लघुकथा

मां-बाप का दिल

कहते हैं कि, एक मिनट में ज़िंदगी नहीं बदलती पर, एक मिनट में सोचकर लिया हुआ फैसला पूरी ज़िंदगी बदल देता है. ऐसा ही किस्सा एक शहर में रहने वाले नरेंद्र के परिवार के साथ हुआ. वे मेले में गए और एक घंटा घूमे. अचानक उनका बेटा मेले में खो गया. दोनों पति-पत्नि मेले में उसे बहुत ढूंढते हैं, पर उनका बेटा नहीं मिलता. बच्चे की मां ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी. बाद में वे पुलिस को सूचना देते हैं. आधे घंटे बाद बच्चा मिल जाता है. बच्चे की मां उसे बहुत प्यार-दुलार से पुचकारती है और सीने से चिपका लेती है. बच्चे के मिलते ही उसके पिताजी ने एक मिनट कुछ सोचा. उसे अहसास हो गया था- “मां” इस एक अक्षर में सारा ब्रह्माण्ड समाहित है. कुछ भी इससे इतर होने के परिकल्पना भी नहीं की जा सकती है. अन्य मानवीय रिश्तों में देश-काल-परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन-विचलन संभव है, किन्तु् मां में कोई भी परिवर्तन कभी नहीं हुआ है. वे गांव के टिकिट लेकर आए और वे सभी बस में बैठकर गांव को चल पड़े. तभी पत्नि ने पूछा कि, “हम गांव क्यों जा रहे हैं? अपने घर नहीं जाना क्या?”

पति ने जवाब दिया, ” तू मेरी औलाद के बिना आधा घंटा नहीं रह सकती, तो मेरी मां (भावुक होकर रुआंसा-सा हो गया) पिछले दस सालों से मेरे बिना कैसे जी रही होगी? आज तक मां-बाप का दिल दुखाकर कोई सुखी नहीं हुआ.”

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244