टाई और धोती

वो बालों में तीसरी बार कंघी फेर रही थी, मगर फिर भी संतुष्ट नहीं थी। एक ओर के बाल उसे उठे-उठे लग रहे थे। उसने बालों में लगा छोटा सा क्लिप फिर खोल दिया। सिर के बीचों-बीच बंधे चुटकी भर बाल फिर छूट कर कानों के पास आ गिरे। उसने शीशे में ताकती अपनी ही आँखों से सवाल किया कि पिछली बार भी इतनी ही तन्मयता से तैयार हुई थी न और क्या हुआ?
उसके नथुने फूल गए और उसने कंघी को हवा में छड़ी की तरह दिखाते हुए आईने के उस पार बैठी सुप्रिया को दाँत कटकटाते हुए कहा – “मुँह बंद नहीं रख सकती थी। अपने गुस्से पर ज़रा भी काबू नहीं है तेरा|”
उसने देखा यह सुनकर उसकी आँखें पिछले हफ्ते का वाकया याद कर उदास हो आईं। सामने रखी नग जड़ित छोटी सी क्लिप चमचमा रही थी। सुप्रिया ने उसे देखा और याद किया कि उसने इसे पिछले हफ्ते ही खरीदा था ताकि जब उसे लड़के वाले देखने आएँ तो वह अपनी मेहरूनी अनारकाली पर इसे पहन सके। उसके पापा को लगता था कि बैंक में पी.ओ. बनने के बाद उसके लिए रिश्तों के लिए लाइन लग जाएगी। मगर जल्द ही यह भ्रम टूट गया।
उस दिन एक और भ्रम टूटा। पापा तो पापा बिटिया को भी लगता था कि दहेज जैसी चीज़ अब दकियानूसी हो चुकी है। टी.वी. पर ये जो दहेज के नाम पर हाय-तौबा मची रहती है सब बकवास है। पापा का तो यहाँ तक सोचना था कि हर महीने कमानेवाली बहू के लिए भला कोई दहेज जैसी एकबारगी राशि की माँग क्यूँ करेगा।
एक बड़े ट्रे में महकते समोसे और चाय लेकर जब सुप्रिया ने बैठक में कदम रखा था तो उसने महसूस किया कि लड़के की माँ की नज़र समोसों पर और लड़के की उस पर थी, बाक़ी लड़के के पिता जी तो अभी भी पापा से अपने लड़के का बखान करते नहीं थक रहे थे।
सुप्रिया ने तुरंत नज़रें नीची कर लीं थी और किसी स्लोमोशन पिक्चर की तरह चलने लगी थी। दिल में ऐसे नगाड़े तो तब भी नहीं बजे थे जब उसने अपने बैंक के बड़े-ब‌ड़े दिग्गजों के सामने अपना पर्चा पढ़ा था। मौद्रिक नीति पर उसके ज्ञान की कितनी वाह-वाही हुई थी।
वो उपलब्धि और ही थी, ये उपलब्धि कुछ और ही होगी। वो बैठी रही, बैठी रही। क्या हो रहा था उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। लड़के की माँ के आधे सवाल समझ आ रहे थे बाकि दिमाग के किसी तल में जाकर खो से जा रहे थे। जाने क्या समझ रही थी और जाने क्या जवाब दे रही थी।
चाय खत्म हुई। समोसा खत्म हुआ। होनेवाली सासु माँ के सवाल भी खत्म हो गए। अब? अब क्या? अब तो असली बातें होंगी।
“अब ऐसा है जनाब कि हमने अपने लड़के की पढ़ाई पर बहुत ख़र्चा किया है। वैसे तो मुझे पूरा भरोसा है कि आप जो देंगे… अपनी बेटी को देंगे… सोच समझकर ही देंगे..”
