देख तमाशा कुर्सी का

देख तमाशा कुर्सी का
घर में घमासान मच गया, बाप बेटे का द्वन्द हो गया।
अपनी अपनी पकेगी खिचडी, भण्डारा अब बन्द हो गया।

मै तो एक कुर्सी हूं
अलंकार न कोई मुझमें, फिर मेरी गजब की शोभा-
न मै रंभा, न मै मेनका, न मै उर्वसी जैसी हॅू
मै तो एक कुर्सी हूं

घर में घमासान मै कर दूं, रंक में अहंकार मै भर दूं,
रस से भरे है पाये मेंरे, मै तो सागर जैसी हॅू।
मै तो एक कुर्सी हूं

मेरी खातिर कौन लडेगा मेरा चेहरा कौन पढेगा।
परवाह नही है मुझको इसकी हूँ तन्हा पर बज्म के जैसी हूूूं।
मै तो एक कुर्सी हूं

विछडों को मै मिलवा देती, अपनों को मैं छुडवा देती।
तकदीर मुझको कोई माने, किसी के लिये समसीर जैसी हॅू।
मै तो एक कुर्सी हूं।

कई मालदार लडेगें, कई चौकीदार लडेगे।
किसके दामन में जाउंगी, अभी तो ‘राज’ जैसी हूं।
मै तो एक कुर्सी हूं।

राजकुमार तिवारी (राज)

परिचय - राज कुमार तिवारी (राज)

संवाददाता बाराबंकी उत्तर प्रदेश मो० 9984172782 इनका जन्म बाराबंकी जिले के जयचन्द्रपुर गांव के एक किसान के घर 1988 में हुआ था। इन्होने शिक्षा शास्त्र से परास्नाक की उपाधि प्राप्त की। इनको बचपन से ही लिखने का बड़ा ही शौख था, 15 वर्ष की आयु से ही इन्होने लिखना शुरू कर दिया था। 1998 से 2014 तक दूर दर्शन केन्द्र की मासिक पत्रिका से व लखनऊ से प्रकाशित होनेे वाली अन्य प्रत्रिका व समाचार पत्रों में भी स्थान प्राप्त किया। इनका कलम चलाने का सिलसिला अभी जारी है।