चामर छंद, तोणक, शक्वरी छंद…..

 

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कृष्ण को सदैव राधिका रही पुकारती।
तृष्ण को सुने न कृष्ण राह थी बुहारती।
पीर है बढ़ी चली जिया हुआ अधीर है।
मोह बाँसुरी रही दिखा न नैन नीर है।
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पूर्व खोह फोड़ झांकती अनंत रश्मियाँ।
गूँजने लगे दिगंत नाद ओम घण्टियाँ ।
आलसी बनो न शारदे सुता अभी सुनो।
लेखनी उठाय काव्य छंद को सभी गुनो।
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भोर है ढली अपूर्ण सी असीम चेतना।
सांझ है करीब दीप सी जले न वेदना।
पंथ को रही निहार शीघ्र लौट रांझना।
साँस ये न टूट जाय दर्द तीव्र साजना।

©®………..अनहद गुंजन गीतिका………