मुक्तक/दोहा

मुक्तक : फसल

जब मन में उगती फसल, तब लहराते खेत खाद खपत बीया निरत, भर जाते चित नेत हर ऋतु में पकती फसल, मीठे मीठे स्वाद अपने अपने फल लिए, अपने अपने हेत॥1॥ कभी क्रुद्ध होती हवा, कभी फसल बीमार गुर्राता है नभ कभी, कृषक कर्म आधार आस लगाकर खेड़ता, जुतकर अपने मेड़ नमन शमन बदरी तपे, […]

इतिहास

दिव्यांगों के आदर्श – श्री बच्चू सिंह (भाग 2)

1946 के प्रारम्भ में बच्चू सिंह के नेतृत्व में भारतीय वायुसेना में विद्रोह हुआ। इसके कुछ ही दिन बाद 15 फरवरी 1946 तक यह क्रांति सेना के तीनों अंगों में पहुँच गई। यह पंजाब से लेकर असम, मद्रास, अंडमान, और अदन तक यह सभी प्रमुख सैन्य केन्द्रों में फैल गई। इसी समय राजधानी दिल्ली समेत […]

हास्य व्यंग्य

रामराज

आज हरिया बहुत खुश था । सुबह सुबह गांव के नुक्कड़ पर चाय की दुकान पर चाय पीने पहुंच गया था । यहीं पर उसे यह खुशी उसका इंतजार करती हुई मिल गयी । आप लोग उल जुलूल कुछ भी सोच कर अपने दिमाग की नसों में तनाव न पैदा होने दें । दरअसल उसकी […]

बाल कविता

कठपुतली

पापा कहते करो पढाई मिलेगी तुमको बहुत बड़ाई। मम्मी कहतीं सबकी सुन भर लो खुद में अच्छे गुण। भैया  कहते अभ्यास करो खेल जगत में नाम करो। दीदी को है संगीत पसंद बाकी सब तुम कर दो बंद। कोई कहता कंप्यूटर सीखो कोई कहता नयी चीज़ें सीखो। हम छोटे भोले से बच्चे मासूम बहुत, हैं […]

कविता

किन्नर

हाँ, मैं हूँ किन्नर होश संभाला स्वयं को पाया किन्नरों के बीच। नहीं जानता कैसी होती माँ कैसा होता पिता क्या होती ममता, बड़ा हुआ तब जाना मैंने दिया जिसने जन्म किया उसी ने बेघर। पहन लेता हूँ चूड़ी, बिन्दी, गजरा, पायल ओढ़ लेता हूँ चुनरी किन्तु खुद की देह देख समझ नहीं पाता मैं […]

कविता

माँ तुम बड़ी अजीब थी

जब मैं छोटी थी मुझे परियों की सी फ्रॉक पहना और बालों में रिबन लगा आंखों में काजल लगा प्यार से निहारती थी, और इस डर से कि कहीं नज़र न लग जाये मुझे काला टीका लगा चूम लेती थी उससे भी तुझे तसल्ली नहीं होती थी नए नए प्रयोग कर मेरी नज़र उतारती थी, […]

कविता

अपूर्ण को पूर्ण

नहीं चाह मुझे रत्न जड़ित आभूषणों की, नहीं कामना मुझे सलमे सितारों से सजी चंदेरी चुनर की, नहीं ईप्सा मुझे रक्त अधरों की, नहीं अभिलाषा मुझे संगमरमर से बने महलों की। मैं पैबंद लगी सूती धोती में रेशमी धागे से कसीदे काढ़ संवार लेती हूँ वसन, प्रियतम के प्रेम सिंदूर से और लाज का गहना […]

कविता

कविता : चमेली के फूल

जब मैं छोटी थी फूलों की खुशबू मुझे इत्र से ज्यादा भाँती थी उन दिनों पापा के साथ पुलिस थाना के कैपंस में ही टाली के बने दो छोटो कमरे रहते थे थाना के चारों ओर बाग बगीचे थे आम,कटहल,केला,जामुन,शरीफा के फल थे क्यारियों में चमेली के फूल लगे थे मैं यही सोचती थी ये […]

कविता

कविता : रात और दिन

मेरे हिस्से में रात आई रात का रंग काला है इसमें कोई दूजा रंग नहीं मिला इसलिए सदा सच्चा है मेरी ज़िन्दगी भी अकेली है कोई दूजा ना मिला! फिर दिन का हिस्सा सफेद रंग का है जो दूजे रंग से मिल बना झूठा सा दिखता है फिर भी जीवन में विविध रंगों को भरता […]

कविता

माता-पिता

मेरे लिए तो हर दिन ही मातृ- पितृ दिवस ! पलभर के लिए भी दोनों ओझल नहीं होते मेरी यादों से लेकिन, फिरभी ! जब किसी खास दिन कानों में गूंजता है पितृ दिवस का शोर ! तो आँखें नम और मन शांत हो जाता है चाहती हूँ लिखूं मैंभी ! एक मर्मस्पर्शी कविता पर […]