सामाजिक

अपनी वास्तविक इच्छाओं को जांचे और परखे

इच्छा, आकांक्षा मनुष्य की प्रेरणा स्त्रोत है इच्छाएं है तो मनुष्य कर्म की और अग्रसर होता है | इच्छाएं नया जोश नई प्रेरणा का संचार मनुष्य के अंदर करने के साथ-साथ समाज में उसका स्थान भी निश्चित करती है लेकिन जब ये इच्छाएं आकाँक्षायें विकृत हो जाती हैं तो सम्पूर्ण जीवन को अशाँति तथा असन्तोष […]

इतिहास

दिव्यांगों के आदर्श – श्री बच्चू सिंह (भाग 6 अंतिम)

विभाजन के समय आंतकवादियों पर कड़ाई और जरूरतमंदों का सहयोग करने से बच्चू सिंह की लोकप्रियता बढ़ती गई, इससे नेहरू और माउण्टबेटन को खतरा लगने लगा। नेहरू ने पटेल को पत्र लिखकर बच्चू सिंह के खिलाफ कार्यवाई की मांग की। गाँधी हत्या के बाद जब भरतपुर के राजा बृजेन्द्र अपने सहयोगियों के साथ रियासती क्षेत्रों […]

कविता

कविता- ख्वाब तेरे

कितने दिनों बाद दिखे तुम ,कहां थे तुम न कोई खत न कोई खबर कही और तय कर रहे थे सफर दिन रात तुम्हे ही याद किया न जाने कितना इंतजार किया वो भुला दी बाते मैंने जब तुम नाराज हुए थे मगर अब मान भी जाओ जरा कितना तन्हा वक़्त गुजरा है तेरे बिन […]

गीतिका/ग़ज़ल

“गीतिका”

छंद – “विष्णु पद ” (सम मात्रिक )मापनी मुक्त, शिल्प विधान – चौपाई +10 मात्रा ।, 16,10 = 26 मात्रा ।, अंत में गुरु गुरु अनिवार्य खुलकर नाचो गाओ सइयाँ, मिली खुशाली है अपने मन की तान लगाओ, खिली दिवाली है दीपक दीपक प्यार जताना, लौ बुझे न बाती चाहत का परिवार पुराना, खुली पवाली […]

सामाजिक

लेख– लोकतंत्र, चुनाव और मीडिया

आज के दौर की सामाजिक स्थिति को देखकर लगता है। क्या आज़ादी बाद चुनाव मात्र सिंहासन बदलने भर की रवायत बनकर रह गया है, क्योंकि जो असन्तुलन की खाई समाज और राजनीति के बीच पनप रही है। उसको भरने की बात लोकतंत्र में होती दिखती नहीं। वहीं देश में मुख्यधारा की मीडिया में बाज़ारवाद की […]

सामाजिक

लेख– कैसा समाज बना रहें हम, जिसमें बहन-बेटियां सुरक्षित नहीं

कैसा समाज बना रहें हैं। जिसमें न दुर्गा स्वरूपा मां सुरक्षित है, न कन्यापूजन के लिए घर हर घर में नवरात्रि में पूजी जाने वाली कन्या। यहां तक हिंदू मान्यता के अनुसार कहते हैं, मासूमों के ह्रदय में ईश्वर का निवास होता है। समाज की दरिन्दगी से पीड़ित वो मासूम बच्चियां भी हैं। फ़िर क्या […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : मेरी रूह

तेरा मिलना कितना सुहाना लगता है मुझसे रिश्ता सदियों पुराना लगता है… देखा जब से तेरे आँखों में सनम दिल इश्क़ में दीवाना लगता है…  फ़िज़ा में फूल बिखरे चाहत के मौसम-ए-बहार मस्ताना लगता है.. दरम्यां लाख़ फ़ासले तेरे-मेरे दिल में आशियाना लगता है… दर्द-ए-इश्क़ से राहत मिलती वफ़ा में दिखे परवाना लगता है… लब […]

कविता

दीपक का अहंकार

अकड़ दीप की देख के मैंने, प्रश्न एक जब उससे पूछा- “किस कारण तू झूम रहा है, किए हुए सिर अपना ऊँचा?” मस्त पावन के झोंकों के संग, उसने अपना अंतस खोला कुछ मुसकाया, कुछ इठलाया, फिर वह यह हौले से बोला- “तूफानों की गोद में मैं टीएम, जनम-जनम से हँसता आया अँधियारों ने घेरा […]

कविता

मुझे मेरा बचपन लौटा दो

दिलो में बसे बचपन के यार लौटा दो माँ का प्यार पिता का दुलार लौटा दो बाल्यकाल  की वो  मस्ती   लौटा दो हे भगवान मुझे मेरा बचपन लौटा दो   तनाव के दौर में मन की शांति  लौटा दो चंदा मांमाँ की कहानी फिर से सुना दो दादा दादी के एक बार दर्शन करा दो […]

सामाजिक

लेख– क्या लोकतंत्र में चुनाव का मतलब सिर्फ़ सत्ता की चाबी हो गया है?

आज के दौर की सामाजिक स्थिति को देखकर लगता है। क्या आज़ादी बाद चुनाव मात्र सिंहासन बदलने भर की रवायत बनकर रह गया है, क्योंकि जो असन्तुलन की खाई समाज और राजनीति के बीच पनप रही है। उसको भरने की बात लोकतंत्र में होती दिखती नहीं। आज भी देश में जाति-धर्म की राजनीति जनसरोकार के […]