उपन्यास अंश

आजादी भाग –३२

 

विनोद को घर आये हुए अभी थोड़े ही समय बीते थे । उसके बाबूजी और माताजी अपने कमरे में आराम फरमा रहे थे । विनोद के आने की आहट सुनकर तकिये में मुंह छिपाकर सिसक रही कल्पना ने जल्दी से अपने आंसू पोंछते हुए चेहरे पर जबरदस्ती मुस्कान लाने का प्रयत्न किया और कमरे से बाहर हॉल में चली आयी ।

विनोद ने उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया और पलंग पर गिरकर निढाल हो गया । उसका जी कर रहा था कि वह भी खूब रोये और अपना जी हल्का कर ले । हालाँकि कल्पना की मनोस्थिति से वह नावाकिफ नहीं था लेकिन वह उसे कुरेदना नहीं चाहता था ।

राहुल की सभी हरकतें उसे एक एक कर याद आ रही थीं । कई बातें याद कर वह मुस्करा उठता वहीँ कभी कभी उसे राहुल पर बेहद गुस्सा भी आता । अभी भी वह राहुल के घर छोड़कर जाने के उसके फैसले से बहुत ही खफा था लेकिन अब उसे राहुल पर गुस्सा नहीं बल्कि उसकी बहुत याद आ रही थी । दिन में कई दफा वह इश्वर से विनती कर लेता ‘ बस ! एक बार प्रभु मेरे बेटे को मुझसे वापस मिला दो । दुबारा उसे जीवन पर्यन्त नहीं डाटुंगा । ‘

पलंग पर लेटा विनोद राहुल की ही यादों में खोया हुआ था कि उसका मोबाइल बज उठा । अनमने मन से पलंग से उठकर उसने मोबाइल उठाया और स्क्रीन पर पुलिस स्टेशन का नंबर फ़्लैश होते देखकर उसका दिल जोरों से धड़क उठा । पल भर में ही उसके चेहरे पर कई रंग आये और गए । अगले ही पल दिल मजबूत कर उसने फोन रिसीव किया ।

