कविता

मुझे मुझसे मिलने दो
खुद से उलझकर
फ़िर सुलझने दो
कोई रोक नहीं पायेगा
जब भरुंगी लंबी उडान
खुद का सहारा बनकर
नये पंख लगने दो
ये जो काले बादल
घुमड घुमड़ करके आ गये
इनके पीछे छुपा
आसमानी एक जहां
मुझे बुलाता है नूतन
तुम हो यहीं हो
यहीं कहीं, चारों ओर
मिलो तो खुद से
ढून्ढो अपने आप को
बिखरी हुई सी घूमती तुम
खुद को समेटो जरा !

परिचय - जयति जैन 'नूतन'

=परिचय- पूरा नाम- DRx जयति जैन उपनाम- शानू, नूतन लौकिक शिक्षा- डी.फार्मा, बी.फार्मा, एम. फार्मा (रिसरचर) वर्तमान लेखन-= सामाज़िक लेखन, दैनिक व साप्ताहिक अख्बार, पत्रिकाएं चहकते पंछी ब्लोग, साहित्यपीडिया, शब्दनगरी व प्रतिलिपि वेबसाइट पर पता - = जयति जैन c/o डा. प्रमोद कुमार जैन पारस होस्पिटल बस स्टैंड रानीपुर जिला झांसी उ.प्र. 284205