एक नया पंगा

जब से मुफत में ऊपर की सैर की थी, दिमाग में यह आता रहता था कि काश! सच में ही वोह यम राज, धर्म राज और चित्रगुप्त के फिर से दर्शन हो जाएँ और सब से बड़ी बात गब्बर चंद जो यम राज की इतनी अच्छी पोस्ट पे लगा हुआ था, से बातें हो जाएँ। बेछक वोह एक सपना ही था, फिर भी पता नहीं क्यों यमराज, गब्बर चंद का वोह चेहरा बहुत याद आता था। उस का सुन्दर बड़ा भैंसा, जिस के बड़े बड़े सींग थे, कितना शरीफ था वोह ! यम राज गब्बर चंद तो ख़ास कर याद आता था। उस की बड़ी बड़ी मूंछें, सोने की सींगों वाला मुकट, हाथ में बहुत बड़ी गदा और काला रंगा हुआ चेहरा बहुत याद आता था, यह तो उस की यूनिफार्म ही थी । सब से अच्छा लगता था उस का काम जो वोह बहुत ही ईमानदारी से करता था। किसी की जान लेने के लिए उस को धरती पर भेजने का हुक्म होता था तो दिल से उस को उस शख्स से हमदर्दी होती थी बेछक पहले वोह ऊंची ऊंची ह ह ह करके हँसता था लेकिन यह तो उस का काम था, उस की ट्रेनिंग का एक हिस्सा ही था जो उसे करना ही पड़ता था। अगर वोह न करता तो कोई दूसरा कर लेता। एक बात मेरे साथ अच्छी हुई थी कि मुझे पता चल गया कि ज़िंदगी में अच्छे काम करने चाहिए, बुरे कर्मों का फल बुरा ही होता है जो हरहालत में हमें भुगतना ही पड़ेगा।
वैसे तो गाँव में अपना मकान था लेकन शहर में भी एक मकान खरीद रखा था ताकि जब भी इंडिया आना पड़े तो शहर में भी रहने के लिए कोई परेशानी न हो। एक दिन मुझे मेरे भाई का फोन आया कि किसी ने जबरदस्ती मेरे मकान पर कब्ज़ा कर लिया है और कहता है कि यह उस की प्रॉपर्टी है। हम हैरान और गुस्से में आ गए कि यह तो चीन के डोकलाम पर हक जमाने वाली बात हो गई। मकान की रजिस्ट्री हमारे पास और मालक कोई और ! , खैर मैं ने तुरंत सीट बुक करवाई और इंडिया पहुँच गया। गाँव से उस शहर वाले मकान में जब मैं गया तो आँगन में एक कार खड़ी थी और एक औरत और एक मर्द कुर्सिओं पर बैठे नाश्ता कर रहे थे। जब मैं वहां गया तो उन्होंने मेरी तरफ देख कर मुंह दुसरी तरफ कर लिया और खाना खाने में व्यस्त हो गए। मैंने कुछ गुस्से में बोला, ” भाई साहब ! आप यहां कैसे बैठे हैं, यह मकान तो मेरा है “, वोह बोला, ” तो आप ने ही मकान को ताला लगाया था ?”, जब मैंने कहा कि भाई जब यह मकान मेरा है तो ताला मैं ही लगाऊंगा। अब वोह कुछ गुस्से भरे लहज़े में बोला, ” देख मिस्टर ! यह मकान हमारा है और तू ने जबरदस्ती इस पे ताला लगाया था, अगर ज़्यादा बहस की तो जेल भिजवा दूंगा, अगर कोई सबूत है तो कोर्ट में जाओ “, मेरा तो दिमाग सुंन हो गया। कुछ लोग इकठे हो गए थे और सभी उस के हक्क में ही बोल रहे थे कि यह मकान तो उस का था। अब मेरी वहां कौन सुनने वाला था, मैंने वकील किया और कुछ दिनों बाद हम तसीलदार के सामने पेश हुए। मैं ने मकान के कागज़ात तसीलदार को दिखाए। दूसरे शख्स के पास भी इसी मकान के कागज़ात थे। तसीलदार ने उस आदमी की ओर देख कर मुझे कहा कि मेरे कागज़ात जाहली हैं और वोह मकान का सही मालक है और हेराफेरी के जुर्म में मुझे ग्रिफ्तार किया जाता है। मैंने बहुत शोर मचाया लेकिन मेरी सुनने वाला वहां कौन था। कुछ पुलिस मैन आये और हाथकड़ी लगा कर मुझे पुलिस स्टेशन ले गए।
