शिक्षक दिवस

आज 5 सितंबर है । आप लोग भलीभांति इस दिन से परिचित होंगे ही । आखिर क्यों न हो ? विद्यार्थी जीवन के वो विशेष दिन भला हम कैसे भूल सकते हैं ? जब हममें से ही कोई छात्र हमारा शिक्षक बन कर आता था विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए ।
शिक्षक ! जिन्हें हम आदर व सम्मान से गुरुजी अथवा बहिनजी कहते थे पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण के फेर में वो आज सर अथवा मैम हो गए हैं । बचपन में हम लोग मैम का मतलब कोई विदेशी बाला ही समझते थे ये और बात है कि आज का बालक गुरुजी और बहनजी का मतलब ही नहीं समझता ।
माता और पिता के बाद यदि कोई सम्माननीय व्यक्ति होता था तो वह हमारे गुरुजन होते थे । गुरु दो तरह के होते हैं । एक शैक्षणिक गुरु अर्थात अक्षर ज्ञान करा कर शिक्षित करने वाले गुरु और दुसरे गुरु होते हैं आध्यात्मिक गुरु अर्थात अध्यात्म का ज्ञान देकर आत्मा को परमात्मा से मिलाने का मार्ग प्रशस्त करने वाले गुरु । आध्यात्मिक गुरु की चर्चा तो हम गुरु पूर्णिमा के रोज बखूबी कर लेते हैं व उन्हें सस्नेह श्रद्धासुमन अर्पित कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं ।
आज शिक्षक दिवस है । आज हम चर्चा करते हैं माता व पिता के बाद हमारे भविष्य को संवारने के प्रति प्रमुख भूमिका निभानेवाले सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति ‘ शिक्षक ‘ की ।
5 सितंबर को ही शिक्षक दिवस क्यों मनाया जाता है ? चलो ! संक्षेप में यह भी जान लेते हैं । हमारा देश महापुरुषों का देश है जिनका अनुकरण करने की शिक्षा हमें दी जाती है । इनमें से ही एक डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जो पेशे से शिक्षक थे और भारत के राष्ट्रपति बनने तक का सफर तय किया था उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को मद्रास के नजदीक एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था ।
डॉ राधाकृष्णन स्वतंत्र भारत के प्रथम उप राष्ट्रपति तथा द्वितीय राष्ट्रपति थे । डॉ राधाकृष्णन का सम्पूर्ण जीवन शिक्षा के प्रति समर्पित था । उनकी सेवाओं को देखते हुए उन्हें भारत रत्न के सरवोच्च नागरिक सम्मान से भी नवाजा गया है । उनके विद्यार्थी उनका जन्मदिवस बड़े उत्साह से मनाना चाहते थे । उन्होंने अपनी इच्छा प्रकट की ,यदि आप लोग मेरा जन्मदिवस मनाना ही चाहते हैं तो इस दिन ऐसा करें जिससे शिक्षकों का सम्मान बढ़े । और तब से ही अर्थात 5 सितंबर 1962 से ही प्रति वर्ष इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा । इस दिन शिक्षा के प्रति उनके समर्पण व सेवाभाव को याद करने के साथ ही इस अनुकरणीय प्रसंग को याद कर शिक्षक व विद्यार्थी के बीच आत्मीयता व सम्मान के रिश्ते को भी याद किया जाता है ।
कहते हैं बालक अगर मिट्टी की लोई है तो शिक्षक उस मिट्टी की लोई को सुंदर बर्तन के रूप में गढ़ने वाला कुम्भार है । इस कथन को आप कबीर जी के दोहे से भलीभांति समझ सकते हैं । उन्होंने लिखा है ‘ गुरु कुम्भार शिष्य कुम्भ है , गढ़ गढ़ काढ़े खोट । अंदर हाथ सहाय दे , बाहर बाहे चोट ।।
