गीत/नवगीत

रक्षा बंधन पर्व पर एक गीत

अनमोल बड़ा है ये बंधन।
पावन रिश्ता रक्षाबंधन।

उमड़ उमड़ के मन है जाता।
जबजब रक्षा बंधन आता।
मन नेह दीप तब जल उठते।
यादों में तेरी जब घिरते।
भाई के मस्तक का चन्दन।
पावन रिश्ता रक्षाबंधन…….(1)

माना हम खूब लड़ा करते
आंखों से भी मोती झरते।
पल में यूँ रूठ दिखाना था।
इक़ पल में गले लगाना था
रोली मौली शुभ ये वंदन
पावन रिश्ता रक्षाबंधन….(२)

रेशम के कच्चे धागों में
मन प्रेम समर्पित रागों में
दुख में सुखदा का है सानी
रिश्ता होता ये नूरानी
हर मन का है *अनहद गुंजन*
पावन रिश्ता रक्षा बन्धन…..(3)

अनहद गुंजन गीतिका

 

गुंजन अग्रवाल

नाम- गुंजन अग्रवाल साहित्यिक नाम - "अनहद" शिक्षा- बीएससी, एम.ए.(हिंदी) सचिव - महिला काव्य मंच फरीदाबाद इकाई संपादक - 'कालसाक्षी ' वेबपत्र पोर्टल विशेष - विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व साझा संकलनों में रचनाएं प्रकाशित ------ विस्तृत हूँ मैं नभ के जैसी, नभ को छूना पर बाकी है। काव्यसाधना की मैं प्यासी, काव्य कलम मेरी साकी है। मैं उड़ेल दूँ भाव सभी अरु, काव्य पियाला छलका जाऊँ। पीते पीते होश न खोना, सत्य अगर मैं दिखला पाऊँ। छ्न्द बहर अरकान सभी ये, रखती हूँ अपने तरकश में। किन्तु नही मैं रह पाती हूँ, सृजन करे कुछ अपने वश में। शब्द साधना कर लेखन में, बात हृदय की कह जाती हूँ। काव्य सहोदर काव्य मित्र है, अतः कवित्त दोहराती हूँ। ...... *अनहद गुंजन*