कविता मुक्तक/दोहा

वतन

उस वक़्त का इन्तजार है जब वतन में खुशहाली होगी, पतझर हो या सावन, हर मौसम हरियाली होगी, न दिन में तपन होगी,न रात काली होगी, हर दिन होली हर रात दिवाली होगी। हर दिल में देश का,इस चमन का सम्मान होगा, जहां भर की इबारतों में हिन्दोस्तां का नाम होगा, सोने चांदी के ख़्वाब […]

कविता

गौ सृष्टि का आरम्भ है

गौ सृष्टि का आरम्भ है •••••••••••••••••••••• गौ सृष्टि का आरम्भ है शुभारंभ है | गौ मानवता की पौशक है दानवता को हानिकारक है || हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई भेद न करती अपना अमृतमयी दुग्ध पिलाती | अन्त समय में वैतरणी पार लगाती || गौ-गायत्री-गीता और गंगा भारत की पहचान ये सब हैं ईश्वर का वरदान | रे […]

इतिहास

संतो के संत बाबूजी महाराज (भाग-१ )

आसाराम, रामपाल रामवृक्ष और अब एक नया राम राम रहीम ।  जहाँ चारों और ढोंगी बाबाओं की तूती बोल रही है वहीँ मुझे भी अपने गुरु शाहजहांपुर के रामचंद्र जी का नाम याद आया जो की एक उच्च कोटि के संत थे । लोग उन्हें श्रद्धावश बाबूजी कहकर बुलाया करते थे । संयोगवश उनके गुरु […]

सामाजिक

जानलेवा अंध भक्तों का खतरा

आज अंध भक्त युग चल रहा है। श्रद्धा, विश्वास और आस्था का मर्दन हो चुका है। भक्त के स्थान पर अंध भक्त काबिज हो गये है। इन अंध भक्तों के सिर पर मौत का जुनून संवार है। यह किसी भी हद तक जा सकते है। कुछ भी कर सकते है। ऐसी दीवानगी आजतक इससे पहले […]

उपन्यास अंश

इंसानियत – एक धर्म ( भाग – उन्तीसवां )

तरह तरह के कयास लगाते रामु काका पांडेय जी के साथ पेड़ के नीचे छांव में खड़े थे । चंद समय में पांडेयजी ने पूरी हकीकत ज्यों की त्यों रामु काका के सामने बयान कर दी थी । पूरी कहानी सुनने के बाद रामु काका ने निराशा भरे स्वर में कहा ” वैसे साहब ! […]

कविता

बाल कविता

गरम समोसा गरम जलेबी _________ पापा – पापा मोटूराम हलवाई की दुकान पर हमको ले जाओ गरम समोसा गरम जलेबी हमें खिलाओ || पापा – पापा देखो – देखो गोल – मटोल कितने सुघड़ समोसा लच्छेदार रसभरी जलेबी लाल – लाल || पापा – पापा हमें दिलाओ, मत कोरी बातों से हमको बहकाओ | चलो […]

कविता पद्य साहित्य

भूख

अंतरियाँ बच्चों की जब  कुलबुला उठती है रात्रि पहर  माँ दौड़ती है  सहेज कर रखे खाली  ढक्कन टूटे डब्बे की तरफ  जबकि वो जानती है  कुछ भी शेष नहीं है उसमें  कुछ बचे रह जाने के भ्रम के सिवा  वो बिलखते बच्चों के भूख से  हारती नहीं है रशीद कर देती है  दो चार थप्पर  […]

कविता पद्य साहित्य

बचपन

बचपन आज गली के मोड़ पर ठहरी गाड़ी में कुछ बच्चों को देखा, या यूँ कहूँ मैंने एक ठिठुरा – कैद बचपन देखा।। हाथों में न कंचे थे न थे गुल्ली डंडे वे मुझको जान पड़े कैद सुनहरे सपने।। उनमें से एक बाहर झाँक रहा था जैसे अपना खोया बचपन तलाश रहा था। एक के […]

गीत/नवगीत

गीत

  समझौते हैं, रिश्तों में अब कहाँ मिठास रही ? सिर्फ औपचारिकता है,अपनापन नही रहा । रिश्तों का जो बंधन है ,मनभावन नही रहा । पावन प्रेम की सुघर कल्पना बड़ी उदास रही । समझौतें हैं ……………………… अब मशीन हो गया आदमी ,रात नही होती । कई कई दिन तक अपनों से बात नही होती […]

सामाजिक

बाबा ……. रे बाबा

निर्भया जैसी बच्चियों के लिए संवेदना प्रकट करने वाले हमारे समाज के हितकारी लोगो को अचानक ऐसा क्या दिखाई दे जाता है कि राम और रहीम के नाम को कलंकित करने वाले एक पुरुष को महापुरुष मान कर भेड़ों की तरह झुण्ड में उपद्रव करते दिखाई दे रहे हैं। कहने भर को क़ानून व्यवस्था में […]