एक व्यंग्य, हे दलित श्रेष्ठ।

ज्योतिराव फुले द्वारा इस्तेमाल किया गया शब्द दलित आज राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है या यूँ कहूँ की ये राजनीति की धुरी है तो गलत नहीं होगा।
सवाल उठता है दलित कौन हैं? क्या वर्ग विशेष में जन्म लेने वाले ही वंचित हैं, दलित हैं !!क्या दूसरे वर्गों में कभी वंचित नहीं हुए, या नहीं हैं! उत्तर फिर मेरे जेहन में आता है उच्च वर्ग को खुद को मजबूर कहने का कोई हक़ नहीं है क्योंकि वे पहले ही उच्च हैं। उनका सबसे बड़ा कसूर है ये , उनका उच्च होना ।अगर कोई बालक गरीब कथा वाचक के यहां पैदा होता है और उनके पास दान में आये हुए भोजन से ही वो परिवार गुजारा करते है ,लेकिन उनको इस देश में
मजबूर नहीं समझा जायेगा । उन्होंने उच्च वर्ग में जन्म लिया ही क्यों! इस वर्ग की ये ही सजा निर्धारित की गयी है। आखिर उन्होंने भी सैकड़ों सालों तक देश के निम्न वर्ग को अपनी उँगलियों पर नचाया है अब उनके नाचने की बारी है और अगर वे नहीं नाचेंगे तो उन्हें नचवाया जायेगा आरक्षण की ताल पर ! अगर वे नहीं ज्यादा पढेंगे तो भी उन्हें ज्यादा पढ़वाया जायेगा नौकरी के लिए ,प्रमोशन के लिए क्योंकि ऊँचे कुल में जन्म लेना उनका गुनाह है । वे नौकरी की तलाश में देश से विदेश तक नाचेंगे उन्हें नाचना पड़ेगा !

लेकिन श्रेष्ठता !! सोचती हूँ श्रेष्ठ कौन होगा ! वो जो अधिक अभ्यास करेगा ! या वो जो आराम से साधनों का लाभ उठाएगा ! फिर ….. मुझे तो ये वर्ग भेद की खाई मिटती हुई नहीं दिखती है । लोग कह रहे हैं समानता से देश प्रगति करेगा ,मुझे तो समानता नहीं दिखती ।शायद उन लोगों को दिखती होगी जिनके अपने स्वार्थ वर्ग विभेद के अंगूरों पर टिके हुए हैं इसलिए उन्हें कोई गरीब नहीं दिखता !
मैं देख रही हूँ आज तो बहुत ही ऊँचे पदों पर दलित हैं मंत्री हैं ,मुख्यमंत्री हैं तो क्या इनके द्वारा एक वर्ग विशेष का ही बराबर ख्याल रखने से बाकी लोग बंचित नहीं हो गए ! मन कहता है नहीं वंचितों के पास वंचित होने का सर्टिफिकेट है जो सबके पास नहीं इसलिए सरकारी सुविधाएं लेने का ठेका सिर्फ उन्हीं का है।

आज दलित होने का बहुत ही गूढ़ अर्थ है ।
दलित होते हुए अगर किसी समाज विशेष ने आपको अपना मातहत चुन लिया फिर तो कहने ही क्या ।फिर तो बस आपको एक झंडा उठाना है ,जैसे कृष्ण ने गोवर्धन उठाया था उसी तर्ज पे और सबको हांक के अपने गोवर्धन के नीचे लाना है बस आपको भी लोग सदियों तक पूजते रहेंगे आपकी परिक्रमा करते रहेंगे फिर चाहें आप अपने घर में हाथी बैठाइए या लोगों को हाथी पर बैठाइए या न भी बैठाइए ।न दींन हाथी पर बैठ कर खुद को राजा समझने लगा तो सारी शतरंज की विसात तहस -नहस हो जायेगी फिर हाथी पैदल घोड़े सबको कुचलता हुआ बजीर तक पहुंचने की कोशिश करेगा मगर शतरंज की सफलता इसी में है कि हाथी अपनी जगह खड़ा रहे ।चाले चली जाती रहें और राजनीति की रोटियां सिकती रहें।

दलित होना समृद्ध होने की कुंजी है दलित होने की बजह से पढ़ाई से लेकर नौकरी और प्रमोशन तक आरक्षण की चांदी ही चांदी है और जो लोग इस बात को समझ लेते हैं वे इस सीढ़ी पर चढ़ते हुए ब्राह्मण बन जाते हैं और दींन ,दींन ही बना रहता है । इसीलिये अब नए तरीके की अश्पृश्यता का जन्म होता है ।अब ये दलित इनको कभी खुद तक नहीं पहुँचने देता क्योंकि अब वो व्राह्मण है ओर व्राह्मण होते ही ब्राह्मण के सारे गुण उसमें खुद ही विकसित होते चले जाते हैं। फिर!!
सोच रही हूँ वर्गभेद की नई परिभाषा क्या है ……..!!