कविता

जीवन और आशा

जीने की उम्मीद में क्यों चाक दामन करते हो
हर दिन क्यों रोते हो उम्मीदें हजार करते हो

मायूसी से भर लिया क्यों दामन इस तरह
सोने सी जिंदगी में ही हजार बार मरते हो

महफ़िल तो लगती ही रहेगी हर रोज हुस्न की ,
सावन की उम्मीद में क्यों पतझड़ से रोज लड़ते हो ।

आईना बना लो जिंदगी को अपनी भुलाकर नफरत ,
क्यों जमाने की आग में खुशियों को दूर करते हो ।

इबादत को बना लो दस्तूर ऐ जिंदगी ,
ईश्वर की रहमत को क्यों दौर ऐ मुश्किल समझते हो
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

*वर्षा वार्ष्णेय

पति का नाम –श्री गणेश कुमार वार्ष्णेय शिक्षा –ग्रेजुएशन {साहित्यिक अंग्रेजी ,सामान्य अंग्रेजी ,अर्थशास्त्र ,मनोविज्ञान } पता –संगम बिहार कॉलोनी ,गली न .3 नगला तिकोना रोड अलीगढ़{उत्तर प्रदेश} फ़ोन न .. 8868881051, 8439939877 अन्य – समाचार पत्र और किताबों में सामाजिक कुरीतियों और ज्वलंत विषयों पर काव्य सृजन और लेख , पूर्व में अध्यापन कार्य, वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लेखन यही है जिंदगी, कविता संग्रह की लेखिका नारी गौरव सम्मान से सम्मानित पुष्पगंधा काव्य संकलन के लिए रचनाकार के लिए सम्मानित {भारत की प्रतिभाशाली हिंदी कवयित्रियाँ }साझा संकलन पुष्पगंधा काव्य संकलन साझा संकलन संदल सुगंध साझा संकलन Pride of women award -2017 Indian trailblezer women Award 2017