लघुकथा

खुशियों की अहमियत

नीरा की शादी को दो साल हो चले थे. नया साल शुरु होते ही उसके अंगना में एक नए मेहमान का आगमन हुआ था. उसका नामकरण उसके दादा ने किया था. पहली बार ही उसकी प्यारी-सी, भोली-सी सूरत देखकर उनको अंदाजा हो गया था, कि वह शीतल स्वभाव वाला होगा, दादा की तरह प्रचण्ड सूरजमल नहीं, इसलिए उसका नाम विभु रख दिया था. अस्पताल से घर आते ही दादी ने अपने लाड़ले विभु की पहली लोहड़ी की तैयारियां शुरु कर दी थीं. पर उसकी पहली लोहड़ी तो मन ही नहीं पाई, उसी दिन तो विभु के दादा का अंतिम संस्कार हो रहा था. लोहड़ी की हर्षमय अग्नि से पहले सबके मन में विषाद की अग्नि जल चुकी थी. विभु की दादी को जहां पति के वियोग की विषम पीड़ा से रू-ब-रू होना पड़ रहा था, वहीं सुपुत्र की शादी के बाद घर में पहली खुशी में भंग पड़ जाने का शोक भी कम नहीं था.

 

निमेश के पिता के स्वर्गवास के दो महीने बाद ही होली का रंगीला पर्व सामने था. घर के श्वेत-श्याम माहौल में नीरा और उसके पति निमेश तो रंगरंगीली होली के बारे में सोच भी नहीं सकते थे, लेकिन विभु की दादी के मन में कुछ और ही चल रहा था. विभु की पहली लोहड़ी तो मन नहीं पाई, अब क्या पहली होली भी यों ही जाने दी जाय! ”नहीं”, उनके मन ने कहा. विभु की दादी ने नीरा-निमेश से तो कुछ नहीं कहा, पर सोसाइटी के जनरल सेक्रेटरी से मिलकर सारी योजना बना ली थी. बस उस दिन नीरा-निमेश को ऑफिस से ज़रा जल्दी वापिस आने को कह दिया था. नीरा-निमेश जल्दी आ भी गए, विभु को तो दादी ने पहले ही तैयार कर दिया था, नीरा-निमेश को भी जल्दी से नहा-धोकर तैयार होकर पूजा में चलने को कहकर दादी विभु के साथ हंसी-ठिठोली में अपने को व्यस्त रखे हुए थी. नीरा-निमेश विभु और मां के साथ होली की पूजा में गए. विभु की दादी के स्नेहिल निमंत्रण से पूरा प्रांगण खचाखच भरा हुआ था. जजमान की जगह नीरा-निमेश बैठने को कहा गया, तो दोनों हैरान होकर मां को देखने लगे. मां ने विभु को नीरा की गोदी में देते हुए कहा- ”बेटी, तुम्हारी पीढ़ी की खुशियों की भी अपनी अहमियत है. जीवन में सजीले रंगों की महफ़िल सजी रहनी चाहिए.”

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244