सुप्रिया ने ज़रा सा नज़र उठाकर उन अंगूठियों से भरी ऊँगलियों को देखा जो सोफे के हाथ पर ताल दे रही थीं मगर नज़र और ऊपर उठाकर उस चेहरे को देखने की हिम्मत नहीं जो ये हिकारत भरे शब्द कह रहे थे।
चाय की खाली प्याली पर टिकाई हुई सुप्रिया की निगाहें एकदम फैल गईं जब उसने अपने सिर झुकाए पापा को धीरे से ‘हूँ’ कहते हुए सुना। उसकी आँखों के सामने अब प्याली नहीं थी बल्कि वो सारे पल घूम रहे थे जब अपने रिश्तेदारों के मना करने के बावजूद उसके पापा उसे पढ़ाते चले गए थे। वो सारे पल जब घर की ज़रूरतों में कटौती कर उसके ट्यूशन और बैंक पी.ओ. की कोचिंग के लिए पैसे इकठ्ठे किए गए थे।
“वैसे तो आप काफ़ी समझदार हैं रवि बाबू, मैं तो बस आपकी जानकारी के लिए बता रहा था कि अब अफसर की शादी तो अफसर की तरह होनी चाहिए न।”
सुप्रिया ने इस बार नज़र उठाकर कर देखा। भरा-भरा चेहरा, इतना भरा कि गाल गालों के लिए बनी हड्डी से बाहर लटकने लगे थे। गर्दन कहाँ खत्म होती थी और कंधा कहाँ शुरू, कुछ पता ही न लगता था। उस पर तलवार कट मूँछों को ताव देते हुए पापा की आँखों में बड़ी ही उपेक्षा से देख रहा था।
अगले ही पल सुप्रिया के अंदर आवाज़ गूँजी – ‘ससुर लगते हैं बेवकूफ़, नज़र नीची कर।’ लज्जावश नज़र तुरंत नीची हो गई। सुप्रिया के सामने वे सारे टी.वी. सीरियल घूमने लगे जिसमें दहेज की कहानियाँ देखकर वह हँस दिया करती थी और सोचती थी कि ज़माना कहाँ से कहाँ बढ़ गया है और ये टी.वी. वाले हैं कि पिछड़ी हुई बातों पर किस्से बना-बनाकर दिखा रहे हैं। अब कहाँ कोई दहेज लेता या देता है। सब बकवास की बाते हैं।
सुप्रिया जानती न थी कि ज़िन्दगी हमें इसी प्रकार बड़ा करती है। एकदम सी मामूली या रूढ़ी दिखने वाली बातें अपने विकराल रूप में सामने आकर खड़ी हो जाती हैं और हम भौचक्के से अपने अबतक के ज्ञान को ठगा-सा, ठिगना-सा पाते हैं।
पीठ पीछे सोफे पर टिकाते और सीना आगे की ओर तानते हुए फिर अम्ल वर्षा की।
“ऐसा है रवि बाबू, कि आजकल का तो आपको पता ही है। कोई भी सरकारी नौकरी इतनी आसानी से तो मिलती नहीं है। हाथ गरम करना ही पड़ता है। वो भी सरकारी अफसर तो, बात ही क्या पूछिए। फिर आप बड़े भाग्यवान है सरकारी दामाद ….”
इस अम्ल वर्षा से दग्ध सुप्रिया की इस बार त्यौरियाँ चढ़ गईं। लाख न चाहते हुए भी उसने अपनी आँखें उन जनाब की आँखों पर थोप दीं। और दाँत पीसती हुई, तने हुए जबडों के साथ उसने एसिड की पूरी नदी बहा दी।
“आपने अपना लड़का क्या मेरे पापा के भरोसे पैदा किया था?”
लड़के का पिता किसी चोट खाए हुए साँप की तरह फुँफकारने लगा। मगर लड़की के मुँह लगना वो अपनी शान के खिलाफ समझता था। उसने सुप्रिया के पिता की ओर मुखातिब होकर अपनी भड़ास निकाली।
“यही शिक्षा दी है आपने अपने बच्चों को? यही संस्कार हैं इस घर के?”