जिस तरह मिट्टी की लोई को सही आकार देने के लिए कुम्भार जहां एक हाथ से मिट्टी को काटकर उसे अपेक्षित रूप देता है वहीं दूसरे हाथ से उसे अंदर से सहारा दिए रहता है । उसी तरह एक योग्य शिक्षक अपने विद्यार्थी का सार्वत्रिक विकास करने के लिए कभी कभी उससे कठोरता से भी पेश आता है । कहा भी गया है बिना चोट खाये कोई भी बर्तन अपनी वर्तमान रूप को प्राप्त नहीं करता है उसी तरह से शिक्षक की डांट फटकार भी शिष्य के उज्ज्वल भविष्य के लिए अति आवश्यक है । विद्वत्ता व उत्तम चरित्र सफलता की सीढ़ियां चढने के लिए अति आवश्यक हैं । और यह गुण देने की क्षमता सिर्फ एक योग्य गुरु में ही है । गुरु की महिमा का बखान कबीरदास जी ने अपने दोहों में बखूबी किया है । अपने एक दोहे में तो उन्होंने गुरु को भगवान से भी ऊंचा दर्जा दे दिया है । आपको याद ही होगा कबीरदासजी का वह लोकप्रिय दोहा ‘ गुरु गोबिंद दोउ खड़े ……..।
तीन चार दशक पहले तक गुरुओं अर्थात शिक्षकों का सम्मान विद्यार्थियों के साथ ही उनके पालक भी किया करते थे । शिक्षक का पेशा समाज में सम्माननीय था । शिक्षक अपनी गरीबी में भी मिले हुए सम्मान के सहारे पुरी तत्परता से व कर्त्तव्य परायणता का बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए हर तरह से अपने छात्र का भविष्य गढ़ने के लिए प्रयत्न शील रहता था । छात्र भी कई बार दंडित किये जाने के बावजूद शिक्षक के लिए कभी भी अपने मन में अनादर का भाव नहीं आने देते थे । लेकिन आज ऐसा नहीं है । दुर्भाग्य से परिस्थितियां बदल गयी हैं । आज शिक्षा का व्यवसायीकरण हो चुका है । जहां पहले शिक्षक विद्यार्थियों की शिक्षा के साथ ही उनका चरित्र गढ़ने के साथ उनका सर्वांगीण विकास करने का काम भी बखूबी करते थे आज के शिक्षक विद्यार्थी को परीक्षा में अधिक अंकों से कैसे उत्तीर्ण हों इतना सुनिश्चित करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं । विद्यार्थी और पालक भी किसी भी तरह से अधिक अंक पाने को लालायित रहते हैं चाहे ज्ञान मिले या ना मिले । इसी चक्कर में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच कोचिंग क्लासेस के रूप में एक नया रिश्ता जन्म लेता है । इस रिश्ते में सम्मान व आदर न विद्यार्थी के मन में होता है और न शिक्षक के मन में ही विद्यार्थी के प्रति ममता ,स्नेह या कोई भावनात्मक लगाव होता है । यहां गुरु और शिष्य के रिश्ते का शुद्ध व्यवसायीकरण हो चुका होता है । आप सभी जानते हैं व्यवसाय भावनाओं से ऊपर होता है ।
ऐसी शिक्षा विद्यार्थियों का अंक प्रतिशत तो बढ़ा सकती है लेकिन उनका सर्वांगीण विकास कर उन्हें एक अच्छा इंसान , एक अच्छा नागरिक नहीं बना सकती । पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण करते हुए अपने सामाजिक मूल्यों से विमुख ,दूर होते जा रहे हैं और परिणामतः हमारा समाज अधोगति की तरफ जा रहा है । कहने को तो हम विकास कर रहे हैं आधुनिकता का दम भर रहे हैं लेकिन अपने सामाजिक मूल्यों का नैतिक पतन भी हम देख रहे हैं । चारित्रिक पतन की परिणीति समाज में बढ़ रहे नित नए अपराधों व दूषित माहौल के रूप में सामने आ रहा है ।
शिक्षक दिवस के इस शुभ अवसर पर आज हम सब संकल्प लें कि हम समाज को शिक्षित करने के साथ ही उनके चरित्र निर्माण का भी प्रयत्न करें तब हमारा समाज भयमुक्त , अपराधमुक्त हो सकेगा और हमारा देश सुजलाम सफलांम हो सकेगा ।
शिक्षक व विद्यार्थियों के बीच वही पुराना आदर सम्मान व प्रेम स्नेह का भाव फिर से अंकुरित होने की आवश्यकता है ।

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।