धर्म या इन्सानिअत !

शेरू पुरा गाँव में कभी भी अमन शान्ति नहीं रही थी। इस गांव के मुसलमानों हिन्दुओं और सिखों में हमेशा तनातनी रहती थी। गरीबी भी इस गाँव में खुशहाल थी, शायद यही वजह थी कि गाँव के लोग एक दूसरे की सहायता करने में असमर्थ थे और शायद यह भी कारण हो कि हर कोई खिंचा खिंचा सा रहता था। एक दिन सुबह ही एक संत बाबा इस गाँव के बड़े पीपल के नीचे आ कर बैठ गए। गाँव के लोगों की एक सिफत तो होती ही है कि आपस में बेछक बोल चाल अच्छी हो ना हो लेकिन संत बाबा जी को सलाम नमस्ते जरूर बोलेंगे। धीरे धीरे लोग आने लगे और उन के पास बैठ कर इसी आशा में रहते कि बाबा जी उन का भविष्य उज्वल कर देंगे। बाबा जी सभ को इतना अच्छा उपदेश देते कि किसी ने कभी यह नहीं पूछा कि वोह हिन्दू सिख या मुसलमान थे। एक बात थी कि बाबा जी का हँसूँ हँसूँ करता चेहरा सभ के दिल मोह लेता था। दिन बीतते गए और बाबा जी गाँव के कामों में भाग लेने लगे। एक दो सालों में उन को गाँव के हर घर की हालत का गियान हो गया। किसी के घर में कोई तकलीफ होती, बाबा जी झट से उन के घर पहुंच जाते और उन की मदद करते। उन्होंने गाँव के पोस्ट ऑफिस में अपना अकाउंट बना लिया और जितने भी पैसे लोग उन को देते वोह पोस्ट ऑफिस में जमा कर देते। गाँव में किसी गरीब का बच्चा बीमार हो, किसी गरीब की बिटिआ की शादी हो, वोह पोस्ट ऑफिस से पैसे निकालते और उन की मदद कर देते। यह देख कर उन की ख्याती बढ़ने लगी और लोग ज़्यादा से ज़्यादा पैसे बाबा जी को देने लगे क्योंकि उन को पता था कि बाबा जी अपने लिए कोई पैसा खर्च नहीं करते थे ।
अब बाबा जी गाँव के कामों में भी हिस्सा लेने लगे। गाँव की सफाई शुरू हो गई और बृक्ष लगने शुरू हो गए। जिस गाँव में हमेशा लड़ाई झगडे रहते थे, अब वोह सभी बाबा जी के बचन सुनते जो हमेशा सब का, मन मोह लेते थे। सभी धर्मों के लोग अब पियार मुहब्त से रहने लगे और कुछ ही सालों में गाँव का नक्शा ही बदल गया। जब तक बाबा जी बूढ़े हुए गाँव बिलकुल बदल चुक्का था और अब वोह गाँव के सांझे बाबा थे। कुछ दिन से बाबा जी की तबीयत ठीक नहीं थी, खांस रहे थे और वोह तकिये के सहारे बैठे हुए थे कि गाँव के कुछ लोग एक नक्शा ले कर आये जो किसी धार्मिक अस्थान का था। नक्शा उन्होंने बाबा जी के चरणों में रख दिया और एक शख्स हाथ जोड़ कर बोला, ” बाबा जी ! आप ने हमारे गाँव को स्वर्ग बना दिया है, हम आप की याद में एक धार्मिक अस्थान बनाना चाहते हैं, हमें आज तक कुछ नहीं पता कि आप हिन्दू हैं, सिख या मुसलमान लेकिन आप ने जो कुछ इस गाँव को दिया है, वोह शेरू पुरा कभी भूल नहीं सकेगा, हम ने एक धर्म अस्थान का नक्शा तैयार करवाया है जिस में हिन्दू सिख और मुसलमान, तीन धर्मों की झलक दिखाई देगी, कृपा इस को मंजूरी दे दें “, बाबा जी ने नक्शा हाथ में पकड़ा, धियान से काफी देर देखते रहे और फिर अचानक उन्होंने नक्शा फाड़ दिया और कुछ टुकड़े करके दूर फैंक दिए। सभी हैरान हुए बाबा जी की तरफ देख रहे थे। कुछ देर सोचने के बाद बाबा जी मुस्कराये और धीरे धीरे बोले, ” अब इस गाँव में कोई भी धर्म अस्थान माने नहीं रखता क्योंकि अब सारा गाँव धर्म से ऊपर उठ कर इंसान बन गया है “, बाबा जी जोर जोर से खांसने लगे और कुछ ही पलों में शरीर का त्याग कर दिया।

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.