इस बार पापा ने ‘हूँ’ नहीं कहा? क्यों? पता नहीं? बल्कि खड़े होकर हाथ जोड़ लिए और फिर बाहर का रास्ता दिखा दिया। मगर बोले कुछ नहीं। सुप्रिया के कंधे पर हाथ रख जाते हुए लड़के वालों को देखते रहे और सुप्रिया ने भी नज़र गड़ाकर पहली बार लड़के और उसकी माँ को देखा। दोनों के मुँह सूजे हुए थे और हिकारत भरी नज़रों से उसे देखते हुए बाहर निकल गए।
सुप्रिया ने सामने रखी क्लिप फिर से लगाई और क्लिप से नीचे के बालों पर चौथी बार कंघी फेरी। कंघी फेरती-फेरती वह फिर खो गई। उस दिन जो हुआ उसके लिए किसी फिल्मी ड्रामा से कम न था। मगर असली फिल्मी ड्रामा तो उसके बाद हुआ।
उस समय तो पापा कंधे पर हाथ रखकर लड़केवालों को बड़ा घूर-घूर के देख रहे थे। साथ में मम्मी भी उनको आँखें तरेरकर दिखा रही थीं। मगर बाद में तो सबने सुप्रिया की ही बैंड बजा डाली।
रात में माँ पिल पड़ी। लड़की को ऐसे नहीं बोलना चाहिए। जो बोलना होता वो पापा बोलते। सुप्रिया ने मन ही मन मुँह बनाया कि अच्छी तरह देख लिया की क्या बोलते। लड़की हो लड़की तरह रहना चाहिए। बड़ों के बीच में बातें हो रही थीं तो बीच में बोलने की क्या ज़रूरत थी।
किचन से समोसे तलने की खूश्बू आ रही थी। मतलब मम्मी ने लड़केवालों के लिए नाश्ता लगभग तैयार ही कर लिया है। सुप्रिया ने ड्रेसिंग टेबल का ड्राअर खींचा और वहाँ रखे बिंदी के पत्तों को एक-एक कर ऊँगली से अलग करती गई। सब चमकदार नग वाली डिजाइनर बिंदियों को छोड़ उसने एक बहुत ही छोटी, सादी सी रंगीन बिंदियोंवाला पत्ता निकाल लिया। एक मेहरूनी बिंदी माथे पर लगाते हुए उसने अपनी लाल आँखें देखीं।
कल रात की तरह उस रात भी कोई नहीं सोया था। जब माँ शिष्टाचार का पोथा पढ़ा रही थी तो पास टहल रहे पापा ने अपनी चिंता व्यक्त करनी ज़रूरी समझी।
“ऐसी बातें आग की तरह फैलती हैं। इससे पहले कि सबको इस बात का पता चल जाए, अब जल्द से जल्द नया लड़का ढूँढना पड़ेगा। पहले ही पढ़े-लिखे-कमाऊँ लडकों का अकाल है।”
सुप्रिया ने बिंदी का पता वापस पत्तों में खोसते हुए सोचा कि हो न हो पापा ने जो अपनी बिटिया के लिए सरकारी दामाद ढूँढने का मापदंड बनाया था वो तोड़ दिया है। तभी तो आज एक प्राइवेट कंपनी का इंजीनियर आ रहा है। आख़िर हम दो ही चीज़ों में सरकारी चीज़ पसंद करते हैं, नौकरी में और दामाद में। काश स्कूलों, अस्पतालों, संस्थानों, संगठनों में भी सरकारी चीज़ें इतनी ही आकर्षक होतीं।
ड्राअर को लगभग पूरा बाहर खींचते हुए उस पर झुकी हुई सुप्रिया आई लाइनर खोज रही थी कि किसी ने पीछे से उसका क्लिप खोल दिया। सुप्रिया ने चौंककर शीशे में देखा तो प्रीती थी।
“आजकल खुले बालों का फैशन है। तू क्लिप क्यों लगा रही है पागल।”
ये प्रीती है। ज़रूर मम्मी ने बुलाया होगा। प्रीती का रिश्ता पहली दफा में ही तय हो गया था। कभी पूछा ही नहीं कि कैसे तय हुआ? क्या-क्या बातें हुईं? कुछ डिमांड्स थीं क्या? कैसे हैं ससुराल वाले? अब पूछने का बहुत मन हो रहा है। लेकिन अब तो बहुत देर हो गई है। लड़के वाले आते ही होंगे।
इतना तो पता है कि प्रीती पढ़ाई बीच में ही छोड़कर कॉन्स्टेबल हो गई। शादी के बाद ससुराल के पास वाले थाने में ही पोस्टिंग हो गई। प्रीती टचअ‍प कर रही थी और सुप्रिया सोच रही थी कि ये अब थाने में कम घर पर ज़्यादा रहती है और आदर्श बहुओं में टॉप पर आती है क्योंकि सैलरी भी लाती है और घर भी संभाल लेती है। शायद साइन करने थाने चली भी जाती है या पता नहीं। खैर।
“ये क्या बिंदी लगाई है? लड़के वाले माइक्रोस्कोप से भी देखेंगे तो नहीं दिखेगा। और कोई बिंदी नहीं है क्या?”
