कविता

कविता : बस एक प्रीत तुम्हारी

बस एक प्रीत तुम्हारी जिसने मुझे मीरा तुम्हें श्याम बनाया
बस एक बात तुम्हारी जिसने तन मन एक संग्राम रचाया
रच-रच स्वप्न घरौंदे नित मैं इर्द गिर्द हूँ धरती फिरती
कोण-कोण तेरे रूप सजाए हर चौखट पर दृष्टि बिछी
प्रण है दृढ और प्रीत परीक्षा सहज नही ये परम प्रतीक्षा
लहरों लहरों गिरती उठती आस नदी पर नाव खे रही
गहन दहन जीवन ज्वाला से अन्धकार हूँ दीप्त कर रही
उथलाई राहों पर प्रियतम नीर नयन मैं नीर भर रही
सिंचित संचित प्रीत संग ले पलकों को पतवार बनाया
बस एक प्रीत तुम्हारी जिसने…….

प्रियंवदा अवस्थी

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साहित्य विषय में स्नातक, सामान्य गृहणी, निवास किदवई नगर कानपुर उत्तर प्रदेश ,पठन तथा लेखन में युवाकाल से ही रूचि , कई समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित , श्रृंगार रस रुचिकर विधा ,तुकांत अतुकांत काव्य, गीत ग़ज़ल लेख कहानी लिखना शौक है। जीवन दर्शन तथा प्रकृति प्रिय विषय । स्वयं का काव्य संग्रह रत्नाकर प्रकाशन बेदौली इलाहाबाद से 2014 में प्रकाशित ।