कविता

सत्य का एक रंग श्वेत

हम सत्य के जितने करीब
उतने उज्ज्वल,उतने धवल
सत्य का सिर्फ एक रंग “श्वेत”
विलीन है जिसमे रंग अनेक
मिथ्या है केशों लिप्त ये कालिमा
देह के सत्य ने अनवरत
शुरू कर दिया जो यह बोलना
भ्रम गुंथे मन बंधन को खोलना
झुकने लगे अनुभवों से लदे वृक्ष
देखो प्रगाढ़ होती इन झुर्रियों पर
लटक आये हैं परिपक्व फल
आड़ी टेढ़ी सी कुछ डालियों पर
अन्धकार बोलने लगे
आलोक्यमान होकर
जाग उठा सत्य जब
लम्बी नींद सोकर
सब कुछ यहां धुंधला जाता है
एक वो जब
उभर कर सामने आ जाता है
भड़कीले इन सात रंगों का सत्य
जब भी एकाकार हो जाता है
तिमिर उभरकर,लुप्तप्राय हो जाता है
कालचक्र के वेग पर चल
सिर्फ प्रकाश जगमगाता है
क्योंकि सत्य का सिर्फ एक रंग
श्वेत
विलीन हैं जिसमे रंग अनेक
प्रियंवदा अवस्थी 

प्रियंवदा अवस्थी

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साहित्य विषय में स्नातक, सामान्य गृहणी, निवास किदवई नगर कानपुर उत्तर प्रदेश ,पठन तथा लेखन में युवाकाल से ही रूचि , कई समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित , श्रृंगार रस रुचिकर विधा ,तुकांत अतुकांत काव्य, गीत ग़ज़ल लेख कहानी लिखना शौक है। जीवन दर्शन तथा प्रकृति प्रिय विषय । स्वयं का काव्य संग्रह रत्नाकर प्रकाशन बेदौली इलाहाबाद से 2014 में प्रकाशित ।