राजनीति

ईद-इफ्तार-इस्लामी तुष्टिकरण हटाओ; भारत को इंडोनेशिया बनने से बचाओ

यह कहा जाता है कि न्याय सभी के लिए बराबर होना चाहिए। यदि यह सही है, तो भारतीय जेल इस रमजान में अब मुस्लिम अभियुक्तों, विचाराधीन कैदियों और अपराधियों से लगभग मुक्त हो जाना था।
जी हाँ, दिनांक 17 जून को मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए एक निर्णय से तो यही आभाष मिलता है । तमिलनाडु के एक मुस्लिम नेता, तमिलनाडु मुन्नेत्र कज़गम की राज्य इकाई के अध्यक्ष एम एच जवाहिरुल्ला और चार अन्य लोगों को निचली अदालत द्वारा विदेशी अंशदान (विनियम) अधिनियम, 1976 (एफसीआरए) 1976 के उल्लंघन के मामले में एक वर्ष कारावास की सजा सुनाई गई थी । अपनी सजा को चुनौती देने के लिए उसने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उसने समर्पण करने के लिए इस आधार पर समय माँगा कि वह ‘रमजान’ के महीने में रोजा रखे हुए है, तथा उपवास पर है, अतः उसे समय दिया जाए । हैरत की बात है कि उसका आवेदन स्वीकार कर लिया गया । न्यायाधीश एन सतीश कुमार ने आत्मसमर्पण के लिए रमज़ान (रमज़ान) की अवधि में राहत देते हुए अगली सुनवाई हेतु 29 जून की तारीख दी है । विचारणीय बिंदु है कि अगर समान न्याय का सिद्धांत माना जाए तो भारतीय जेलों में रमजान के दौरान उपवास करने वाले अन्य मुसलमान वन्धुओं को क्यों नहीं मुक्त किया जाना चाहिये था।
वस्तुतः पूरा भारत इन दिनों रमजान, रोजा और इफ्तार पार्टी में तल्लीन है। तो न्यायपालिका इससे दूर कैसे हो सकती है?
इसके अगले ही दिन, हैदराबाद उच्च न्यायालय ने 18 जून को तेलंगाना सरकार को इफ्तार पार्टी पर्व मनाने की अनुमति दी।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति टी रजनी की एक खंडपीठ ने लबना सरवथ द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर निर्णय करते हुए सरकार को ‘इफ्तार डिनर’ की मेजबानी करने और हैदराबाद की 380 मस्जिदों सहित पूरे राज्य की 420 मस्जिदों में ‘गिफ्ट पैकेट’ बांटने के लिए 60 करोड़ रूपए खर्च करने की मांग स्वीकार कर ली।
हालांकि बेंच ने यह निर्देश दिया कि ‘सरकार केवल गरीब मुसलमानों को खिलाये और रमज़ान के उपहार पैकेट भी गरीबों को ही दे। याचिकाकर्ता के वकील आर समीर अहमद ने कहा था कि सरकार अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की निधियों को इफ्तार पार्टी के नाम पर मनमाने ढंग से खर्च कर रही है। पिछले साल केवल ‘निमंत्रण कार्ड और कार पास पर ही 3 लाख खर्च किए गए थे’।
अगर माननीय न्यायालय यह सोचता है कि तेलंगाना सरकार का गरीब मुसलमानों को खिलाने और उपहार पैकेटों के नाम पर एक दिन में 60 करोड़ रुपये खर्च करने का निर्णय उचित है, तो अदालत सरकार को यह आदेश क्यों नहीं देती कि राज्य सरकार पूरे वर्ष हर जाति, पंथ और धर्म के सभी गरीब लोगों को भोजन कराये ?