एक गंदी सी कोठड़ी में पड़ा हुआ था। रह रह कर मुझे गुस्सा आ रहा था कि क्यों खरीदा मकान, जब कि मुझे पता था कि इंडिया में तो यह आम बात है, किसी की प्रॉपर्टी पर कब्ज़ा कर लेना कोई बड़ी बात है ही नहीं। रात को मुझे पानी जैसी मसूर की दाल के साथ दो जली हुई रोटीआं दे दी गईं। किया करता, पेट तो भरना ही था, खा ली। आधी रात हो चुक्की थी, नींद नहीं आ रही थी, सोच का घोडा दूर दूर भाग रहा था लेकिन कोई मंजिल नहीं मिल रही थी। आँखें बंद किये बैठा था कि किसी के खांसने की आवाज़ सुनाई दी। आँखें खोलीं तो देखा मेरे सामने यमराज गब्बर चंद खड़ा था। हैरान हो कर मैंने पुछा, ” भाई, आज तो मैंने शराब भी नहीं पी, फिर तू यहां कैसे ?”, गब्बर चंद बोला, ” दोस्त ! तेरे साथ प्रेम सा हो गया है, यमलोक से कभी कभी तुझे देख लेता हूँ और आज तुझे यहां देख कर रहा नहीं गया और तुरंत चला आया “, तो भाई मुझे यहां से निकाल, बहुत परेशान हूँ “, मैं बोला। अब यमराज गब्बर चंद बोला, ” देख, अगर मैं तुझे ऐसे ही निकाल लूँ तो काम और भी खराब हो जाएगा, तेरा एक शरीर यहां ही रहेगा, तेरी रूह को भी एक और शरीर में तब्दील करके यहां से निकाल लूंगा और आगे की प्लैनिंग फिर करेंगे “, कुछ ही देर बाद हम उस कोठड़ी से बाहर थे। मैंने कहा, गब्बर चंद भाई, लोग तेरी यूनिफार्म देख कर हंस रहे होंगे, इस को ज़रा तब्दील कर लो। यमराज बोला, हम लोगों को कोई नहीं द्देख रहा क्योंकि हम अदृश्य हैं। अब मैं खुश हो गया और बोला, अब आगे की क्या रणनीति है। यमराज गब्बर चंद बोला, ” चल पहले तेरे मकान में ही चलते हैं “।
एक सैकंड में हम मेरे मकान के उस हिस्से में पहुंचे, यहां बड़ी बड़ी अल्मारीआं थीं, घर में सभी सो रहे थे। गब्बर चंद ने फूंक मार के एक अलमारी का ताला खोल दिया और मैंने सारे कागज़ जिनमें इस कम्बख्त ने मकान के जायली कागज़ात छुपा रखे थे, उठा लिए, फिर उस के बैंक अकाउंट ढून्ढ लिए और पासवर्ड भी। उस के ही कम्प्यूटर से मैंने उन का तमाम पैसा एक चैरिटी के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया। जो जो हेराफेरी उस ने अब तक की थी, उस की सारी इन्फर्मेशन टैक्स वालों को फॉरवर्ड कर दी। साथ ही मैंने सब कुछ अपने वकील को ऑन लाइन भेज दिया और साथ ही यह भी लिख दिया कि भाई ! पहले मुझे यहां से निकाल, बाद में सभ कुछ बताऊंगा। गब्बर चंद बोला, ” एक काम और कर, जिस जिस को इस ने घूस दी थी, उन के सबूत भी इकठे कर के मैजिस्ट्रेट को भेज दे। मैंने उस के कम्प्यूटर से ही सारी इन्फर्मेशन मैजिस्ट्रेट को भेज दी। अब गब्बर चंद बोला, ” तेरा सारा काम हो गया, ले तुझे तेरी काल कोठड़ी में ले चलता हूँ” । एक सैकंड में हम मेरी उसी जेल की कालकोठड़ी में थे। यमराज गब्बर चंद बोला, ” भाई, मैं अब चला क्योंकि मुझे अब बहुत रूहें लेनी हैं, तुझे जल्दी ही राहत मिल जायेगी और वापस इंगलैंड में अपने परिवार के साथ बेफिक्र हो के मज़े करेगा ”
