डूबते जहाज के यात्रियों की मनोदशा, मरता क्या नहीं करता

यह कहानी मेरे परदादा ने मेरे दादाजी को सुनाई थी, दादाजी ने दादी को और दादी ने मुझे सुनाई थी, पूरी तो याद नहीं है, परन्तु किस्सा कुछ इसतरह का है. वह जहाज बहुत लम्बी यात्रा पर निकला था, उस जहाज का नया कप्तान यात्रियों और दूसरे जहाज़ों के कप्तानों की दृष्टि में भी कप्तानी के लायक नहीं था, अहंकारी भी था, बड़बोला भी था. वह वंश परम्परा के चलते कप्तान बना था. गलत निर्णय लेने में उसका कोई सानी नहीं था, चट्टान की दिशा में जहाज को ले जाता और चट्टान से टकराने जाने पर जहाज का नुक्सान होने पर वह अपनी गलती की बजाय समुद्री लहरों अथवा नेवीगेटर, यात्रियों या चट्टान की गलती बताने लगता. टकरा टकरा कर जहाज जर्जर सा होने लगा था, रिपेयर चाहता था. यात्रीगण जहाज की पुरानी साख और सुविधाओं के व्यामोह में अनुसरण करते थे. जहाज में कुछ शातिर किस्म के लफ्फाज लोग भी थे, उन्हें कुछ राज भी मालूम थे, ऐसा लोगों का कयास था, लिहाजा उन्हें ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं मिलें, इस बात का ख़ास ध्यान रखा जाता था. वे ठकुर सुहाती बातों में भी माहिर थे. वे और कप्तान के ख़ास साथी जहाज के ख़ास वर्ग के यात्रियों के देवी देवताओं का भी बार बार अपमान करते रहते थे. उनके पुरखों के बारे में अपमानजनक बातें भी सार्वजनिक रूप से शाम की पार्टियों में किया करते थे. उन्हें कप्तान की टीम सम्मानित करती रहती थी. कुछ लफ्फाज चित्रकारी करते समय देवी देवताओं के नग्न चित्र भी बनाकर अपनी चित्रकला को मनचीता बता कर सम्मान पा जाते थे. उस जहाज में अन्य मान्यताओं के भी लोग थे, कुछ तो तालियाँ बजाकर सुविधाएं पाने की हसरत पूरी कर लेते थे, परन्तु अनेक ऐसे भी थे, जो अपने साथी यात्रियों की मान्यताओं की रोज रोज की तौहीन से नासाज रहा करते थे. उन्हें बेहद बुरा लगता था, वे पूरीतरह इस तरह की हरकतों को गैरजरूरी और नाजायज मानते थे.

खैर, लफ्फाज लोगों की एक और खासियत थी कि वे सुविधाओं को हथियाने में तो माहिर थे ही बल्कि कप्तान भी सुविधाएं देकर खुद को उनके प्रति बेहद कृतज्ञ मानता था. लफ्फाजों की पत्नियां भी संशय में रहती थी की उनका पति विद्वान है या कि शातिर कामचोर. सभी मान्यताओं के यात्रियों की धर्मभीरू आस्थावान पत्नियां भी थी, वे अपने पतियों को चुपचाप रोषपूर्वक देखती रहती, मजबूरी के बावजूद पतियों की अन्तरात्मा उनको कचोटती थी, परन्तु उनकी मजबूरी भी जबरदस्त थी, जाएँ तो जाएँ कहाँ, वर्षों का साथ था. लफ्फाजों की पत्नियों में भी सदियों से अवचेतन मन में विराजित आस्था कभी कभी हिलोरें लेने लगती थी, परन्तु मजबूरी का नाम, चुप्पी ही था.

यात्रियों को एक दूसरे जहाज के बारे में भी पता चला था कि उसका कप्तान और उसके साथी व्यक्ति का सम्मान करते हैं. उसका कप्तान योग्यता से कप्तान है. अचानक एक बंदरगाह पर वही बहुत बड़ा जहाज आया, उस जहाज के कप्तान के ख़ास लोगों ने सहज ही डूबने की कगार पर जा पहुंचे जहाज के यात्रियों से मुस्कराकर हाल चाल पूछे. कुछ यात्रियों ने लालच भरी निगाहों से कप्तान के साथियों की तरफ देखा, इस उम्मीद से कि जगह हो तो हमें भी बिठा लो, लगे हाथ निवेदन भी कर डाला. कप्तान के साथियों ने मन्त्रणा की और सर्वे भवन्तु सुखिनः तथा वसुधैव कुटुम्बकम् के तहत उन्होंने इच्छित यात्रियों को बिठा लिया.

जहाज आगे तो बढ़ गए हैं, परन्तु देर सबेर अपने और अपने साथियों के देवी देवताओं के अपमान से आहत अन्य यात्रियों की मनोदशा और लालसा भी सुरक्षा और धार्मिक सम्मान पाने के लिए छटपटा सकती है. आस्था तो आस्था होती है, अवचेतन में सदैव विराजमान रहती है, मौके की तलाश में.

इसमें कप्तान की नासमझी, बार बार गलत निर्णय, बड़बोलापन तथा अयोग्य व अहंकारी मार्गदर्शक, यात्रियों में जीवन रक्षा का लालच, सुरक्षा, धार्मिक सम्मान और कुछ अन्य कारण शामिल होंगे केवल दूसरे जहाज के कप्तान और उसके चतुर साथियों को दोष देना यानी अपनी कमजोरियों को मजबूत बनाते रहना ही है.
कहानी सुनाने के बाद दादी ने कहा था कि सफलता चाहते हो तो दूसरे की आस्था का सदा सम्मान करना.