यह तेलंगाना या कर्नाटक की ही अनोखी कहानी नहीं है, रमज़ान, रोजा और इफ्तार की प्रथा को बढ़ावा देने के ऐसी ही प्रवृत्तियां पश्चिम बंगाल, केरल और भारत में कई अन्य राज्यों में भी देखी जा रही हैं।
पश्चिम बंगाल और केरल में, सरकार के मुस्लिम कर्मचारियों को इफ्तार (उपवास का सत्र सही समय पे भंग करने हेतु ) के लिए जल्दी प्रस्थान की सुविधा मिल रही है। यहां तक ​​कि न्यायालय के घंटे भी तदनुसार समायोजित किये जा रहे है। इतना ही नहीं, पश्चिम बंगाल में तो अनिवार्य कार्यक्रम के रूप में प्रत्येक पुलिस थाने पर “इफ्तार मज्लिश” आयोजित करने के लिए हिंदू व्यापारियों और घरों से पैसा बसूला जाता हैं। सरकार भी निगमों, नगरपालिकाओं और अन्य ब्लॉक और स्थानीय निकाय स्तरों में भव्य रूप से “इफ्तार मजलिस” के लिए 100 करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर रही है। सत्तारूढ़ राजनीतिक दल टीएमसी इसे अलग से भी आयोजित कर रहा है।
राज्य में रमज़ान, रोजा, इफ्तार और ईद-उल-फितर के आयोजन से उत्साहित होकर आने वाले दिनों में संभव है सरकार द्वारा ‘ईद-उल-अधा’ (बकर ईद) के उत्सव भी सार्वजनिक मनाये जाएँ। जैसा कि मुस्लिम निकायों द्वारा प्रचार अभियान चलाया जा रहा है, यदि ईद-उल-अधा (बकर ईद) को सरकारी तौर पर मनाया गया, तो क्या नजारा होगा ? यदि यह मांग पूरी हो जाती है तो बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उपस्थिति में ईद-उल-अधा पर सड़कें बेजुबान पशुओं के रक्त से भीगी हुई दिखाई देंगी, और उन सडकों पर नमाज के कितने सुहाने नज़ारे होंगे ?
एक समय था, जब इंडोनेशिया की सरकार ईद-उल-फितर और ईद-उल-अधा को सरकारी स्तर पर नहीं मनाती थी। इंडोनेशिया सदैव अपनी ‘हिंदू विरासत’ और ‘भारतीय संस्कृति के मूल’ को स्वीकारता था। इंडोनेशिया ने आज भी अपनी राष्ट्रीय एयरवेज का नाम “गरुड इंडोनेशिया” रखा है, भगवान गणेश की छवि अभी भी इंडोनेशियाई रुपए में मिलती है। लेकिन, एक दिन ईद-उल-अधा, ईद-उल-फितर को साथ-साथ सरकारी कार्यक्रमों में शामिल किया गया। और फिर देखते ही देखते ‘गुड इस्लाम’ के स्थान पर, ‘रैडिकल इस्लाम’ ने इंडोनेशिया में अपने मजबूत कदम रख दिए। आज इंडोनेशिया के हर प्रांत में आईएसआईएस की मजबूत उपस्थिति है।
2013 में सीरिया में आईएसआईएस के लिए लड़ रहे इंडोनेशियाई लोगों की संख्या महज 50 थी, 2016 और 2017 में यह संख्या क्रमशः 300 से 700 तक बढ़ी। इंडोनेशिया ने रैडिकल इस्लाम के दबाव में हिंदू प्रभाव को खो दिया है और यह अब वहां के समाज और व्यवस्था में साफ़ दिखाई दे रहा है। ये सभी परिवर्तन अकस्मात नहीं हुए हैं, क्रमशः धीमे धीमे हुए हैं। अब तो हालत यह है कि इंडोनेशिया तेजी से एक पूर्ण ‘इस्लामी राज्य’ की ओर बढ़ रहा है ।अगर भारत को इंडोनेशिया बनने से बचना है तो भारत सरकार और किसी भी राज्य को किसी भी ईद-उल-फितर या ईद-उल-अधा में शामिल नहीं होना चाहिए।

— उपानंद ब्रह्मचारी