काला धन —– एक अनबूझ पहेली

जी हाँ ! मुझे काला धन को लेकर सभी तरह की चर्चाओं को सुनने और समझने के बाद यही महसूस हो रहा है कि यह एक अनबुझ पहेली है ।
हालाँकि इसके लिए पुख्ता दावों की भरमार है लेकिन ये दावे उन लोगों के मुखारबिंदु से ही निकले हैं जो बरसाती मेंढक की तरह अवसर देख कर ही टर्र टर्र करते हैं और हकीकत की धरातल से सामना होते ही अदृश्य भी हो जाते हैं ।
ऐसे ही कुछ दुर्लभ लोगों में से एक आदरणीय परमपूज्य श्री बाबा रामदेव जी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । 2012 से ही काले धन और मनमोहन सरकार के खिलाफ ताल ठोंककर मोर्चा संभालनेवाले बाबा रामदेव के पास उस समय उनके मुताबिक काले धन के रूप में विदेशों में जमा रकम लगभग चालीस लाख करोड़ से भी अधिक थी । और उन्हीं के मुताबिक यह रकम तो काफी कम है इससे नौ गुना ज्यादा काला धन देश के भीतर ही है ऐसा उनका दावा था ।
सरकारों के बदलते ही उनका अपने देश की जिम्मेदारियों के प्रति अपने कर्तव्य को विसर जाना स्वाभाविक ही था । इसकी एक खास वजह समझी जा सकती है । और सबसे खास वजह थी काले धन के बारे में इनके पास किसी तरह की कोई वास्तविक जानकारी का न होना । अनाप शनाप आंकड़े पेश करके बाबाजी ने मनमोहन सरकार से प्रतिशोध लेने के अपने मिशन को बखूबी अंजाम दिया और प्रतिशोध पुरा होते ही ख़ामोशी अख्तियार कर लिया क्योंकि अब उन्हें स्वयं अपने आंकड़ों की हकीकत जो पता थी । हाँ ! अलबत्ता उनके पेश किये गए आंकड़ों ने मनमोहन सरकार के खिलाफ जनमानस के मन में धधक रही अग्नि में घी डालने का ही काम किया ।

अब आते हैं उनके दावों और हकीकत पर ।

उनके मुताबिक विदेशी बैंकों में जमा राशी से नौ गुना अधिक काला धन हमारे देश में ही है । अब नोटबंदी ने इस पर से भी पर्दा हटा दिया है । दिसंबर के आखिर तक लगभग हजार पांच सौ के नोटों की शक्ल में जमा काला धन पुरी तरह से बैंकों में वापस जमा हो चुके हैं । इस दौरान लगभग तीन हजार करोड़ रुपये का काला धन विभिन्न छापेमारियों में पकडे गए हैं । जबकि लगभग चौदह लाख करोड़ रुपये पुरे देश में जमा हो चुके हैं । एक अनुमान के मुताबिक इस रकम में से भी कुछ संदिग्ध खातों की जांच शुरू है । ऐसा होगा तो नहीं फिर भी यह मान लेते हैं कि इन खातों में से सरकार को लगभग तीन हजार करोड़ की अघोषित आय का पता चल जाए । सितम्बर तक खुद ही घोषित काले धन की कुल रकम थी तीन हजार सात सौ सत्तर करोड़ रुपये ।  ये और बात है कि मोदीजी लाल किले की प्राचीर से पहले ही लगभग साढे छह हजार करोड़ रुपये काला धन जमा कराये जाने का ऐलान कर चुके थे । इस ऐलान के कुछ ही दिनों बाद जेटली जी ने ही मोदीजी के पेश किये आंकड़े का खंडन करते हुए 3770 करोड़ जमा होने का नया आंकड़ा पेश किया । अब इनमें से कौन सा सही है ये तो वही जानें हम तो बस आंकड़ों के बाजीगरी का ही विश्लेषण कर रहे हैं ।
अब इस तरह से पुरे नोट बंदी की कवायद से लगभग डेढ़ सौ प्राणों की आहुति तथाकथित देशभक्ति व काले धन के नाम पर देने के बाद देश को लगभग दस हजार करोड़ के काले धन को बरामद करने में सफलता मिली है यह वाकई कुछ लोगों के लिए गौरव का विषय हो सकता है लेकिन सभी के लिए नहीं ।
इसमें सबसे गौरतलब है कि इससे पूर्व की सरकारों द्वारा चलाये गए अघोषित आय जमा करने की मुहीम को कई गुना ज्यादा प्रतिसाद मिला था । मसलन 1975  में पहली बार इस तरह की स्कीम का काले धन वाले लोगों ने स्वागत किया था । उस समय रकम जमा हुयी थी लगभग 2220 करोड़ रुपये जो कि उस समय की अर्थव्यवस्था के लिहाज से काफी बड़ी रकम थी । 1997 में फिर से इसी तरह काला धन घोषित करने की योजना चलायी गयी थी जिसमें लगभग चालीस हजार करोड़ रुपये लोगों ने बैंकों में जमा कराये और 25 प्रतिशत के हिसाब से सरकार को कुल दस हजार करोड़ के राजस्व की आय हुयी ।
क्या यह विडंबना नहीं कि आज इतनी उठापटक व आरोप प्रत्यारोप के बावजूद इतना काला धन नहीं मिल सका है जितना कि सरकार को राजस्व की प्राप्ति हुयी थी 1997 में ।
अब मान लिया जाए कि लगभग दस हजार करोड़ रुपये का काला धन पकड़ा गया है या जमा कराया गया । इस से सरकार के खजाने में लगभग छह हजार करोड़ रुपये की वृद्धि होगी ।
अब पुनः आते हैं बाबा रामदेव जी के अनुमान पर । उनके अनुमान के मुताबिक देश में विदेशों की तुलना में नौ गुना अधिक काला धन है जो कि अब लगभग जाहिर हो चुका है लगभग दस हजार करोड़ रुपये ही है तो इस हिसाब से क्या विदेशों में जमा काला धन क्या मात्र लगभग एक हजार करोड़ रुपये ही हैं ?
नोट बंदी ने लगता है बाबाजी का पुरा गणित ही बिगाड़ दिया है और फ़िलहाल वो शायद इससे प्राप्त आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन कर रहे होंगे अपने आगे के वक्तव्यों में शामिल करने के लिए ।

उनकी ख़ामोशी का दुसरा एक और कारण भी हो सकता है । अन्य व्यवसायियों की तरह से शायद उन्हें भी नोट बंदी का असर अपने उत्पादों की विक्री पर पड़ता हुआ महसूस हुआ हो । वैसे जी न्यूज़ के एक कार्यक्रम में दिखाए गए हिसाब के अनुसार नोट बंदी से देश को लगभग एक सौ पैंतालिस लाख करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ है । अब अपने आकलन का आधार तो जी न्यूज़ ही बेहतर जानता होगा ।
बहरहाल सारी बातों पर गौर करके इतनी कवायद करने के बाद भी काला धन के नाम पर सरकार के हाथ खाली ही हैं और यही सबसे बड़ी अबूझ पहेली है जो किसी की समझ में नहीं आ रहा ….
कहाँ गया काला धन और कहाँ गए वो तथाकथित काला धन के खिलाफ अभियान चलानेवाले …?
इस सवाल पर नेता खामोश मीडिया खामोश समाजसेवी खामोश  !
फिलहाल तो सभी खामोश हैं !

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।