ग़ज़ल

दास्ताँ दर्दे दिल की सुनाते रहे।

वो हमें देख कर मुस्कराते रहे।

टूट करके बिखरने से क्या फायदा।
ये गलत है उन्हें हम सिखाते रहे।

जब कभी देखा गम़गीन मैने उन्हें।
आँख में अश्क अपने छुपाते रहे।

हम शिकायत करें भी तो किस से करें।
जब खुदा खुद ही मुझको सताते रहे।

याद में हम उन्ही के तो शायर बने।
गा सके ना ग़ज़ल गुनगुनाते रहे।

बेखबर को खबर हर पलों की जो थी।
इन पलों मे वो सपने सजाते रहे।

बेख़बर देहलवी

परिचय - बेख़बर देहलवी

नाम-विनोद कुमार गुप्ता साहित्यिक नाम- बेख़बर देहलवी लेखन-गीत,गजल,कविता और सामाजिक लेख विधा-श्रंगार, वियोग, ओज उपलब्धि-गगन स्वर हिन्दी सम्मान 2014, पूरे भारत मे लगभग 300 कविताओं और लेख का प्रकाशन