Monthly Archives: September 2017

  • “दोहा मुक्तक”

    “दोहा मुक्तक”

    भूषण आभूषण खिले, खिल रहे अलंकार। गहना इज्जत आबरू, विभूषित संस्कार। यदा कदा दिखती प्रभा, मर्यादा सम्मान- हरी घास उगती धरा, पुष्पित हरशृंगार॥-1 गहना हैं जी बेटियाँ, आभूषण परिवार। कुलभूषण के हाथ में, राखी का त्यौहार।...


  • बे  – रूखी

    बे – रूखी

    शक़्ल दिल  की  गवाह  नहीं  होती रौशनी    हर   जगह   नहीं    होती कुछ ना  कुछ तो गलत हुआ होगा बे –  रूखी   बे – वजह  नहीं  होती

  • दद्दा ज़ी

    दद्दा ज़ी

    हमारे गांव के बगल में एक दद्दा जी है जो स्वभाव से अक्खड़ और घोर राष्ट्रवादी. ८७ साल उम्र होने के बावजूद चेहरे पर वही चमक और सिंह के दहाड़ जैसी आवाज. दिन भर गाय भैंस...

  • कविता

    कविता

    परिंदा आकाश में चाहे जितना ऊंचा उड़ ले दाना चुगने उसे जमीन पर आना ही पड़ता है आसमान में उड़कर तो तारे हाथ नहीं आते मोती पाने के लिए गहरे समुद्र में जाना ही पड़ता है...



  • मुक्तक – हौसला

    मुक्तक – हौसला

    रेत की दीवार पर महल बना सकता हूँ, बहते पानी पर लिख कर बता सकता हूँ। मेरे हौसलों का अहसास नही है तुमको, बिना पंख के भी उडकर दिखा सकता हूँ। — अ कीर्तिवर्धन

  • कविता — हदें

    कविता — हदें

    हदें निर्धारित हैं नदी की, नहर की, तालाब व समंदर की, और स्त्री-पुरुष की भी। मगर जब टूटती हैं हदें बरसात में नदी-नहर पोखर या समंदर की आती है प्रलय और कर जाती है सर्वस्व विनाश।...