उपन्यास अंश

आजादी भाग –३४

टेम्पो में बैठा राहुल टेम्पो के बायीं तरफ के पतरे में बने छोटे से छेद से बाहर की परिस्थितियों का लगातार अवलोकन किये जा रहा था । अचानक गाड़ी की गति कम होने का अहसास करके उसके कान खड़े हो गए थे । और जैसे ही गाड़ी मुख्य सड़क छोड़कर ढाबे के सामने के उबड़ खाबड़ मैदान पर चलने लगी उसने स्वयं भी गाड़ी में लेटते हुए सभी बच्चों को भी सतर्कता से गाड़ी में लेट जाने का इशारा किया । इसके पीछे उसकी सोच यह थी कि यदि गुंडों ने उन्हें देखने या उनका हाल चाल लेना चाहा तो उन्हें सभी उनकी उम्मीद के मुताबिक ही बेहोश दिखने चाहिए । ये और बात है कि मुनीर ने उनकी तरफ ध्यान देने की कोई जरुरत नहीं समझी थी और लापरवाही से कमाल के पीछे ढाबे की तरफ बढ़ गया ।
राहुल बड़ी बारीकी से हर आहट पर ध्यान दे रहा था । कुछ ही मिनटों में उसे जब यह यकिन हो गया कि अब गाड़ी के आसपास कोई नहीं है तो वह उठ बैठा । राहुल ने टेम्पो में बने छेद से बाहर झांक कर देखा । संयोग से गाडी सड़क के सामानांतर दिशा में ही खड़ी थी । लिहाजा राहुल को उस छोटे से छेद से राम भरोसे ढाबा अच्छी तरह दिख रहा था । ढाबे के सामने बिछी खाटों में से एक पर कलाम पसरा हुआ था जबकि मुनीर उसके पास की दुसरी खाट पर बैठा हुआ था । दोनों को शायद चाय का इंतजार था । राहुल ने एक पल कुछ सोचा और फिर कुछ फैसला कर लेने के अंदाज में चुटकी बजाते हुए बोल पड़ा ” हाँ यही सही मौका है । हमें अब अपनी योजना को अंजाम दे देना चाहिए ।”  इरादा पक्का करते हुए राहुल ने सभी बच्चों को उठने का इशारा किया और पीछे लदे गत्ते के खोखों को अपनी तरफ खिंच लिया । चूँकि खोखे वजनदार नहीं थे राहुल के थोड़ी सी कोशिश से ही सभी खोखे गाड़ी में ही अन्दर की तरफ लुढ़क गए ।
खोखों के नीचे लुढ़कते ही टेम्पो से बाहर निकलने का रास्ता साफ़ हो चुका था । पीछे बंधी हुयी रस्सी के बीच फासले का फायदा उठाते हुए सबसे पहले राहुल ने एक पैर बाहर निकाला और अगले ही पल कुद कर उसने टेम्पो से निचे छलांग लगा दिया । उसके  पीछे पीछे ही मनोज भी उसका अनुसरण करते हुए बाहर आ गया । नीचे उतरते हुए दोनों ने बायीं तरफ कूदने से परहेज करते हुए अपने आपको दायीं तरफ ही छिपाए रखा । अगले ही पल दोनों ने गाड़ी में मौजूद दूसरे बच्चों को बाहर उतरने में मदद करना शुरू कर दिया ।