गब्बर चंद चल गया और मुझे बहुत सकून मिल गया। सुबह उठा और चाय के साथ मुझे सूखी सी ब्रैड दे दी गई। देख कर गुस्सा तो बहुत आया लेकिन पेट का सवाल था, खा लिया। गर्मी बढ़ गई थी और पसीने से मेरे कपड़ों से बदबू आ रही थी। ऐसे ही दुपहर हो गई। एक थानेदार ने कोठड़ी का दरवाज़ा खोला और बोला, ” भैया जी, आप मेरे साथ आएं “, इस अजीब तब्दीली से मैं कुछ हैरान हुआ उस के पीछे पीछे चल पड़ा। जब मैं उस के ऑफिस में पहुंचा तो तरह तरह के खाने मेज़ पर रखे हुए थे। बड़े अदब से उस ने मुझे खाने के लिए कहा। हैरान हुआ मैं खाना खाने लगा। थानेदार बोलता जा रहा था, ” भैया मुझे बचा लो, मैने बहुत बड़ी गलती कर डाली है, घूस ले कर अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ा मार लिया है, मेरी नौकरी चलीं जायेगी, मेरी मदद कर दो, ज़िंदगी में फिर कभी ऐसा काम नहीं करूँगा, आप को आप के घर मैं खुद छोड़ने जाऊँगा ” और वोह मुझे अपनी जीप में बिठा कर मेरे गाँव में मेरे घर छोड़ आया। शहर के मकान का अभी मुझे बहुत विचार आ रहा था कि मेरी मिहनत सफल होगी भी या नहीं और यमराज गब्बर चंद ने भी हर तरह से मेरा साथ निभाया था। कुछ दिन बाद ख़बरों में आने लगा, ” एक शख्स ने एक ऐन आर आई के मकान पर जायली कागज़ात बना के कब्ज़ा किया, इस शख्स ने करोड़ों के घोटाले किये, ऐसे ही इस ने और मकान भी कब्ज़े में कर लिए थे, कुछ पुलिस वाले भी पकडे गए जो इस जालसाज़ी में इस के साथ थे, और तफ्तीश हो रही है ”
अब मुझे कुछ आशा हुई। एक दिन मुझे एक रेजिस्टर्ड लफाफे में मजिस्ट्रेट के ऑफिस से कुछ कागज़ आये, जिन में मेरे शहर के मकान की मलकियत के बारे में कागज़ात थे। मैं खुश हो गया और उसी वक्त शहर को चल पड़ा। जब मैं वहां पहुंचा तो कुछ निऊज़ रिपोर्टर मौजूद थे, उन के सवालों के मुक्तसर जवाब दे कर मैंने मकान का ताला खोला। मकान बिलकुल साफ़ किया हुआ था, देख कर तसल्ली हो गई। घर में नया फर्नीचर डाला, मन खुश था, फ्रिज से मैंने बियर की बोतल निकाली और मज़ा लेने लगा। अब कुछ कुछ नशा होने लगा था और साथ ही गब्बर चंद याद आने लगा, जल्दी ही मैं सो गया। सुबह उठा और मैं इंग्लैंड में ही अपनी बैड पे लेटा हुआ था। पत्नी साहिबा बोली, ” रात भर आप सोये सोये बोलते ही रहे, पहले तो कभी इतना बोले नहीं थे, अब किया हो गया था ?”, कमरे के इर्द गिर्द मैंने नज़र घुमाई और कुछ नहीं कह कर वाश रूम की तरफ चल पड़ा।

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.