Monthly Archives: June 2017

  • मुक्तक : फसल

    मुक्तक : फसल

    जब मन में उगती फसल, तब लहराते खेत खाद खपत बीया निरत, भर जाते चित नेत हर ऋतु में पकती फसल, मीठे मीठे स्वाद अपने अपने फल लिए, अपने अपने हेत॥1॥ कभी क्रुद्ध होती हवा, कभी...


  • रामराज

    रामराज

    आज हरिया बहुत खुश था । सुबह सुबह गांव के नुक्कड़ पर चाय की दुकान पर चाय पीने पहुंच गया था । यहीं पर उसे यह खुशी उसका इंतजार करती हुई मिल गयी । आप लोग...

  • कठपुतली

    कठपुतली

    पापा कहते करो पढाई मिलेगी तुमको बहुत बड़ाई। मम्मी कहतीं सबकी सुन भर लो खुद में अच्छे गुण। भैया  कहते अभ्यास करो खेल जगत में नाम करो। दीदी को है संगीत पसंद बाकी सब तुम कर...

  • किन्नर

    किन्नर

    हाँ, मैं हूँ किन्नर होश संभाला स्वयं को पाया किन्नरों के बीच। नहीं जानता कैसी होती माँ कैसा होता पिता क्या होती ममता, बड़ा हुआ तब जाना मैंने दिया जिसने जन्म किया उसी ने बेघर। पहन...

  • माँ तुम बड़ी अजीब थी

    माँ तुम बड़ी अजीब थी

    जब मैं छोटी थी मुझे परियों की सी फ्रॉक पहना और बालों में रिबन लगा आंखों में काजल लगा प्यार से निहारती थी, और इस डर से कि कहीं नज़र न लग जाये मुझे काला टीका...

  • अपूर्ण को पूर्ण

    अपूर्ण को पूर्ण

    नहीं चाह मुझे रत्न जड़ित आभूषणों की, नहीं कामना मुझे सलमे सितारों से सजी चंदेरी चुनर की, नहीं ईप्सा मुझे रक्त अधरों की, नहीं अभिलाषा मुझे संगमरमर से बने महलों की। मैं पैबंद लगी सूती धोती...


  • कविता : रात और दिन

    कविता : रात और दिन

    मेरे हिस्से में रात आई रात का रंग काला है इसमें कोई दूजा रंग नहीं मिला इसलिए सदा सच्चा है मेरी ज़िन्दगी भी अकेली है कोई दूजा ना मिला! फिर दिन का हिस्सा सफेद रंग का...

  • माता-पिता

    माता-पिता

    मेरे लिए तो हर दिन ही मातृ- पितृ दिवस ! पलभर के लिए भी दोनों ओझल नहीं होते मेरी यादों से लेकिन, फिरभी ! जब किसी खास दिन कानों में गूंजता है पितृ दिवस का शोर...