कुछ ही मिनटों में सभी बच्चे टेम्पो से बाहर आ चुके थे सिवाय बंटी के । राहुल टेम्पो में से उतर रहे बंटी के हाथों को थामे उसे नीचे उतरने में मदद कर रहा था । अभी बंटी गाड़ी में से नीचे कूदने ही वाला था कि एक पुलिस जीप तेजी से टेम्पो के पीछे आकर रुकी । पुलिस की जीप देखते ही सभी बच्चे हडबडा गए । राहुल द्वारा समझाये गए सभी बातों को नजरअंदाज करके बच्चे पुलिस से बचने के लिए विपरीत दिशा में भाग खड़े हुए । जबकि बंटी नीचे उतरते ही पुलिस की गिरफ्त में आ गया । राहुल और मनोज ने भागने की कोई कोशिश नहीं की थी । राहुल ने भाग रहे बच्चों को न भागने के लिए जोर से चिल्लाकर कहा लेकिन उसकी सुनने वाला कौन था ? पुलिस वालों ने उन्हें पकड़ने की कोई कोशिश भी नहीं की थी । अब तीनों राहुल मनोज और बंटी पुलिस की गिरफ्त में थे ।
जीप से उतरकर एक सिपाही ने बंटी की कलाई को कस कर जकड लिया  । हाथ में आते ही उसने बंटी को एक चांटा रसीद कर दिया था । साथ ही मनोज और राहुल को भी एक एक चांटे रसीद करते हुए चिल्लाया ” क्यूँ बे छोकरे ! दिन दहाड़े चोरी करते तुम लोगों को शर्म नहीं आती ? शर्म तो छोडो तुम लोगों को कानून का जरा भी डर नहीं है ? ”
गाल पर चांटा पड़ते ही मनोज तो सकपका गया  । उसकी बोलती बंद हो गयी  । लेकिन राहुल ने हिम्मत जुटाकर उस सिपाही से कहा ” पुलिस अंकल ! हम लोग चोर नहीं हैं । हम लोग तो खुद ही आप के पास आने वाले थे । अच्छा हुआ आप हमें यहीं मिल गए ……..”
उसकी बात पूरी सुने बिना ही सिपाही ने एक तमाचा और रसीद करते हुए कहा ” हमें पट्टी पढ़ाने की कोशिश मत करो बच्चू ! तुम्हारे जैसे शातिर चोरों से हमारा रोज पाला पड़ता है । इस इलाके में दिनदहाड़े चोरी की वारदात काफी बढ़ गयी थी । आज तुम लोग रंगे हाथों पकडे गए हो । इस टेम्पो में से  सामान चुराते हुए मैंने तुम लोगों को अपनी आँखों से देखा है । तुम्हारे खिलाफ हमारे पास पर्याप्त सबूत हैं । अब तुम लोग बच नहीं सकते ! सच सच बता दो तुम लोगों ने गाड़ी में से क्या चुराया है ? अगर मैं पता लगाऊंगा तो तुम लोगों को बड़ी मार पड़ेगी । समझे ? ”
तभी जीप में बैठे अफसर जो कि नायब दरोगा दयाल बाबू थे ने सिपाही को आवाज लगायी ” अरे रामसहाय ! ये क्या कर रहे हो ? बच्चे छोटे हैं । तुमको तनिक भी इनपर रहम नहीं आती ? माना कि हम कानून के मुलाजिम हैं लेकिन आखिर इंसानियत भी कोई चीज होती है । छोडो उन्हें ! मेरे पास लाओ । मैं उनसे पूछता हूँ ।”
चेहरे पर नागवारी के भाव लिए सिपाही रामसहाय बुदबुदाया ” इसीलिए तो आप इस रिटायरमेंट के उम्र में भी नायब दरोगा ही बने बैठे हैं । और लगता है आप अपने साथ ही हमारी भी तरक्की नहीं होने देंगे । ” लेकिन यह बातें दयाल बाबू के कानों तक नहीं पहुंची थी । गाड़ी से उतरकर बाहर राहुल को घूरते हुए दयाल बाबू ने मनोज से पूछा ” तुम बताओ लड़के ! तुम लोग इस टेम्पो में क्या कर रहे थे ? ”
अभी मनोज कुछ जवाब देता कि तभी कमाल और मुनीर ने चाय का घूंट पीते हुए शोर सुनकर अपनी गाड़ी की तरफ देखा । पुलिस की गाड़ी और अपने टेम्पो के बीच खड़े बच्चों और कुछ दुसरे ट्रक ड्राइवरों को देखकर कमाल के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी थी । मुनीर तो खासा घबरा गया था । वह कमाल की अपेक्षा अभी इस लाइन में नया नया था । वह दिल से इस बुरे धंदे के खिलाफ था लेकिन आखिर कब तक बेरोजगार रहता ? सो कमाल भाई के साथ कालू के यहाँ गाड़ी की देखभाल के काम पर लग गया था । मुनीर दौड़कर पुलिस के पास चले ही जाता अगर कमाल ने उसे पकड़ नहीं लिया होता । कमाल ने जल्दी से चाय ख़त्म की और काउंटर पर पैसे देने के बाद आराम से चलते हुए मैदान के दुुसरी तरफ से सड़क के किनारे आकर खड़ा हो गया । इससे पहले उसने मुनीर को ख़ामोशी से अपने पीछे आने का इशारा कर दिया था । अब दूर सड़क किनारे खड़े कमाल और मुनीर पुलिस की गाड़ी के जाने का इंतजार करने लगे ।
इधर दयाल का रुखा स्वर मनोज को भीतर तक सिहरा गया था । भय की अधिकता से हकलाते हुए बोला ” अंकल ! हमने कुछ भी चोरी नहीं किया । आप चाहें तो हमारी तलाशी ले सकते हैं । ”
दयाल बाबू ने कड़कते हुए बच्चों को हड़काया ” तलाशी तो हम लेंगे ही तुम्हारी भी और इस गाड़ी की भी । लेकिन पहले हम तुम्हारे मुंह से वो सब सुनना चाहते  हैं जो सच है ।”

क्रमशः

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।

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