सुप्रिया ने अच्छी बच्ची की तरह ड्राअर खोल दिया। ड्राअर के एक किनारे करीने से लगाई बिंदियों के सारे पत्तों को अँगूठे और तर्जनी के बीच उठाकर प्रीती ने बिस्तर पर बिखेर दिया। सुप्रिया शीशे में उसे बिंदी चुनते हुए देखती रही। तभी मम्मी ने एंट्री ली।
“बेटा बहुत समय से आई हो। ज़रा सुप्रिया को तैयार कर दो। लड़के वाले आ चुके हैं। इसे नाश्ता ले जाने के लिए भेजो तो। नहीं तो ठंडा हो जाएगा।”
“बस हो गई आंटी जी। रेडी ही है।”
प्रीती ने एक ए.डी. जड़ी मेंहदी बिंदी निकालकर सुप्रिया के माथे के बीचोंबीच चिपका दी। इस बार सुप्रिया ने मुँह खोल ही दिया।
“अरे यह तो मेहरूनी नहीं है।”
“कॉन्ट्रेस्ट कलर लगा। देख तुझे कितना सूट कर रहा है।”
मम्मी ने सुप्रिया को लंबा सा बड़ा ट्रे पकड़ाया तो उसने देखा इस बार समोसे के साथ दो-तीन प्रकार के नमकीन और रखे गए हैं। जैसे पिछली बार वालों को यह सब नहीं खिलाया था इसलिए नाराज़ हो गए थे।
“हाँ। अबकी अच्छी लग रही है।”
सुप्रिया ने सोचा कि पिछली बार कोई और थी क्या और इस बार मैं नहीं कोई और ही पकड़ लाए हैं क्या? या शायद कोई और हूँ ही। ये मुँह सिली हुई मैं तो नहीं हो सकती।
खैर। सुप्रिया ने फिर से स्लो मोशन में कदम बढ़ाया। फिर सबको नाश्ता देकर अपनी पिछली मुद्रा में सिर झुकाकर बैठ गई। दाएं हाथ की मुठ्ठी बाईं हथेली में लपेट टेबल का कोना घूरने लगी।
फिर उन्हीं सवालों का दौर शुरू हुआ।
“क्या-क्या पढ़ी हो बेटा?”
सिर झुकाए ही झुकाए सुप्रिया ने जवाब दिया –“एम.एससी एकोनोमिक्स और बैंकिंग से एम.बी.ए.।”
“अच्छा। बैंक में हो तो कंप्यूटर भी चला लेती होगी। मेरी गिन्नी तो हमेशा कंप्यूटर पर ही लगी रहती है।”
सुप्रिया ने पहली बार महसूस किया कि कमरे में शायद कोई और लड़की भी थी जिसकी बात हो रही थी। मगर वो कैसे समझाए कि कंप्यूटर पर लगे रहने के कई कारण हो सकते हैं। जैसे वो दिनभर ऑफिस के कंप्यूटर पर और बगल वाली पान की दुकान वाले चुन्नूलाल फिल्में देखने के लिए कंप्यूटर पर। इसका कंप्यूटर की निपुणता से कोई लेना देना नहीं है। खैर! उसने कोई जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा। वैसे भी सवाल करने के बाद जब अपनी बेटी की तारीफ में लग गईं तो फिर जवाब की अपेक्षा भी खत्म हो गई।
“स्कूटी वगैरह चला लेती हो? अगर घर का सामान-वगैरह लाना हो?”
