बोधकथालघुकथा

मेहरबानी की मेहरबानी

आज वह सोने के पंख वाला हंस न रहकर, एक सामान्य हंस हो गया था. रह-रहकर उसे यह बात याद आ रही थी. सोने के पंख वाले हंस को अपने पिछले जन्म की बात याद थी. तब वह बचपन से ही अत्यंत मेधावी था. महल जैसे बड़े-से घर में उसकी पत्नि और तीन पुत्रियां थीं. कमाने वाला न रहने के कारण वे निर्धनता में जी रही थीं. मजबूरी में पत्नि और पुत्रियां मजदूरी करके बड़े कष्ट से जीवन बिता रही थीं. उसने सोचा, अगर वह उन्हें सोने का एक-एक पंख देता रहे, तो इससे वे सभी गुजारा कर सकेंगी. यह सोच वह उनके घर की दीवार पर जा बैठा. बेटियों के पूछने पर उसने अपना परिचय देते हुए उनको एक सोने का पंख दिया. बीच-बीच में भी वह आकर अपना पंख दिया करता, तो वे सब धनी हो गईं. एक दिन उसकी पूर्व पत्नि ने लालच के कारण बेटियों के मना करने पर भी उसके सारे पंख एक साथ नोच दिए. अब वह उड़ने से भी लाचार था. कुछ दिनों के बाद उसके पंख उगे, पर वे सोने के न होकर सामान्य थे. यह सब मेहरबानी की मेहरबानी थी.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244