उधर से आवाज आई ” हैल्लो ! विनोद जी हैं क्या ? मैं शिकारपुर पुलिस थाने से हेड कांस्टेबल पाण्डेय बोल रहा हूँ । ”
अब तक विनोद ने स्वयं पर काबू पा लिया था । संयत स्वर में बोला ” हाँ जी ! बोलिए ! विनोद ही बोल रहा हूँ ! ”
” अभी अभी रामपुर थाने से एक रपट आई है । रपट के मुताबिक वहाँ के एक विश्वस्त मुखबिर ने सुचना दी है कि रामनगर में बाबा भोलानंद आश्रम के आसपास दस अपहृत बच्चों की डिलीवरी होनेवाली है । संभवतः ये बच्चे कहीं बाहर से बाबा के आश्रम के सामने भीख मंगवाने के लिए लाये जा रहे हैं । खबर पक्की है । प्राप्त सुचना के आधार पर रामपुर पुलिस नाकाबंदी की तैयारी कर चुकी है । हमारे थाने से भी दो बच्चों की गुमशुदगी की रपट दर्ज है इसलिए हमारी भी टीम रामपुर जानेवाली है । अगर आप भी साथ चलें तो बच्चे को पहचानने में आसानी होगी । अगर हमारे साथ चलना चाहें तो आधा घंटे से पहले आपको थाने में आना होगा । देर करेंगे तो हमारी टीम निकल जाएगी । ठीक है ! कुछ और पूछना हो तो फोन करना ! ” दूसरी तरफ से पाण्डेय ने समझाया था और फोन रख दिया ।
विनोद ने  ” ठीक है साहब ! ” कहकर फोन रख दिया था ।
फोन की घंटी बजने की आवाज कल्पना ने भी सुनी थी । वह भागकर मोबाइल की तरफ ही बढ़ रही थी कि तभी विनोद ने फोन उठा लिया था । विनोद के फोन रखते ही कल्पना ने बेताबी से सवालों की झड़ी लगा दी ” किसका फोन था ? पुलिस का फोन था ? क्या कह रहे थे ? ”
कल्पना की व्यग्रता को महसूस कर के विनोद मुस्कुरा उठा था । उसकी मुस्कराहट ने कल्पना को बड़ी राहत प्रदान की । विनोद ने उसे बताया ” हाँ ! पुलिस का ही फोन था । मुझे तुरंत ही थाने में बुलाया है । रामनगर जाना है । इश्वर करें सूचना सही हो और हमारा बेटा हमें सही सलामत मिल जाये । ”
सुनते ही कल्पना के दोनों हाथ स्वतः ही जुड़ते चले गए ” हे भगवान ! तेरा लाख लाख शुक्र है ! बस अब हमें हमारे बेटे से मिला दे भगवन ! ”
फिर विनोद से मुखातिब होते हुए बोली ” जरा पांच मिनट रुक जाइये ! मैं भी आपके साथ चलूंगी । ”
विनोद ने कल्पना को दोनों कन्धों से पकड़ते हुए प्यार से समझाया ” मैं तो चाहूँगा कि तुम मेरे साथ न चलो । यहाँ से पुलिस की टीम रामनगर के लिए रवाना हो रही है और मुझे उनके साथ ही जाना है   वहां उनके साथ पता नहीं किस परिस्थिति में समय गुजरे । मैं किसी भी परिस्थिति का सामना कर लूँगा लेकिन तुम्हारे लिए थोड़ी मुश्किल हो सकती है । हाँ ! जैसे ही कोई नयी बात पता चलेगी मैं तुम्हें खबर कर दूंगा । राहुल से मुलाकात होते ही तुमसे उसकी बात करा दूंगा । ठीक है ! अच्छा ! अब मैं चलता हूँ । बाबूजी को अभी यह बात नहीं बताना । व्यर्थ में परेशान होंगे । उनको सीधे राहुल के आ जाने की खुशखबरी ही सुना देंगे । ठीक है । चलूँ ? ”
कल्पना ने बुझे मन से सहमति में अपना सिर हिला दिया था । और विनोद बिना एक पल गंवाए कमरे से बाहर निकल गया ।
हॉल में बाबूजी अधलेटे हुए आँखें बंद किये सोफे पर पड़े हुये थे ।
बिना कोई आहट किये विनोद ने अपने जूते हाथों में उठाया और घर से बाहर निकल गया । घर के सामने एक पेड़ के गिर्द बने चबूतरे पर बैठकर जूते पहन ही रहा था कि उसे सामने से माँ जी आती हुयी दिखीं ।
अब तो बचने का कोई रास्ता नहीं था । इससे पहले कि माँ जी उससे कुछ पूछती उसने स्वयं ही उन्हें आवाज लगायी ” माँ ! ये दोपहर में कहाँ गयी थीं ? धूप इतनी तेज है । आपको आराम करना चाहिए । ”
” अरे ! रहने दे ! तू मेरी इतनी फिकर न कर ! मैं अभी ठीक हूँ । तू ये बता तू कहाँ जा रहा है ये तैयार होकर ? ” माँ जी ने लापरवाही से जवाब देते हुए विनोद पर ही सवाल दाग दिया था ।
विनोद ने सही बात बताना मुनासिब नहीं समझा था सो बहाना बनाना ही उचित था । सफ़ेद झूठ बोलते हुए विनोद ने माँ जी को पट्टी पढ़ा दी ” वो क्या है न कि माँ मैं इतने दिनों से ऑफिस नहीं गया न ! तो बड़े साहब का फोन आया था कि आकर एक कागज़ लिख कर छुट्टी बढ़ाने की दरख्वास्त जमा करा दो । तो मैं बस ऑफिस गया और आया । आप घर में जाकर आराम करो माँ । मैं यूँ गया और यूँ आया ! ”
कहते हुए विनोद उठा और माँ के चरण स्पर्श कर मुख्य सड़क की तरफ बढ़ गया ।
विनोद जैसे ही पुलिस थाने पहुंचा उसे एक नायब दरोगा दो सिपाहियों के साथ बाहर निकलते दिखा । विनोद को देखते ही उसने शालीनता से पुछा ” आप विनोद जी हैं ? ”
हतप्रभ विनोद ने तत्परता से जवाब दिया ” जी ! जी हाँ ! ”
दरोगा जीप में बैठता हुआ बोला ” आप आ गए ! अच्छा हुआ । हम लोग आपका ही इंतजार कर रहे थे । आइये बैठ जाइये ! ”
और विनोद के जीप में बैठते ही जीप थाने के गेट से बाहर नीकली और मुख्य सड़क पर आकर रामनगर की तरफ फर्राटे भरने लगी ।

क्रमशः

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।

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