कविता

स्त्री

झूठे प्यार की उम्मीद में आशियाना सजा लेती है ,
एक स्त्री त्यागकर अपनी सभी इच्छाएं खुद को मना लेती है ।

छोड़कर वो नीड़ बिताये थे जहां बरसों उसने ,
एक अनजानी डगर को बनाकर अपनी मंजिल उम्र गुजार लेती है ।

माँ बाप वो गुड़ियों का बसेरा सभी भुला देती है,
बनाकर झिड़कियों को अपना नसीब ताउम्र घर को बुहार लेती है ।

वो किताबें,वो सखियाँ,वो पुराने रास्ते थे कभी अपने
भुलाकर सपनों का शहर अपनी तमाम यादें खुद को संवार लेती है ।

कल्पनाओं के सफर में उड़ान अब भी याद आती है
रखकर पीछे अपनी यादें बच्चों में खुद को ढाल लेती है ।

ऐश आराम के ख्वाब तो सिर्फ सपने ही रह जाते हैं
एक स्त्री तमान उम्र जिम्मेदारियों से खुद को बांध लेती है ।

वो मर्द है कुचलना जानता है आज भी एक औरत को ,
ताउम्र जिसे सात बंधन के गुरूर में बनाकर मंगलसूत्र गले में टांग लेती है ।

शायद उड़ रही हैं आज भी हजारों लड़कियां ख्वाबों की आस में ,
एक स्त्री बनकर आज भी वो खुद को पराधीन बना लेती है ।

गजब की आत्म शक्ति है उसके रूप और रंग में ,
एक स्त्री ओढ़कर झूठी मुस्कान जख्मों को जेवर से लाद लेती है ।।

वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

*वर्षा वार्ष्णेय

पति का नाम –श्री गणेश कुमार वार्ष्णेय शिक्षा –ग्रेजुएशन {साहित्यिक अंग्रेजी ,सामान्य अंग्रेजी ,अर्थशास्त्र ,मनोविज्ञान } पता –संगम बिहार कॉलोनी ,गली न .3 नगला तिकोना रोड अलीगढ़{उत्तर प्रदेश} फ़ोन न .. 8868881051, 8439939877 अन्य – समाचार पत्र और किताबों में सामाजिक कुरीतियों और ज्वलंत विषयों पर काव्य सृजन और लेख , पूर्व में अध्यापन कार्य, वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लेखन यही है जिंदगी, कविता संग्रह की लेखिका नारी गौरव सम्मान से सम्मानित पुष्पगंधा काव्य संकलन के लिए रचनाकार के लिए सम्मानित {भारत की प्रतिभाशाली हिंदी कवयित्रियाँ }साझा संकलन पुष्पगंधा काव्य संकलन साझा संकलन संदल सुगंध साझा संकलन Pride of women award -2017 Indian trailblezer women Award 2017