इसमें कोई शक नहीं था। खुशी से हामी भरी। सुप्रिया को खुशी हुई कि उसका हुनर कहीं तो काम आ रहा है। पहले कम्प्यूटर और अब स्कूटी की बात हो रही है। मगर ये खुशी अगले ही सवालों के साथ गायब हो गई।
सुप्रिया ने महसूस किया कि अगला सवाल पूछने से पहले उसकी होनेवाली सासु माँ की नज़रों ने उसे अच्छे से स्कैन किया है।
“साड़ी पहन लेती हो?”
सुप्रिया थोड़ी सकपका गई क्योंकि इस बार लहज़ा थोड़ा आदेशात्मक था और ‘बेटा’-‘बेटी’ जैसे मुलायम शब्दों का भी लोप हो चुका था। दूसरी बात यह भी थी कि सुप्रिया को सच में ठीक से साड़ी पहननी नहीं आती थी। अबतक कई प्रोग्रामों में उसने साड़ी पहनी तो थी मगर पार्लरवाली की कृपा से ही।
उसने दिल की धड़कनों पर काबू रख कर एक सेकेंड के लिए दिमाग़ पर ज़ोर लगाया। यदि तगड़ी कोचिंग से वह आईबीपीएस की परीक्षा पास कर सकती है तो क्या पार्लरवाली की थोड़ी सी कोचिंग से साड़ी पहननी नहीं आ सकती। भले ही उसमें एक महीने की सैलरी लग जाए मगर अब वह सीखेगी ज़रूरी।
सुप्रिया ने झुके हुए सिर को हिलाकर हामी भरी।
“खाना बनाना? एक परिवार का खाना बना लेती हो?”
सुप्रिया की नज़रों के सामने अपने किचन की वो दुर्दशा घूम गई जो उसने अपने एकाध प्रयासों के दौरान किए थे। फल्स्वरूप मम्मी ने उसके लिए किचन निषेध क्षेत्र घोषित कर दिया था।
उसने एक और सैलरी को मन ही मन तिलांजलि देते हुए फिर हामी भरी।
“ख़ैर आजकल तो बहुत कुछ यूट्यूब से भी सीख लेते हैं। वैसे पूजा-पाठ करती हो?”
इसके लिए सैलरी की ज़रूरत नहीं है। दो-चार आरतियाँ तो उसने इक्ज़ाम की तैयारी के दौरान ही याद कर लीं थीं। इक्ज़ाम की तैयारी के दौरान? और नहीं तो क्या, इक्ज़ाम सिर्फ अपने टैलेंट से थोड़े न क्लीयर होते हैं। थोड़ा तो लक भी साथ देना चाहिए। उसके लिए कुछ पूजा-पाठ भी ज़रूरी है।
इस बार सुप्रिया ने हवा में माथा दाएं-बाएं लहरा-लहरा के हामी भरी ताकि कोई शक न रह जाए।
उन माताश्री ने पीठ वापस सोफे पर टिकाते हुए लंबी साँस ली। जैसे माताश्री का काम समाप्त हो गया हो। फिर शुरु हुआ पिताश्री का काम जो पैंतीस लाख के आस-पास आकर सिमट गया।
सुप्रिया को हैरानी हुई कि उसने तो अपनी दो सैलरियों के बल पर हामी भरी है। भला पापा ने किस बल पर हामी भरी। दहेज के लिए पैसे उन्होंने कभी बटोरे नहीं और कोई लंबी-चौड़ी जायदाद उनके लिए छोड़ नहीं गया है। उसने हैरानी से अपने पिता की ओर देखा और फिर पथराई आँखें टेबल पर पड़ी जूठी प्लेटों पर टिका दी।
“अच्छा तो अब चला जाए। हमारे पंडित जी जैसी तारीख-दिन-मुहूर्त बताएँगे, हम आपको सूचित कर देंगे।”
लड़के के पिताश्री ने जैसे ही अपने सिंगल सीटर सोफा के दोनों हाथों पर अपने हाथ रखकर अपना शरीर उठाना चाहा कि सुप्रिया ने स्पष्ट शब्दों में दृढ़ता के साथ कहा –“मुझे कुछ पूछना है…”
लड़के के पिताश्री वापस सोफे में धंसकर अपनी अर्धांगिनी को देखने लगे और अर्धांगिनी हैरत से उनको। सुप्रिया की मम्मी ने भी उसके पापा की आँखों ही आँखों में कहा कि हो गया बंटाधार।
