोटि प्रणाम-   1.स्वतंत्रता के सपनों को था, वीरों ने साकार किया अंग्रेजों भारत छोड़ो का, गगन में था गुंजार किया देश प्रेम के अभिमानी को, शत-शत कोटि प्रणाम हमारा शत-शत कोटि प्रणाम-   2.’करो या मरो’ कहकर […]

कविता

नारे ही नारे (योग)

1. योग को भलीभांति अपनाओ, तन-मन-प्राण को स्वस्थ बनाओ.     2.ध्यान से साधो श्वास-प्रश्वास, योग जगाए दृढ़ विश्वास.     3.ध्यान-धारणा-धैर्य जगाओ, योग से सहनशीलता पाओ.     4.आसन लगाओ, करो व्यायाम, सबसे उत्तम प्राणायाम.     5.बुद्धि-प्राण-तन करें विकास, योग से मन को मिले उजास.     6.सत्य-अहिंसा-शील बढ़ाए, आत्म-सुरक्षा योग सिखाए.   […]

गीत/नवगीत

एक गीत

आज मन कुछ क्षुब्ध सा है। * बसंती पागल हवा ये, नहा के परिमल मे आई। लाल सेमल हो गये, बौरा गई है आमराई । * आँख नम है, आँख मेँ टूटा कोई सपना धँसा है । आज मन…………………………… चाहता है मन दिवाना , चूम लूँ आकाश उड़कर। हवाओं को अंक भर लूँ, चमक लूँ […]

कहानी

कहानी – अंततः

मृणाल जल्दी- जल्दी काम निबटा रही थी। बेटी के खराब स्वास्थ्य को देखकर उसका मन बहुत अशांत था। अवनि की छुट्टियाँ समाप्त हो रही थीं चार दिन बाद उसे वापस पुणे लौटना था। वहाँ चली जाएगी तो कौन उसका ध्यान रखेगा। इस वक़्त शहर में डेंगू का प्रकोप था और पूरी सावधानी के बावजूद भी […]

हास्य व्यंग्य

शराफ़त

            शराफत से ही कोई शरीफ बनता है। शराफ़त अकसर चादर या फिर चोंगे की शक्ल में होता है। जब तब आदमी इसे ओढ़ या पहनकर शरीफ बन जाता है। मतलब किसी आदमी के लिए शराफ़त एक कामन फैक्टर की तरह भी होता है, जिसे ओढ़ा या दसाया जा सकता […]

मुक्तक/दोहा

“दोहे”

कैसे तुझे जतन करूँ, पुष्प पराग नहाय अपने पथ नवयौवना, महक बसंत बुलाय॥-1 रंग,रंग पर चढ़ गया, दिखे न दूजा रंग अंग अंग रंगीनियाँ, फरकत अंग प्रत्यंग॥-2 ऋतु बहार ले आ गई, पड़त न सीधे पाँव कदली इतराती रही, बैठे पुलकित छाँव॥-3 महुआ कुच दिखने लगे, बौर गए हैं आम मेरे कागा बोल ना, सुबह […]

गीतिका/ग़ज़ल

एक ज़माना बीत गया…

दिल में दिल का दर्द दबाये एक ज़माना बीत गया मेरे होठों को मुस्काये एक ज़माना बीत गया आवाजें देती है मुझको यूँ तो ये सारी दुनिया अपनों को आवाज लगाये एक ज़माना बीत गया दुनिया और जहां की बातें पल पल हमने की लेकिन मन को मन की बात बताये एक ज़माना बीत गया […]

कविता पद्य साहित्य

महबूब के दर तक

रूखसार पर मुहब्बत का नूर ओठों पर इश्क सा तबस्सुम बहुत नज़ाकत से हौले हौले बढ रहे तेरे पाँव उल्फत के इन राहों पर लगता है ये रास्ते तेरे महबूब के दर तक जाते है अमित कु.अम्बष्ट ” आमिली “

राजनीति

देश गाँधी जी का है

यह ठीक है की इस देश का अतीत बड़ा गौरवशाली रहा है इसकी सीमाए असीम रही है इसका भोग करने के लिये देव दनुज दैत्य मनव मे कई बार संग्राम हुआ है लेकिन अब ए बाते बहुत पुरानी हो चुकी है और आज के कुतर्कवादियो मे इसका कोई मोल नही रह गया है / अब […]