बैठक में कुछ क्षणों तक सन्नाटा छाया रहा। यह वाक्य बोलकर सुप्रिया के दिमाग में भी कुछ पल के लिए सन्नाटा छाया रहा। फिर उसके दिमाग़ में अपनी माँ की बातें गूँजने लगीं। ‘बड़ों के बीच में नहीं बोलते’ – ‘तुम्हें अपने से बड़े का लिहाज़ करना चाहिए’।
इसलिए सुप्रिया लड़के की तरफ मुड़ गई और अपना वाक्य पूरा किया “….आपसे।”
अबतक दर-ओ-दीवार ताकता लड़का सचेत हो गया। अब तक की मुद्रा से लग ही नहीं रहा था कि इस शादी से उसका कुछ लेना-देना है। मगर अब वह संतुलित हो सुप्रिया की ओर देखने लगा। तभी उसकी माँ ने खीसें निपोरते हुए बात सँभाल ली।
“हाँ – हाँ क्यों नहीं? अरे मेरा लड़का इंजीनियर है। पढ़ा-लिखा है, बिल्डिंगें बनाता है। तुम्हारे किसी भी सवाल का जवाब दे सकता है। पूछो-पूछो।”
सुप्रिया को मन ही मन आश्चर्य हुआ –‘बिल्डिंगें बनाता है? मगर जहाँ तक सुप्रिया ने बायोडाटा में पढ़ा था वह आर एंड डी डिपार्टमेंट में है। क्या रिसर्च वालों से बिल्डिंगें भी बनवाते हैं? ख़ैर! प्राइवेट कंपनी है, कुछ भी करा सकती है।
लड़के की माँ ने सुप्रिया की पापा की ओर देखकर बेतहाशा मुस्कुराते हुए कहा – “आज-कल के बच्चे हैं न। इनकी अपनी ही ज़रूरतें होती हैं। हे हे हे।”
ज़रूर सुप्रिया के पापा ने मन ही मन कहा होगा कि ‘वो तो मैडम आपको जल्द पता लग जाएगा। ज़रा मेरी बेटी को मुँह खोलने तो दो।’
माताश्री की हँसी पूरी होते-होते सुप्रिया ने मिसाइल दाग़ दिया।
“क्या आपको टाई और धोती बाँधनी आती है?”
लड़का थोड़ा सकपकाया फिर संतुलित होकर जवाब दिया।
“वेल…(ख़राश लेते हुए) टाई तो मैं सीख रहा हूँ… मगर धोती ? मतलब धोती का क्या यूज़?”
“वेल..आप ये दोनों चीज़ें यूटूब से सीख सकते हैं क्योंकि मेरे ऑफिस का कोई फैमिली फंक्शन होगा तो आप टाई में अच्छे लगेंगे और जब मैं कोई पूजा-पाठ करूँगी तब क्या आप पैंट में अच्छे नहीं लगेगें। पहनने को तो आप कुर्ता-पजामा भी पहन सकते हैं। मगर जब मैं साड़ी पहनकर पारंपरिक वेशभूषा पहनूँगी तो आपको भी तो धोती ही पहननी चाहिए।”
फिर? फिर क्या हुआ? फिर इस कहानी में कुछ हो सकता है क्या? खासकर ऐसी मुँहफट लड़की का?
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परिचय - नीतू सिंह

नाम नीतू सिंह ‘रेणुका’ जन्मतिथि 30 जून 1984 साहित्यिक उपलब्धि विश्व हिन्दी सचिवालय, मारिशस द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिन्दी कविता प्रतियोगिता 2011 में प्रथम पुरस्कार। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, कविता इत्यादि का प्रकाशन। प्रकाशित रचनाएं ‘मेरा गगन’ नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2013) ‘समुद्र की रेत’ नामक कहानी संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2016), 'मन का मनका फेर' नामक कहानी संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2017) एवं 'क्योंकि मैं औरत हूँ?' नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2018) तथा 'सात दिन की माँ तथा अन्य कहानियाँ' नामक कहानी संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2018) प्रकाशित। रूचि लिखना और पढ़ना ई-मेल n30061984@gmail.com